साहित्य मंथन
साहित्य और भाषा के संदर्भ में राजभाषा हिंदी और उसकी विशेषताएँ
- श्रीमती जी.किरण
साहित्य समाज का दर्पण है।
सामाजिक जीवन का प्रतिबिंब हमें साहित्य में ही दृष्टिगोचर होता है। समाज में निहित विचार और भावनाएँ साहित्य के माध्यम से
प्रतिबिंबित होती हैं। इन विचारों और भावनाओं की अभिव्यक्ति भाषा के द्वारा की
जाती है। भाषा के द्वारा ही उच्चकोटि के साहित्य का सृजन हो सकता है।
हम सब जानते हैं कि भाषा विचारों के
आदान-प्रदान का प्रमुख साधन है। प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों को दूसरे व्यक्ति
तक पहुँचाने के लिए जिस साधन का प्रयोग करता है,वह साधन भाषा ही है। भाषा हमारी
पहचान है। इसके बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। भाषा के द्वारा ही
समाज से हमारा संबंध स्थापित होता है। समाज, साहित्य और भाषा का संबंध अटूट होता
है।
वेदों में भाषा को वाग्,वाच्,और गिर
आदि नामों से संबोधित किया गया है। शशिकर्ण काण्व ने कहा था कि- भाषा से
दिव्य़ता,सुमति और श्रेय की प्राप्ति होती है। इससे स्पष्ट होता है कि भाषा वह
तत्व है जो समाज का निर्माण करने में,संस्कृति को उन्नत बनाने में, मनुष्य को
सुसभ्य बनाने में तथा साहित्य के सृजन में सहायक होती है।
आज विश्व में अनेक भाषाएँ बोली जाती
हैं। इनमें हिंदी,मैंडरिन,अंग्रेज़ी,फ्रेंच,जर्मन,पुर्तगाली आदि प्रसिद्ध हैं।इन
सभी भाषाओं का साहित्य अत्यंत वृहत और सुसंपन्न है। साहित्य की बात करते समय यदि हिंदी
की बात नहीं की जाएगी तो भाषा संबंधी हमारी बात निरर्थक बन जायेगी क्योंकि हिंदी
साहित्य का इतिहास हिंदी के उद्भव और विकास का गवाह है। इसीलिए साहित्य और भाषा के
संदर्भ में हिंदी का बड़ामहत्व है। इसी संदर्भ के अंतर्गत हिंदी की वर्तमान स्थिति
पर चर्चा करने की आवश्यकता है।
हिंदी हमारे देश की भाषा है। वैसे यह अलग बात है कि इसे राष्ट्रभाषा होने का
गौरव प्राप्त नहीं हुआ है और इसे राजभाषा के साँचे में ढालकर इसकी सीमाओं को बाँध
दिया गया है। जब राष्ट्र भाषा और राजभाषा की चर्चा होती है तो इसके बीच जो अंतर
है,उसे स्पष्ट करना भी आवश्यक हो जाता है।
जिस एक भाषा के माध्यम से पूरे देश
के विभिन्न भाषा-भाषी नागरिक पारस्परिक व्यवहार करते हैं उसे राष्ट्रभाषा कहा जाता
है। यदि किसी देश की सत्तर प्रतिशत जनता उस एक भाषा का प्रयोग करती है,उसे समझती
है और उसके माध्यम से अपने विचारों को एक-दूसरे तक पहुँचाती है तो वह भाषा उस देश
की राष्ट्रभाषा होगी। प्रत्येक देश के लिए राष्ट्रभाषा का होना अनिवार्य है। किसी
महापुरूष ने कहा था कि- “राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा होता है।“
राजभाषा से आशय उस भाषा से है जिसके
द्वारा देश का शासनतंत्र चलाया जाता है। अर्थात् सरकारी कार्यालयों,आफिसों में
कामकाज के लिए जिस भाषा का प्रयोग होता है उसे राजभाषा कहते हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात्
हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का निर्णय लिया गया था किंतु भाषायी मतभेदों के
फलस्वरूप इसे राजभाषा का दर्जा दिया गया। हमारे संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अंतर्गत 14 सितंबर 1949 को इसे राजभाषा
