स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
जब तक घोंसले में है,
वह एक परिंदा है
पर, जब उडता है तो
आसमाँ हो जाता है
ख़ुशबू चमन को छोड़ कर चली जाती है दूर कहीं
कौन चाहता है भला, बंधन फूलों के भी ?
हम तो आदमी को
खड़े हुए देखना चाहते हैं
पर, ये लोग
मंदिर और मस्जिद को खड़ा कर देते
हैं और खुद गिर जाते हैं
किनारा छोड़कर किश्ती में उतरो
और किश्ती छोड़कर समंदर में
की किश्ती टूट जायगी
पर, समंदर तो नहीं
ढूंढ रहा हूँ
कचरे की कुण्डी में
एक दियासलाई
ताकि जला सकूँ उस कचरे को
कामारेड्डी
92472 27087
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