साहित्य मंथन
तेलुगु साहित्य के वचन कविता में एक विधा "अबाबील"
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समीउल्लाह खान
तेलुगु साहित्य के वचन कविता में एक विधा "अबाबील" प्रक्रिया के सृजनकर्ता इस्लाम वाद के प्रमुख कवि शेख करीमुल्ला जी है। ये विनुकोंडा के निवासी हैं। इस प्रक्रिया में पांच पंक्तियां या चरण होते हैं.....
1.समस्या
2.विषय
3.विश्लेषण
4.आत्माश्रय
5.संदेश या व्यंग्यात्मक चमत्कार
"अबाबील"शब्द अरबी भाषा से लिया गया है। इस शब्द का आंध्रीकरण कर अर्थ परिवर्तन के बिना "अबाबीलु" का प्रयोग किया गया है। मृदुभाषी करीमुल्ला जी इस प्रक्रिया में अल्पाक्षरों में अनल्पार्थ के लक्षणों को जोड़ने का प्रयास किया।
अपने आप को इस्लाम वाद के कवि मानते हुए इस्लाम धर्म के पांच मौलिक विश्वास...…
1.कलिमा
2.नमाज
3.जकात
4.रोजा(उपवास)
5.हज(मक्का यात्रा)....
इन्हें प्रतीक मानते हुए इस प्रक्रिया के लिए पांच पंक्तियों के(चरण) लक्षण रखे।
"अबाबील" का ऐतिहासिक दृष्टि कोण देखने से मालूम पड़ता है कि ईशदूत मुहम्मद साहब (स अ सं) के उद्भव कुछ महीनों पहले उनके दादाजी मक्का नगर के मुस्लिमों का पवित्र स्थल काबा के संरक्षक थे। 570 ई.में यमन के बादशाह अब्रहा ने अपने हाथियों की सेना की सहायता से काबा का नाश करने के उद्देश्य से मक्का नगर पर धावा बोल दिया। मक्कावासी अब्रहा की सेना का सामना न कर सके ।जब वे अब्दुल मुतल्लिब के आज्ञानुसार पहाड़ी इलाकों में शरण ले लिए।तब अब्रहा की सेना आगे बढ़ नहीं सकी।ऐसी स्थिति में परम प्रभु अल्लाह की सहायता के रूप में समुद्र की ओर से छोटे छोटे कंकर अपने चोंच में पकड़े अबाबील पक्षियों का झुंड अब्रहा की सेना को मार मारकर सत्यानाश कर दिया। बादशाह अब्रहा की भी मौत हुई।
इस घटनाक्रम को ऐसा बताया गया है कि सच्चे धर्म पर चलनेवालों को परम प्रभु अल्लाह किस प्रकार मदद करते हैं कुरान में बताया गया है (सूरे फील)
इस प्रकार ऐतिहासिक दृष्टि कोण के बुनियाद पर प्रमुख कवि करीमुल्ला ने अबाबील प्रक्रिया को अपनाया।ये अबाबील पक्षियों की चेतना, धैर्य और सामूहिकता तेलुगु मुस्लिम कवियों की कलम की धार बनी। कट्टरपंथी, फासिस्ट, आतंकवादी, साम्राज्य वादी भावनाओं पर अक्षर युद्ध करने वाला हर एक वर्ण अबाबील पक्षी ही है। तेलुगु वचन कविता में ये अबाबील प्रक्रिया केवल मुस्लिमो के लिए ही नहीं बल्कि समस्त पीड़ित जनता के पक्ष में ठहरती है।
हिजरी के दूसरे दशक में ईशदूत मुहम्मद साहब (स अ सं) के नेतृत्व में 313 साधारण सैनिक सुशिक्षित कुरैशियों की भारी सेना को हराने पर मिली पहली जीत धर्म युद्ध "बदर" को ही अपने अबाबील संकलन का नाम चुना है करीमुल्ला जी।
अबाबील कविता संकलन के आरंभ में.....एक मानव की हत्या समस्त मानवों की हत्या करने के बराबर है,एक मानव के प्राण बचाने वाला समस्त मानवों के प्राण रक्षक (पवित्र क़ुरआन:५:३२)
इन वाक्यों के द्वारा कट्टरपंथी, फासिस्ट ताकतों, आतंकवादी, साम्राज्य वादी हमलों में प्राण खोए अमर शहीदों को नमन करते हुए इस पुस्तक को अंकित करते हुए पीड़ित जनता के पक्ष में ठहरे करीमुल्ला जी।
अबाबील कविता संकलन में कविताओं की समीक्षा करने से मालूम पड़ता है कि इस्लामी इतिहास के साथ-साथ विश्व साहित्य के इतिहास का समग्र अध्ययन करके ही करीमुल्ला जी ने अबाबील प्रक्रिया में पद विन्यास किया। उदाहरण के लिए कुछ अबाबील देखे जैसे....
