Sunday, January 30

साहित्य और मनोविज्ञान “कहानियों के संदर्भ में” - डाँ. के. संगीता (साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


साहित्य और मनोविज्ञान  “कहानियों के संदर्भ में”
-
डाँ. के. संगीता


    साहित्य मानव अनुभूतियों और सामाजिक व्यवहार का दर्पण होता है। साहित्यकार अपनी व्यक्तिगत कल्पनाओं और प्रतीकों के आधार पर, यथार्थ के धरातल पर, मानवीय संवेगों को संजोकर कोई रचना लिखता है। भाषा के माध्यम से अपने अंतरंग की अनुभूति, अभिव्यक्ति कराने वाली ललित कला साहित्य कहलाती है। साहित्य की व्युत्पति को ध्यान में रखकर इस शब्द के अनेक अर्थ प्रस्तुत किए गये है। यत प्रत्यय के योग से साहित्य शब्द की निर्मिति हुई है। शब्द और अर्थ का सहभाव ही साहित्य है। कुछ विव्दानों के अनुसार हितकारक रचना का नाम साहित्य है।

      साहित्य मनुष्य के विचारों की अभिव्यक्ति का एक बहुत ही प्रमुख माध्यम है। यह अपने ज्ञान के अमृत से समाज एवं संस्कृति दोनों को सार्थक दिशा देने का एक सशक्त पर्याय है। साहित्य के व्दारा मनुष्य की आत्मा और बुध्दि निर्मल होती है। साहित्य शब्द, अर्थ तथा भावनाओं की ऐसी त्रिवेणी है जो जनहित की धारा के साथ-साथ उच्चादर्शो की दिशा में प्रवाहित है। साहित्य की सबसे बडी सुंदरता यह है कि इससे आमजन लाभांवित होते है।

      किसी भी मनुष्य के मानसिक संवेगों, आंतरिक अनुभूतियों अतृप्त वासनाओं, दिवस्वप्नों और असामान्य व्यवहार के विश्लेषणात्मक अध्ययन को मनोविज्ञान कहते है। कुछ चरित्र अन्तर्मुखी प्रवृत्ति के होते है और कुछ चरित्र बहिर्मुखी प्रवृत्ति के है। मनोविज्ञान सामान्य जन के चिंतन व्यवहार और पेचिदगी भरे संवेगों का अध्ययन करता है। प्रत्येक रचनाकार अपने मानसिक अभावों की पूर्ति कलाजगत के संसार में करता है। वह अपने व्यक्तित्व की अपूर्णता या लघुता को पात्र में देखना चाहता है।

      साहित्य मूलत: अपनी युगीन स्थितियों की उपज होता है जो विषयवस्तु बनकर साहित्य में आती है। आवश्यकतानुसार हम वादों, प्रतिवादों या संवादो के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन करते है। राजेंद्र यादव के शब्दों में, कला-सर्जना, कलाकार की मानस-प्रक्रिया से ढलकर रुप लेती है, वह इस संसार के समानान्तर स्वतंत्र सृष्टि ही तो है- स्वतंत्र सृष्टि अर्थात निर्माण और संघटन के अपने नियमों, परम्पराओं से प्रेरित-परिचालित कलाकार इसके लिए मिट्टी भले ही इस वस्तु संसार से लेता हो, रुप उसका वह अपने ही स्वप्नों, स्मृतियों आवश्यकताओं दबावों, कुण्ठाओं और दृष्टियों के अनुरुप देता है।’

      युंग ने तो मानव के अवचेतन संभाग को सृजन-शीलता की कृति कहा है, जिसके माध्यम से समूची मानव-जाति के श्री सौंद्रर्य एवं समृध्दि का मार्ग प्रशस्त हुआ है और इसीलिए युंग ने इस सृजनात्मक शक्ति के मूलाधार अवचेतन सम्भाग को वैयक्तिक चेतन की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी एवं महत्वपूर्ण माना है। ज्यों-ज्यों मानव विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करता जा रहा है और उसे उस प्रयोग में सफलता मिलती जा रही है, त्यों-त्यों उसका संसार बडा होता जा रहा है। साहित्य और दर्शन के क्षेत्र में यह विस्तार और नवीनता बहुमुखी और व्यापक है। मनोविज्ञान में मानसिक भावों का कार्य कारण के साथ अध्ययन किया जाता है।

