Tuesday, February 1

दिनकर और उनकी उर्वशी - दिनेश कमलेकर "विनीत"(साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


दिनकर और उनकी उर्वशी

-  दिनेश कमलेकर "विनीत"

   


    श्री रामधारी सिंह जी दिनकर का जन्म बिहार प्रांत के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक गांव में सन 1908 में हुआ था।पटना विश्वविद्यालय से बी.ए. ऑनर्स की उपाधि प्राप्त करने के बाद वे कई पदों पर कार्यरत रहे। भागलपुर विश्वविद्यालय के उप कुलपति तथा भारत सरकार हिंदी सलाहकार पद को भी दिनकर जी ने सुशोभित किया।

    नर और नारी की चिरंतन समस्या को लेकर "उर्वशी" नामक महाकाव्य लिखा है। इस काव्य पर दिनकर जी को ज्ञानपीठ का सर्वोच्च पुरस्कार मिला था।

    अप्सरा उर्वशी इस काव्य की केंद्र बिंदु है। वह कामवंशगता, चिरयौवना,  अप्सरा, सागर की आत्मजा, नारायण की मानसिक तनया एवं भूत, भविष्य, वर्तमान की कृत्रिम बाधा से विमुक्त विश्व की प्रिया तथा देश काल से परे चिरंतन नारी है।

    उर्वशी जब पुरुरवा को देखकर सुरपुर को जाती है तब से वहां पुरुरावा को नहीं भूल सकती है। व्याकुल से रहती है। उर्वशी प्रथम मिलन के बारे में पुरुरवा से कहती है- 

"किंतु हाय जब तुम्हें देख मैं 

सुरपुर को लौटी थी 

यही काल अजगर सामान 

प्राणों पर बैठ गया था।"

    उर्वशी वासना से पीड़ित है इसलिए वह कहती है,

"मैं नाम गोत्र से रहित पुण्य

अंबर में उड़ती हुई मुक्त आनंद शिखा

इतिवृत्तहीन ,

सौंदर्य चेतना की तरंग ,

सुर - नर - किन्नर-  गंधर्व नहीं 

प्रिये मैं केवल अप्सरा

 विश्व नर - के अतृप्त इच्छा सागर से समुद्रभूत।"

    उर्वशी काम पीड़ित होने के कारण मर्यादा को तोड़कर,  स्वर्गलोक को छोड़कर भूमि पर पुरुरावा के पास चली आती है। और वह सब कुछ भूलकर प्रेमी के अनवरत आलिंगन, चुंबन आदि क्रीडाओं में मग्न होकर रमण करती है।

    उर्वशी काव्य में प्रिया के रूप में कवि ने उर्वशी को ही लिया है। उर्वशी की सुंदरता को देखकर पुरुरवा विचलित हो उठता है। वह उर्वशी से स्वयं कहता है-

"कई बार चाहा, सुरपति से जाकर स्वयं कहूं मैं,

 अब उर्वशी बिना यह जीवन भार हुआ जाता है।"

    उर्वशी अपने शारीरिक सुख के लिए स्वर्ग के नियम को भी तोड़कर आई है। यह उर्वशी की मानसिक स्थिति है। पुरुरावा भी उर्वशी को देखकर विचलित हुआ है। वह  उर्वशी से कहता है कि प्रथम मिलन के पश्चात जब लौट जाने का समय आ गया तो केवल उसकी देह ही रथ पर बैठकर गृह तक चली गयी। उसका मन तो उर्वशी के पास ही रह गया है।

"लौटा जब मैं राजभवन को,

 लगा, देह ही केवल 

रथ में बैठी हुई किसी विध

गृह तक पहुंच गयी है।"

     पुरुरवा उर्वशी के शरीर के माध्यम से शरीर के ऊपर उठकर नियति के या ईश्वरीय सुंदरता देखना चाहता है। वह कहता है-

"अतिक्रमण इसलिए कि

इन जलदों का पटल हटा कर 

देख सकूं मधु कांति मान 

सारा सौंदर्य तुम्हारा।"