घोषित किया गया। तब से हर वर्ष 14 सितंबर को हम हिंदी दिवस मनाते हैं।
अब प्रश्न यह है कि यदि इतने भाषायी
मतभेद थे तो फिर हिंदी को ही राजभाषा क्यों चुना गया ? इसका खुलासा इसकी विशेषताओं
के द्वारा होता है। तो चलिए दृष्टिपात कर लेते हैं इसकी कुछ विशेषताओं पर-
1.संस्कृत भारत की सबसे
प्राचीन भाषा है जिसे आर्यभाषा या देवभाषा भी कहा जाता है।इस आर्यभाषा और देवभाषा
की कोख से ही हिंदी का जन्म हुआ है। इसे संस्कृत की उत्तराधिकारिणी माना जाता है। हिंदी की जनक
भाषा संस्कृत ही है। “संस्कृत देवभाषा है और हिंदी देवसुता है”।
हिंदी का विकास क्रम
इस तरह है - पहले संस्कृत, संस्कृत से पालि, पालि से प्राकृत, प्राकृत से
अपभ्रंश/अवहट्ट और अपभ्रंश/अवहट्ट से
हिंदी। हिंदी साहित्य के इतिहास के लेखकों
ने अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि के रूप में ग्रहण किया है। चंद्रधर
शर्मा गुलेरी तो अपभ्रंश को पुरानी हिंदी ही कहते थे।
हिंदी शब्द की
उत्पत्ति सिंधु शब्द से हुई है। ईरानी लोगों ने सिंधु नदी के आसपास
के निवासियों को हिंदू के नाम से संबोधित किया था। ईरानी भाषा में स का
उच्चारण ह तथा ध का उच्चारण द किया जाता था। इसीलिए ईरानियों
के मुख से सिंधु शब्द हिंदू के रुप में मुखरित हुआ। समय के अनुसार हिंदू
शब्द ने हिंद तत्पश्चात हिंदी का रुप ग्रहण किया। हिंदी शब्द फारसी
भाषा का है। फारसी भाषा में हिंदी का अर्थ है-हिंद देश के निवासी। इसीलिए हिंद देश
के निवासियों के लिए हिंदी विशेष महत्व रखती है।
2. हिंदी दुनिया में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा
हैं। वर्ल्ड लैंग्वेज डाटाबेस के 22 वें संस्करण इथोनोलॉज के अनुसार दुनिया भर की
20 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी तीसरे स्थान पर है। पहला स्थान
अंग्रेज़ी को और दूसरा स्थान मैंडरीन को प्राप्त है। यह हमारे लिए अत्यंत गर्व है
कि बात है कि हमारी भाषा को विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरा
स्थान प्राप्त है। विश्व में लगभग 70 करोड़ लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं। विदेशों
में इसकी माँग बढ़ती जा रही है। नेपाल, बांग्ला देश, भूटान, मॉरिशस ,श्रीलंका,
फिजी, इंग्लैण्ड आदि देशों में हिंदी के प्रति रूझान बढ़ रहा है।
3. हिंदी की लगभग 5 उप भाषाएँ ( पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, पहाड़ी, बिहारी और पूर्वी हिंदी ) और 17 बोलियाँ ( हरियाणवी, खड़ी बोली, ब्रज भाषा, बुंदेली, कन्नौजी ,मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी, जौनसारी, कुमाऊँनी-गढ़वाली, भोजपुरी, मगही, मैथिली, अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी ) हैं। समूचे उत्तर पूर्वी भारत के राज्यों की भाषा हिंदी है। इसने लगभग भारत के 10 राज्यों ( बिहार, छत्तीसगढ़ ,हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड ,मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश तथा केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली ) में अपने अधिकार क्षेत्र को बनाया है। यह समूचे देश में बड़े प्यार से बोली जाती है । यह संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में बाँधती है। इसकी एकता की भावना के संबंध में केशवचंद्र सेन ने अपने एक लेख में लिखा था कि- “एकता का उपाय यह है, कि भारत में एक ही भाषा का व्यवहार हो। इस समय जितनी भी भाषाएँ देश में प्रचलित हैं, उनमें हिंदी भाषा सब जगह प्रचलित है। इस हिंदी भाषा को यदि भारत की एकमात्र भाषा बना दिया जाए तो यह काम (एकता) सहज ही और शीघ्र संपन्न हो सकता है”।