      व्यक्ति के विचार और भाव कैसे जाग्रत होते है, क्रियाओं को कैसे प्रभावित करते है, उनके मित्र और शत्रु रुप कौन-कौन होते है तथा साहित्य मानव अनुभूतियों और सामाजिक व्यवहार का दर्पण होता है। साहित्यकार अपनी व्यक्तिगत कल्पनाओं और प्रतीकों के आधार पर, यथार्थ के धरातल पर, मानवीय संवेगों को संजोकर कोई रचना लिखता है। दूसरी ओर मनोविज्ञान व्यवहार का विज्ञान है, जो मन में उठते अंतर्व्दन्व्दों, संवेगों और उव्देगो के प्रभाव का अध्ययन करता है। जीवन में जितना गंभीर प्रभाव बना रहता है, इन सब तत्वों का मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण के व्दारा अध्ययन किया जाता है। व्यक्ति का अदृश्य या प्रत्यक्ष व्यक्तित्व से कई गुणा बडा, सबल और सक्रिय होता है। साहित्यकारों ने इसी मनोविज्ञान को आधार बनाया और चरित्रों के परोक्ष व्यक्तित्व को नाना प्रकार से विश्लेषित किया क्योंकि साहित्य का क्षेत्र असीम है, अनन्त है तो मनोविज्ञान का क्षेत्र और विस्तार उस जगह है जहां मानव है।

      हिंदी साहित्य में मनोविज्ञान के विभिन्न तत्व पाये जाते है। हिंदी के प्राचीन तथा आधुनिक रचनाकारों में इसका थोडा बहुत आभास मिलता है। अपनी रचनाओं में प्रयुक्त उस नजरिये को, मानव मन को परखने वाली उनकी प्रतिभा का धोतक मानना ही उचित होगा। प्रत्येक राष्ट्र और समाज का साहित्य वहाँ के जन-साधारण की चित्तवृत्ति का प्रतिबिम्ब होता है। जनसाधारण की यह चित्तवृत्ति बहुत कुछ वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार होती है। यह निर्विवाद सत्य है कि साहित्य में जनभावनाओं का ही आलेखन होता है। इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि युग-विशेष की परिस्थितियों ने जिस प्रकार की विचारधारा को प्रस्तुत किया, वैसा ही साहित्य उस युग में रचा गया। अत: कहा जा सकता है कि युग विशेष की, तत्कालीन समाज की पूरी झलक अथवा प्रतिछाया साहित्य में अवश्य होती है।

      साहित्य में विविध प्रकार की रचनाओं को उनके गुण, धर्मो के आधार पर अलग किया जाता है, साहित्य में उन्हें विधा कहते है। साहित्य में विधा शब्द का प्रयोग, एक वर्गकारक के रुप में किया जाता है। विधाएँ कई तरह के है, जैसे- कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, कविता, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज आदि। साहित्य सृजन में साहित्यकार को अपनी कल्पना शक्ति का उपयोग करने की पूर्ण स्वतंत्रता तो होती है, किंतु युग जीवन के चित्रण से वह विमुख नहीं हो सकता, सामाजिक गतिविधियों से रचनाकार के मनमस्तिष्क में प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होती है, उसी का चित्रण उसकी रचनाओं में होता है।

      भारत में कहानी साहित्य का निर्माण प्रचुर मात्रा में हुआ है। वैदिक युग से आज तक विविध प्रकार की कथाएँ लिखी गयी। जिनमें समाज के विविध अंको का चित्रण करते हुए, भारतीय ज्ञान धर्म, दर्शन भक्ति-उपासना, राजकीय व्यवस्था, सामाजिक रीति-नीति आदि का निरुपण अत्यंत रोचक ढंग से हुआ है। आधुनिक हिंदी कहानी की विकास यात्रा भारतेंदु-युग से आरम्भ होकर अब तक गतिमय है। इस यात्रा में अनेक पडाव और मोड आए है। इस यात्रा में हिंदी- कहानी के अंतरंग तथा बहिरंग दोनों रुपों में व्यापक परिवर्तन होते रहे है।  मनुष्य का स्वभाव है कि वह जिस परिवेश में जीता है उसके प्रभाव से स्वयं को तटस्थ नहीं रख पाता। अपनी वैयक्तिक और सामाजिक समस्याओं के विषय में सोचना मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृति है। भारतेंदु युग से आज तक कहानियों के स्वरुप में समयानुसार परिवर्तन आए। युग के अनुरुप इन कहानिकारों ने परिस्थितियों के अनुरुप हुए परिवर्तन का चित्रण अपनी कहानियों में किया है। इन कहानियों में मनोविज्ञान के आधार पर मानसिक अंतव्दंव्द को भी कहानी का विषय बनाया। 