    जहां कहीं पुरुरवा दार्शनिक चिंतन में मग्न होने लगता है तो उर्वशी समझती है कि वह केवल कामोपभोग के निमित्त उसके पास आता है।

    औशीनरी पुरूरवा की परिणीता पत्नी है। पत्नी के रूप में औशीनरी का चित्रण सुंदर ढंग से किया गया है। राजा एक अप्सरा के प्रति आकृष्ट होने के कारण पति-प्रेम से वंचित हो जाती है। वह बार-बार आश्चर्यचकित हो जाती है कि उर्वशी के प्रेम में  एकाएक राजा कैसे फंस गये। उसके अंदर नारी सुलभ ईर्ष्या भी उत्पन्न होती है-

"समझ नहीं पाती कैसे वे बदल गये क्षणभर में।

 छला अप्सरा ने स्वामी को छवि से या माया से?"

    पुरूरवा, जब उर्वशी के साथ गंधमादन पर्वत पर चले जाते हैं तो औशीनरी बहुत दु:खित होती है। फिर भी पत्नी के रूप में बहुत संयम से व्यवहार करती है। वह कहती है कि  प्रिया प्रेमी को सब कुछ समर्पण नहीं करती, लेकिन पत्नी सबकुछ समर्पण करती है। औशीनरी तन मन जीवन से समर्पित है।

"न्योछावर आराध्य चरण पर 

सखि, तन, मन, जीवन हैं।"

    औशीनरी अप्सरा नहीं जो अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करें। भारतीय संस्कृति के अनुसार पति पत्नी के लिए सर्वस्व है। इसलिए अपने पति की परिस्थिति को देख वह भारतीय जीवन धारा का अतिक्रमण नहीं करती। इसलिए वह कहती है-

" पति के सिवा योषिता का कोई आधार नहीं है

 जब तक है यह दशा, नारियां व्यथा कहां खोयेंगी?

 आंसु छिपा हंसेगी, फिर हंसते-हंसते रोयेंगी।"

    उर्वशी प्रकृति और परमेश्वर को एक समझती है। प्रकृति और परमेश्वर में भिन्नता मानने वालों का खंडन करती है।

"मोह मात्र ही नहीं, सभी ऐसे विचार बंधन हैं,

 जो सिखलाते हैं मनुष्य को प्रकृति और परमेश्वर

 दो हैं, जो भी प्रकृत हुआ, वह दूर हुआ ईश्वर से

 ईश्वर का जो हुआ उसे प्रकृति नहीं पायेगी।"

    ईश्वर और प्रकृति में कोई भी भिन्नता नहीं है। दोनों एक ही हैं। निर्लिप्त भावना जब तक जागृत नहीं होती तब तक यह द्वैत भावना बनी रहती है। 

    काम एक मूल प्रवृत्ति है जिसमें दो प्रकार हैं। संकुचित और व्यापक। संकुचित काम में शारीरिक मिलन मात्र होता है। व्यापक काम में माता-पिता का प्रेम, नायक- नायिका प्रेम, सभी जनों से संबंध प्रेम सम्मिलित हैं।

    उर्वशी काव्य में संपूर्ण तृतीय सर्ग में काम के अनेक रूप मिलते हैं। अधिक संकुचित काम के रूप मिलते हैं। आध्यात्मिक रूप भी मिलते हैं। चतुर्थ सर्ग में उर्वशी के काम का उदात्तीकरण मिलता है।

    उर्वशी अप्सरा है। उच्छृंखल प्रेम चाहने वाली है, परंतु , पुरूरवा के संपर्क में आने के बाद वह भूलोक के अनुरूप उसका नारीत्व जाग उठता है। तदनुसार वह प्रेयसी, पत्नी व प्रिया के रूप में जीती है। माननीय सुखों का भी अनुभव करती है। जब उर्वशी मां बनती है, च्यवन आश्रम में कहती है कि-

     "बेटी नहीं हुई तो क्या? अब मां तो हूं मानव की?"