एकता के साथ-साथ
हिंदी की सार्वदेशिकता से भी हम अपरिचित नहीं है।
आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व अंग्रेज विद्वानों और अधिकारियों ने हिंदी की सार्वदेशिकता को स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया था। मद्रास के टॉमस रोवक ने 1870 ई० में हिंदी को महाभाषा मानते हुए गिल क्राइस्ट को यह पत्र लिखा था। इसका एक अंश इस प्रकार है- “भारत के जिस भाग में मुझे काम करना पड़ा है- कलकत्ता से लेकर लाहौर तक, कुमायूँ के पर्वतों से लेकर नर्मदा तक, अफगानों, राजपूतों, मराठों, जाटों, सिखों और उन प्रदेशों के सभी कबीलों में जहाँ मैंने यात्रा की है,मैंने हिंदी का आम व्यवहार देखा है। मैं कन्याकुमारी से कश्मीर तक या जावा से सिंधु के मुहाने तक इस विश्वास के साथ यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हँ,कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जायेंगे, जो हिंदी बोल लेते होंगे।“
4. हिंदी की लिपी
देवनागरी है। देवनागरी को सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि के रूप में जाना जाता है। इसकी
ध्वनियाँ, स्वर, व्यंजन अत्यंत निराले हैं। प्रत्येक ध्वनि के लिए एक लिपि चिह्न
को निर्धारित किया गया है। इसकी वर्णमाला
फोनोटिक अर्थात ध्वन्यात्मक है। इसे जैसे बोला जाता है वैसे ही लिखा जाता है और
जैसे लिखा जाता है वैसे ही पढ़ा भी जाता है। इसमें गूँगे अक्षर (silent letters)
नहीं होते हैं। उदाहरण के तौर पर अंग्रेज़ी में should को शुल्ड नहीं बल्कि शुड़
पढ़ा जाता है जबकि हिंदी में ऐसा कोई अक्षर नहीं है जिसका उच्चारण नहीं होता है।
इसका लेखन और उचारण अत्यंत स्पष्ट, सहज और स्वाभाविक है। हम कह सकते हैं कि-
जग
में प्यारी, सबकी दुलारी
है राजभाषा हिंदी हमारी
वर्णमाला है इसकी प्यारी
मात्राएँ हैं इसकी न्यारी।
ध्वनियाँ हैं इसकी जान।
हम सब इस पर कुर्बान॥
5. हिंदी भाषा के शब्दकोश में लगभग 3 लाख शब्द
हैं। किंतु यदि प्रयोग के आधार पर देखा जाए तो इसके शब्दकोश में शब्दों की संख्या
5 लाख से अधिक होगी क्योंकि कोशकार उपसर्ग और प्रत्यय के योग से बने सभी शब्द
इसमें नहीं देते हैं। उदाहरण के तौर पर कोश में ’बुद्धि’ शब्द का अर्थ दिया
जाता है किंतु ’ कुबुद्धि ’ या सुबुद्धि’’ का नहीं दिया जाता है।
यदि हम ऐसे शब्दों की भी गणना कर लेते हैं तो हिंदी का शब्दकोश अंग्रेज़ी के
शब्दकोश से भी वृहत हो जाता है। इसमें अनेक विषयों की पारिभाषिक शब्दावली का भी
उचित प्रयोग किया गया है।
6. हिंदी स्पष्ट भाषा है। इसमें अंग्रेज़ी के समान
अस्पष्टता नहीं पाई जाती है। हिंदी में छोटे, बड़े और बराबर वालों के लिए अलग-अलग
शब्दों का प्रयोग होता है। जैसे कि बड़ों के लिए ’आप’, बराबर वालों के लिए ’तुम’
और छोटों के लिए ’तुम’ या ’तू’ का प्रयोग होता है जबकि अंग्रेज़ी में
सभी के लिए ’you’ शब्द का ही प्रयोग होता है।