      मुंशी प्रेमचंद के अनुसार उत्तम कहानी वह होती है, जिसका आधार किसी मनोवैज्ञानिक सत्य पर हो। इसी से हिन्दी कथा-साहित्य के अन्तर्गत मनोविज्ञान का स्थान निश्चित हो जाता है। प्रेमचंद की कहानियों, कफन’, पूस की रात’, पंच परमेश्वर आदि ने मनोवैज्ञानिक तथ्य भरपूर मात्रा में पाये जाते है। उनके कई पात्र परिस्थिति वश कुण्ठित, आक्रामक, हीनता ग्रन्थि से पीडित तथा पलायन वृत्ति के है। जयशंकर प्रसाद अंतर्मुखी कथाकार रहे है। मधुवा, पुरस्कार उनकी उल्लेखनीय कहानियां  है, जिनमें मनोवैज्ञानिक तथ्य मौजूद है। उनकी कहानियों का कथ्य मनोवैज्ञानिक अंत:संवेदना को बढा देता है।

      प्रेमचंद के बाद साहित्य को एक नयी दिशा देने वाले जैनेंद्र ही है। इन्होंने अपनी कहानियों में बाहरी सौंदर्य के साथ मानसिक परिवेश की प्रधानता अधिक चित्रित की है। इन कहानियों में ये व्यक्ति की उलझनों और गुत्थियों को सुलझाते हुए दिखाई देते है। मानव मन का सूक्ष्म विश्लेषण; परत दर परत उसकी गांठे खोलना जैनेंद्र जी की विशेषता है। इनकी कहानियां सामाजिक विषयों पर मुक्ति की चर्चा नहीं करती बल्कि मनोवैज्ञानिक तरीके से मानव मन की व्याख्या करती है। ये पाठकों की उंगली पकडकर मंजिल तक नहीं चलते बल्कि उन्हें मंजिल तक का रास्ता सूझाते है। डाँ. इंद्रनाथ मदान के शब्दों में- “इनके लिए सामूहिक मुक्ति या सामाजिक मुक्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। इस मूल समस्या को, एकाकीपन की समस्या को प्राय: प्रेम तथा विवाह के माध्यम से उठाया गया है।”  

      जैनेंद्र जी की कहानियां व्यक्ति मन के यथार्थ को प्रस्तुत करती है। व्यक्ति, उसकी भावनाएं, समस्याएं व्यक्ति मन की गांठों का विश्लेषण, अहं की भावना आत्मपीडा, घुटन, यौन संबंध में सभी जैनेंद्र के कथा साहित्य में प्रमुखता के साथ मुखरित हुआ है। ये अपनी कहानियों में कथा शिल्प से ज्यादा मानव मन की सैर करते है। जैनेंद्र जी की कहानियों के पात्रों में अंतव्दंव्द तथा मनस्ताप आदि मनोवैज्ञानिक प्रत्यय पाये जाते है जो व्यक्ति के एकाकीपन तथा मन की रिक्तता के धोतक है। इस दृष्टि से एक पन्द्रह मिनट, नीलम देश की राज कन्या आदि का उल्लेख किया जा सकता है। जैनेंद्र साहित्य ने हमें एक नई दिशा एवं नई सोच दी है। उन्होंने अपनी रचनाओं में विशेष रुप से कहानियों को घटनात्मक स्तर न देकर चरित्र और मनोवैज्ञानिक सत्य का रुप देने का भरसक प्रयास किया है। उन्होंने अपनी कहानियों को सामाजिक धरातल के साथ-साथ व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान किया है।

      प्रभाकर माचवे के अनुसार – वह मन की खदान से खुरदरी निकली हुई सम्मति अनुभूति की खराद पर चढकर अच्छी तरह कटी-छँटी साफ और निर्भीक, चिर उधत् रहती है। इसी चाह के कारण ही तो जैनेंद्र हर प्रकार के व्यक्ति के साथ बडी ही आसानी से मिल जा सकते है और उस प्रयोग के लक्ष्य के अंतरंग का कोना-कोना छानने टटोलने पर ही उसे वे छोडते है।’ 

