स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
* * ग़ज़ल **
वृत्त :- भुजंगप्रयात
विधान : यगण × 4, कुल 12 वर्ण
कुल मात्राएं :- 20
मात्रा क्रम - 122 122 122 122
।ऽऽ ।ऽऽ ।ऽऽ ।ऽऽ
खुदी के नशे में, लगे चूर सारे
लकीरें बढ़ी हैं, हुए दूर सारे
बढ़ा स्वार्थ सारा, किसे मैं पुकारूं
सुनाई न देता, मिटे सूर सारे
नहीं सत्य स्थायी, सदा झूठ हावी
हरिश्चंद्र भी आज काफूर सारे
कई घाव तेरे, जड़ों में बसे हैं
मिटाने चला आज नासूर सारे
जनानी अदा के, चले तीर ऐसे
उसी बेबसी में, मिटे शूर सारे
जहां वो गुजरती, वहीं फिर खड़ा हूं
झलक एक पाने, गली में अडा हूं
फ़क़त राह तकते, कई साल बीते
अभी तक सनम मैं, कज़ा से लड़ा हूं
मुझे ना पुकारो, नहीं आ सकूँगा
वधू के गले में, हिरा बन जड़ा हूँ
जहाँ पर सिमटकर, हुए एक दोनों
उसी सेज पर अब, अकेला पड़ा हूँ
जले कृष्ण मुझ पर, पुनः फोड़ देगा
कमर से सटा राधिका का घड़ा हूं
89993 52623
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for Printed Book
स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
Editor
Prasadarao Jami
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