7. हिंदी की विशेषता इसकी व्यावहारिकता से भी है।
इसमें सभी रिश्तों के अलग-अलग नाम हैं। इस भाषा में अनेक रिश्तों के लिए एक नाम का
प्रयोग बिलकुल भी नहीं किया जाता है। इसमें भाई की पत्नी को भाभी, पति की बहन को
ननद कहा जाता है। जबकि अंग्रेजी में इन रिश्तों को ‘sister in law’ का नाम दे दिया
जाता जाता है। आप फिर पूछते ही रहेंगे कि sister in law यानी वह आपकी भाभी है या
ननद। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह अत्यंत व्यावहारिक भाषा है।
8. वर्तमान
में विश्व के लगभग 150 विश्व विद्यालयों में इसका पठन-पाठन हो रहा है, जिनमें
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास, यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी,
आदि प्रमुख हैं।
9. हिंदी
का व्याकरण अत्यंत समृद्ध है। उसमें शब्द भेदों और वाक्य भेदों की स्पष्ट व्याख्या
और प्रयोग है। इसकी एक विशेषता यह है कि इसमें निर्जीव वस्तुओं का भी लिंग
निर्धारण होता है। उदाहरण के तौर पर यदि आप से पुस्तक शब्द का लिंग निर्धारण करने
के लिए कहा जाए तो आप बेझिझक बता सकते हैं कि पुस्तक शब्द स्त्रीलिंग है।
10. आज
कंप्यूटर और इंटरनेट पर इसका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। हिंदी में अनेक
सॉफ्टवेयर काम कर रहे हैं। धीरे-धीरे इसकी टाईपिंग में भी आसानी हो रही है। इस भाषा
का भी यूनिकोड है। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों जैसे :- फेसबुक, व्हॉट्स ऐप,
इंस्टाग्राम आदि पर इसका प्रयोग तेज़ी से बढ़ रहा है। गूगल देवता के उपासक तो सभी हैं।
विश्व के सबसे बड़े इस सर्च इंजन गूगल ने भी हिंदी को अपनी सेवाओं में शामिल किया
है। हिंदी में ब्लॉगों का प्रचलन भी तेज़ी से बढ़ रहा है। आज हिंदी जानने और बोलने
वाले, हिंदी के रचनाकार अपनी रचनाओं का ब्लॉग बना सकते हैं और सारी दुनिया के
रचनाकारों से संपर्क स्थापित कर सकते हैं। इसके अनेक वेबसाइट्स हैँ।
11. यह अत्यंत
कर्णप्रिय और श्रुति मधुर भाषा है। इसका एक-एक अक्षर, एक-एक शब्द और हर एक वाक्य
कानों में रस घोलता है। इसकी कर्णप्रियता और मधुरता का रहस्य इसमें प्रयुक्त रस,
छंद और अलंकार हैं। वैसे तो रसों में सभी रसों ( श्रृंगार, करुण,
हास्य, वीर, रौद्र, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शांत) का
अपना-अपना महत्व हैं किंतु श्रृंगार, और वीर रस का स्थान सर्वोपरि माना जा सकता
है। वीर रस की बात होती है तो सुभद्राकुमारी चौहान जी की पंक्तियाँ याद आने लगती
हैं-
’बुंदेले हर बोलों के मुख हमने
सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली
रानी थी।’
छंद की बात करते हैं तो दोहों, कुंडलियों और
सवैयों की ओर अनायास ही ध्यान चला जाता है। आपने मन को मोहने वाली गिरिधर की
कुंडलियाँ पढ़ी और सुनी ही होगी-
“दौलत
पाय न कीजिए, सपनेहूँ अभिमान
चंचल दिन चारि को ठाँव न रहत निदान।
ठाँव न रहत निदान, जियत जग में जस
लीजै
मीठे वचन सुनाय, विनय सबही की कीजै।
अलंकारों में शब्दालंकारों और अर्थालंकारों
का सुंदर वर्णन देखने को मिलता है। उदाहरण के रूप में ’पानी’ शब्द का चमात्कारिक
प्रयोग आपको रहीम के इस दोहे से मिल जाता है-
’रहीम पानी राखिए, बिन पानी सब
सून,
पानी गये न उबरै, मोती मानुष चून॥