      इसी श्रृंखला में इलाचन्द जोशी की यज्ञ और जागृति कहानी में फ्रायड के उदात्तीकरण तथा विद्रोही में असामान्य मनोग्रंथियों का चित्रण पाया जाता है। उन्होंने फ्रायड के सैक्स और स्वप्न सिध्दांत के कुछ सूत्रों को लेकर केस हिस्ट्रियाँ लिखी है। यह सच है कि उनके पात्रो में इन ग्रंथियों से मुक्ति छ्टपटाहट है। प्रेम और घृणा, एकाकी मैं, परित्यक्ता डायरी के नीरस पृष्ठ आदि कहानियाँ राष्ट्रीय स्वतंत्रता, क्रांतिकारिता पुलिस की सीटी, मानसिक अंतर्व्दंव्द (पुरुषों के भाग्य), कुण्ठाओं  (चिडिया घर) आदि पर आधारित है। यशपाल की कहानी जीवदया भौतिक व्दंव्द तथा युगीन समस्याएं रेखांकित करती है। भगवती चरण वर्मा की फूलों की क्रूरता सामाजिक विद्रूपताओं को दर्शाती है। 

      भगवती प्रसाद वाजपेयी ने व्यक्ति के व्यक्तित्व और अंर्तव्दंव्द को लेकर कहानियाँ लिखी है। उन्होंने अपनी कहानियों में मिथ्या अहम भावना को सामाजिक विकास के लिए हानिकारक बताया है। उपेंद्रनाथ अश्क की डाची कहानी मानव-जाति की आंतरिक पीडा, अतृप्त इच्छाओं तथा बेबसी को उजागर करती है। इस श्रृंखला में अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर, रांगेय राघव, पाण्डेय बेचैन शर्मा उग्र आदि के नाम उल्लेखनीय है। 

      सन् 60 के बाद नयी कहानी पारिवारिक तथा सामाजिक बिखराव मूल्यों के विघटन अंत:व्दंव्द, टूटते संबंध स्वार्थपरता, मनोग्रंथियों आदि विषयों को लेकर चल पडी। आधुनिकता बोध बढने लगा। पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण हमारे परम्परागत विश्वास और आदर्श हमसे दूर हुए। जीवन में तनाव बढने लगा जिसमें बाहृय कारणों के अतिरिक्त कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी है। आधुनिक युग की कहानियों में पारिवारिक विघटन का चित्रण नैतिक मूल्यों का हनन, रिश्तों में टूटन आदि का मुख्य कारण स्त्री-पुरुष में सापेक्ष समानता और इससे उत्पन्न स्पर्धा की भावना। इन कहानियों में कहानिकारों ने कार्यरत नारी के मनोवैज्ञानिक व्दंव्द का चित्रण अपनी कहानियों में किया। राजेंद्र यादव की टूटना में इसी मन: स्थिति का चित्रण उपलब्ध होता है। प्रतिक्षा, पंच हजारी, जहाँ लक्ष्मी कैद है, ढोल अपने पार, छोटे-छोटे ताजमहल आदि कहानियों में व्यक्तित्व के विघटन तथा कुण्ठाओं को चित्रित किया है। 

      निरुपमा सेवती की कहानी खामोशीको पीते हुए पति-पत्नी के संबंध विच्छेद की कहानी है। दीप्ति खंडेलवाल की कहानी क्षितिज में ऐसी नारी का चित्रण है, जो चाहकर भी संबंधों को तोड नहीं पाती और अपने अस्तित्व का बोध उन्हीं सीढियों से कर पाती है, जिन पर वह स्वयं ही चढा-उतरा करती है। अविश्वास के कारण दोनों एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। दोनों ही अपने-अपने वार करने के लिए तैयार रहते हैं, क्योंकि शरीर से पास होते हुए भी वे मन से दूर है। उषा प्रियंवदा की पूर्ति कहानी में तारा के माध्यम से अविवाहित कामकाजी नारी की कुंठा का चित्रण किया गया है। पारिवारिक दायित्व को निभाते-निभाते वह कुण्ठित हो जाती है। नैसर्गिक प्रवृति का दमन अनेक कुंठाओ और विकृतियों को जन्म देता है। मां-बाप के हृदय में लडकी के प्रति उत्तरदायित्व की कोई भावना नहीं है, वे तो उसके माध्यम से स्वार्थ पूर्ति करना चाहते है। वह अपने माता-पिता, भाई-बहनों के संबंध में आत्मीयता का अभाव झेलती हुई कुंठित होती रहती है। सोमा वीरा की कहानी दो आँखों वाले चेहरे में अविवाहित अपर्णा के माध्यम से ऐसी नारी का चित्रण किया है, जो इच्छित पुरुष को पा सकने की असमर्थता में कुंवारी रह जाने की नियति स्वीकार कर लेती है।  