    उर्वशी जो पहले केवल शारीरिक मिलन ही प्रमुख समझ कर आयी है, अंत में वह माता की परिभाषा को समझती है।  सुकन्या माता ना होने पर भी, जिस ममता से पालती- पोसती है, उससे संदेह नहीं होता कि सुकन्या माता नहीं है। इससे उर्वशी भी अवगत है। इसलिए माता की ममता के महत्व को समझ कर उर्वशी कहती है-

"केवल भ्रूण वहन -  केवल प्रजनन मातृत्व नहीं है।

    माता वही पालती है जो शिशु को हृदय लगाकर।"

    पुत्र का जन्म देकर पुरूरवा को राज्य का वारिस प्रदान करती है। उर्वशी का जीवन मातृत्व से सार्थक हो जाता है। अपने पुत्र को हृदय से जुड़ाकर शांति का अनुभव करती है। वह सुकन्या से अपने पुत्र को लेकर कहती है-

"अरी, जुड़ाना क्या इसको 

ला, दे, इस हृदय- कुसुम को 

लगा वक्ष से स्वयं प्राण तक

 शीतल हो जाता है।"

     इस प्रकार उर्वशी प्रेम का उदात्तीकरण चतुर्थ -सर्ग में हुआ। माता बनने के बाद उर्वशी में वासना के स्थान पर, पति प्रेम, प्रणय का भाव, त्याग का भाव जन्म लेता है।

    पुत्र के बिना उर्वशी नहीं रह सकती लेकिन शाप के कारण विवश है। इसलिए अपने पुत्र आयु को  सुकन्या को देकर कहती है कि मेरा जीवन का कार्य -कलाप निश्चित है। दु:खित मन से उर्वशी च्यवन आश्रम से चली जाती है।

    अंत में औशीनरी भी मातृत्व का पद प्राप्त करती है। उर्वशी के अंतर्धान और पुरूरवा के वानप्रस्थाश्रम चले जाने के पश्चात आयु को गोदी में लेकर राजमाता का अनुभव करती हुई कहती है-

      "आ बेटा! लूं जुड़ा प्राण छाती से तुझे लगाकर"

    उर्वशी काव्य में कवि दिनकर जी ने मातृत्व की भावना पर बल दी है। भारतीय चिंतन धारा के अनुसार माता की परिभाषा पाश्चात्य परिभाषा से अलग है। पाश्चात्य सिद्धांत के अनुसार माता का कार्य प्रजनन तक सीमित है, लेकिन भारतीय संस्कृति के अनुसार हृदय लगाकर शिशु को पालना वास्तविक मातृत्व है। अप्सरा होने पर भी उर्वशी धरती की नारी के मातृत्व की महत्ता समझती है।

    उर्वशी काव्य में ईश्वर को सृष्टि का प्रसारक, संचालक, एवं सर्व व्यापक माना गया है। यह सृष्टि उसी ईश्वर की रचना है। इस सृष्टि में जो भी घटित होता है वह ईश्वर की इच्छा से ही घटित होता है।

"यह सब उनकी कृपा, सृष्टि जिनकी निगूढ़ रचना है 

झुके हुए हम धनुष मात्र हैं, तनी हुई ज्या पर से

 किसी और की इच्छाओं के बाण चला करते हैं।"

        उर्वशी काव्य में नारी के अनेक रूपों का चित्रण किया गया है। जिसमें प्रमुख रुप से दिनकर ने प्रेयसी या प्रिया पत्नी और माता पर अधिक बल दिया है नारी प्रिया, पत्नी और माता बनती है। इसलिए नारी बनाम माता है। इसलिए पत्नी प्रेयसी बनकर पुरुष के सुख- दुख में भागीदार बनकर उसके लिए आपूर्व शांति लोक का निर्माण करती है जिसमें विचरण करते हुए पुरुष सृष्टिकार के दर्शन कर सकता है। 

    दिनकर ने उर्वशी काव्य में नारी को पत्नी तथा मां के रूप का भी चित्रण किया है। केवल प्रेयसी रूप तक सीमित नहीं रहा। नारी की अंतिम सार्थकता उसके मातृत्व में है।   



दिनेश कमलेकर "विनीत" 

हिंदी अध्यापक

जिला परिषद उच्च विद्यालय

आमनगल, रंगारेड्डी जिल्ला ,तेलंगाना

90108 02243

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