इसकी मधुरता का एक अन्य कारण इसमें निहित
मुहावरें, कहावतें और लोकोक्तियाँ हैं। आपको अपनी बात रोचक ढ़ंग से, घुमा फिरा कर
कहना है तो आपको मुहावरों और कहावतों का प्रयोग करना ही होगा। इस बात की सार्थकता
इस उदाहरण से सिद्ध होती है- यदि किसी व्यक्ति को निबंध लिखने के लिए कहा जाएगा तो
वह निबंध तो लिखेगा नहीं, किंतु बहाने बनाने लगेगा कि कागज़ ठीक नहीं है, कलम नहीं
चल रही है। इस समय यदि आप कहेंगे कि – ’आप बहाने बना रहे हैं’। तो इस वाक्य से भाषायी
सौंदर्य धूमिल पड़ जाता है। यदि आप कहते हैं कि – “नाच न जाने आँगन टेढ़ा”। तो मैं
शत प्रतिशत विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि आपके द्वारा उद्धृत वक्तव्य भाषायी
सौंदर्य में वृद्धि करता है। इसकी इसी मधुरता
के कारण ही इसे ’डायबिटिक लैंग्वेज’ भी कहा जाता है।
12. हिंदी
एक उदारवादी भाषा है। यह अन्य भाषा के शब्दों को स्वयं में सहजता से समेट लेती है।
इसमें संसार की लगभग सभी भाषाओं के शब्द उपस्थित हैं। इसने उर्दू के कलम, कागज़,
अंग्रेज़ी के प्रेस, रेल, फारसी के दोस्ती, दुकान, पुर्तगाली के मेज़, गोदाम आदि
शब्दों को बड़ी उदारता के साथ अपनाया है।
उदारता की मूरत हिंदी
उर्दू, फारसी, अंग्रेज़ी की
हमजोली हिंदी
भाषाओं में अलबेली हिंदी
हम सबकी सहेली हिंदी।
13. हिंदी का साहित्य अंत्यंत विशाल एवं
व्यापक है। हिंदी साहित्य के इतिहास का विभाजन चार कालों में बड़े ही रोचक और
वैज्ञानिक पद्धति से हुआ है। चारों कालों में साहित्य मंथन हुआ था। प्रत्येक काल
में हिंदी की महिमा का बखान साहित्यकारों और रचनाकारों द्वारा हुआ। अवधी,ब्रजभाषा
और खड़ी बोली में विशाल साहित्य की रचना हुई। अवधी भाषा में मलिक मुहम्मद जायसी
कृत पद्मावत को हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रबंध काव्य माना जाता है। सूरदास की
काव्यात्मक भाषा ब्रज थी। हिंदी के खड़ी बोली रूप ने आधुनिक काल में अपनी पहचान
बनाई। इस काल में कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, पत्रकारिता के द्वारा
हिंदी भाषा पल्लवित और विकसित हुई। साहित्यकारों ने हिंदी के माध्यम से ही भारत की
संस्कृति और इसकी महानता का गुणगान किया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र का कहना था-
रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था- “हिंदी तोड़ने नहीं, जोड़ने वाली भाषा हैं”। यह ऐसी भाषा है जो भारत के सभी प्रांतों को एक सूत्र में बाँधती है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए महात्मा गाँधी ने कहा था- “हिंदी का साहित्य केवल हिंदुओं का लिखा हुआ नहीं है। जायसी, कबीर, रहीम, रसखान, आलम और रसलीन ये सारे के सारे कवि मुसलमान थे किंतु उनकी रचनाएँ हिंदी की अनमोल निधियों में गिनी जाती हैं। संत-साहित्य में सिख गुरुओं की वाणी का भी अनमोल स्थान है।“ प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, हरिवंशराय बच्चन, हरिऔध, अज्ञेय, मखनलाल चतुर्वेदी आदि रचनाकारों ने हिंदी के उद्भव और विकास में महान योगदान दिया।
14. इसकी
अन्य विशेषता यह है कि इस भाषा में अनेक पत्र पत्रिकाएँ भी प्रकाशित होती हैं।
विश्व के करीब-करीब 40% लोग इन्हें पढ़ते हैं। यही नहीं विश्व के अनेक टी.वी.