1.జీతం కోసం
జీవితాన్ని చిదిమేస్తారా?
మీకన్నా బిచ్చగాళ్ళు నయం
కరీము!
గ్రీన్ హంట్ అంటే ఇదేనా!
जीतं कोसम
जीवितान्नि चिदिमेस्तारा?
मीकंटे बिच्चगाल्लु नयं
करीमु!
ग्रीन हंट अंटे इदेना!
वेतन के लिए
जिंदगी को कुचलो मत
तुमसे कहीं याचक ठीक है
करीमु!
ग्रीन हंट यही है क्या!
2.నా కవిత్వం
హిచ్కాక్ కుక్క పిల్ల కాదు
అవార్డులకై తోకూపడానికి
కరీము!
సూరీడు తలవంచడని చెప్పు
ना कवित्वं
हिच्काक कुक्कपिल्ला कादु
अवार्डुलकै तलूपडानिकी
करीमु!
सूरीडु तलवंचडनि चेप्पु
मेरी कविताएं
हिच्काक कुत्ते के पिल्ले नहीं
पुरस्कारों के लिए पूंछ हिलाने
करीमु!
बोलो सूर्य सर झुकाता नहीं।
3.ఈ భూమి చుట్టూ
వలయంలా చిమ్మ చీకటి
సూర్యోదయం అవుతుందో లేదో
కరీము!
ఇంకా వెన్నెల రాత్రుల్లేవు
ई भूमिचुट्टू
वलयंला चिम्मचीकटि
सूर्योदयं अवुतुंदो लेदों
करीमु!
इंका वेन्नेल रात्रुल्लेवु
पृथ्वी को घेरी कालीघटा
जिधर देखो अंधकार
सूर्योदय होता कि नहीं
करीमु!
अब चांदनी रातें होते नहीं।
4.మస్జిద్ లో శరీరం
మస్తిష్కంలో రెక్కల గుర్రాలు
అల్లాహ్ తప్ప అన్ని గుర్తున్నాయి
కరీము!
నమాజ్ అయ్యిందో లేదో!
मस्जिद लो शरीरं
मस्तिष्कं लो रेक्कल गुर्रालु
अल्लाह तप्पा अन्नी गुर्तुन्नायि
करीमु!
नमाज़ अय्यिंनदो लेदो!
मस्जिद में काया
मन में इच्छाओं के घोड़े
अल्लाह के सिवा सब याद है
करीमु!
नमाज़ होती कि नही!
5.దౌర్భాగ్యులు పీఠాలపై
నిర్భాగ్యులు ఉరికంబాలపై
మూకస్వామ్యం పరిఢవిల్లుతోంది
కరీము!
రాజ్యాంగం వేలు పట్టుకో
दौर्भाग्युलु पीठालपै
निर्भाग्युलु उरिकंभालपै
मूकस्वाम्यं परिडविल्लुतोंदि
करीमु!
राज्यांगम वेलु पट्टुको।
निगोडे कुर्सियों पर
अभाग्य सूली के खंभों पर
मूकस्वाम्य पनप रहा है
करीमु!
संविधान की अंगुली पकड़ो!
इस प्रकार कवि करीमुल्ला जी ने सामाजिक विषयों पर अबाबील के माध्यम से लथाडा है।
समीउल्लाह खान
पी.जी.टी(हिंदी)
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