Friday, January 7

कुछ मुक्तक - गन्नु कृष्णमूर्ति (स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य)

स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य




* *  कुछ मुक्तक  **

जब तक घोंसले में है, 

वह एक परिंदा है

पर, जब उडता है तो

आसमाँ हो जाता है

 - - -

ख़ुशबू चमन को छोड़ कर चली जाती है दूर कहीं

कौन चाहता है भला, बंधन फूलों के भी ?

 - - -

हम तो आदमी को 

खड़े हुए देखना चाहते हैं

पर, ये लोग 

मंदिर और मस्जिद को खड़ा कर देते हैं और खुद गिर जाते हैं

 - - -

किनारा छोड़कर किश्ती में उतरो

और किश्ती छोड़कर समंदर में

की किश्ती टूट जायगी

पर, समंदर तो नहीं

 - - -

ढूंढ रहा हूँ 

कचरे की कुण्डी में

एक दियासलाई

ताकि जला सकूँ उस कचरे को


गन्नु कृष्णमूर्ति

कामारेड्डी

 92472 27087


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स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
Editor
Prasadarao Jami

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