चैनलों पर हिंदी के धारावाहिकों, फिल्मों और समाचारों का प्रसारण होता है।
15. हिंदी
को व्यावसायिक भाषा भी कहा जा सकता है क्योंकि यह भाषा रोज़गार के अनेक अवसर
उपलब्ध कराती है। आप एक सफल रचनाकार, शिक्षक, अनुवादक, उद्घोषक का पद हासिल कर
सकते हैं।
उपर्युक्त बातों के आधार पर हम कह सकते हैं
कि हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसमें राष्ट्रभाषा बनने के सभी गुण विद्यमान हैं और यही
कारण है कि मुझे अपनी भाषा पर गर्व है और क्यों न हो मुझे गर्व? मुझे अपनी भाषा पर
नाज़ है और मैं इसका सम्मान करती हूँ। सम्मान शब्द से मुझे स्वामी विवेकानंद जी का
एक प्रसंग याद आता है जिसे मैं आपसे साझा करना चाहती हूँ।
एक बार स्वामी जी विदेश यात्रा पर थे। तब एक
विदेशी ने उनसे हैलो कहा। स्वामीजी ने बड़ी संजीदगी से उत्तर दिया – नमस्ते। तब
विदेशी ने उनसे हिंदी में पूछा – “आप कैसे हैं ? स्वामीजी ने जवाब दिया। आई एम
फाईन”। है ना अचंभित करने वाला प्रसंग। तब विदेशी भाई ने चकित होकर पूछा –“
स्वामी जी जब मैं अंग्रेज़ी में पूछा रहा था तो आप हिंदी में जवाब दे रहे थे और जब
मैं हिंदी में पूछ रहा हूँ तो आप अंग्रेज़ी में जवाब दे रहे हैं। ऐसा क्यों ?” स्वामी जी ने उत्तर दिया – “भाई जब आप अपनी माँ का
सम्मान कर रहे थे तो मैं मेरी माँ का सम्मान कर रहा था और जब आप मेरी माँ का
सम्मान कर रहे थे तो मैं आपकी माँ का सम्मान कर रहा था”।
अपनी भाषा के प्रति स्वामी जी निष्ठा देखकर
विदेशी हैरान हो गया।
स्वामी जी के जैसी निष्ठा और भक्ति यदि
प्रत्येक भारतीय में उत्पन्न हो जाएगी तो वह दिन दूर नहीं होगा जब हिंदी को
राष्ट्रभाषा का ताज पहना दिया जायेगा और सारे विश्व में इसकी कीर्ति का लोहा मान
लिया जायेगा। चंद पंक्तियों के साथ में अपनी कलम को विराम देना चाहूँगी-
भाषाओं की पटरानी कौन?
साहित्यकारों की दुलारी कौन?
कवियों की वाणी कौन?
विश्व की भाषा कौन?”
उपर्युक्त इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है – हिंदी, हमारी हिंदी, हम सबकी प्यारी हिंदी राजभाषा, राष्ट्रभाषा और विश्व भाषा हिंदी।
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