         उषा प्रियंवदा की कहानी झूठा दर्पण में माता-पिता के असंगत संबंधों से घबराकर अमृता अविवाहित रहते हुए नौकरी व्दारा जीवन-यापन करना चाहती है। इन्हीं की कहानी छुट्टी का दिन की नायिका भी इसी कुंठा से त्रस्त है। उसे अपना जीवन उस मरुस्थल का आभास देता है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं। कार्यशील नारी के कुंठित व्यक्तित्व की विविध समस्याओं पर दृष्टिपात करते हुए कहानीकारों ने जो स्थितियाँ चित्रित की है, उसके अनुसार प्राय: कुंआरी इसलिए रह जाती है कि नौकरी करती है या वह नौकरी इसलिए करती है कि अविवाहित है। यही उसकी विडम्बना है, जो विविध कोणों से आँकी और प्रस्तुत की गई है। अधिकांश महानगरीय परिवेश में रहने वाली स्त्रियाँ शिक्षा समाप्त करते ही नौकरी पा लेना चाहती है कि उन्हें उपयुक्त जीवन साथी की प्राप्ति तक का खाली समय बिताना है। ज्ञान के बोध से प्राप्त होने वाला आत्मसंतोष भी उन्हें इस रास्ते पर प्रेरित करता है। आत्मसंतोष की पूर्ति के लिए वह नौकरी को महत्व देती है और स्वयं को प्रतिष्ठित करना चाहती है। नौकरी प्रारंभ करते समय उन्होंने बाद की उम्र का अकेलापन न तो चाहा होता है, न सोचा ही होता है। किंतु कुछ ही समय पश्चात युवावस्था की उत्साह पूर्ण इच्छाएँ मरने लगती है, निपट अकेलेपन की नियति भी स्पष्ट होने लगती है और उनके जीवन में घुटन, कुण्ठा एवं तनाव समा जाते है। ममता कालिया की कहानी जिंदगी सात घंटे बाद की नायिका आँफिस के सात घण्टों के बाद की जिंदगी उसे अकेलेपन की व्यथा से अक्रांत करती जाती है- सुबह दस बजे का उत्साह, शाम सात बजे का डिप्रेशन- - - - ।    

      इसी अकेलेपन की कुण्ठा से जूझ रही है खेल कहानी की लेखा, जो कि स्वच्छ्न्द विचारों की संरक्षिका है। रामकुमार भ्रमर की सचशूल कहानी में नायिका की कुण्ठा को चित्रित करके लेखक इस तथ्य की स्थापना करना चाहते है कि कोई लडकी कुँवारी नहीं रह सकती। तुम्हें एक सहारे की जरुरत है। रजनी पनीकर की कहानी गुलाब के फूल और जिंदगी के काँटे की नायिका भी जिंदगी से ऊबकर सोचती है कि उसके पास रुपया, पैसा, इज्जत शोहरत सब कुछ है, फिर भी वह जीवन में एकदम अकेली है। मणिका मोहिनी की कहानी अभी तलाश जारी है की नायिका भी अपने अकेलेपन घबराकर कहती है- आई वाण्ट ए कम्पनी। स्वावलम्बिनी नारी की तृषाक्रांत को शिवानी ने स्वयंसिध्दा कहानी में चित्रित किया है। मन्नू भण्डारी की कहानी जीती बाजी की हार में एक कुंठित नारी के मानसिक अंतर्व्दंव्द को चित्रित किया गया है। कार्यरत नारी के यथार्थ स्वरुप को इन कहानकारों ने चित्रित किया। मानसिक रुप से असंतुष्ट रहती है। उनके इस मनोवैज्ञानिक व्दंव्द को तथा कार्यरत नारी के जीवन की सच्चाइयों को कहानी के माध्यम से समाज के सामने प्रस्तुत किया गया है। मोहन राकेश, कमलेश्वर, अमरकांत, धर्मवीर भारती, निर्मल वर्मा आदि का योगदान स्पृहणीय है। 

      मोहन राकेश की एक और जिंदगी’, परमात्मा का कुत्ता’, पहचान’, कमलेश्वर की तलाश’, दुखभरी दुनिया’, राजा निरवंसिया’, सुबह का सपना आदि कहानियाँ पौरुषहीनता, भय, कुण्ठा आदि मनोवैज्ञानिक प्रत्ययों को रेखांकित करती है। निर्मल वर्मा की डायरी का खेल और परिंदे’, फणीश्वरनाथ रेणु की पंचलाइट’, ठेस आदि में अहम भावना तथा काम-ग्रन्थि का उल्लेख है। उषा प्रियंवदा ने दाम्पत्य जीवन-संघर्ष मूल्यों आदि की मार्मिक व्यंजना की है। मन्नू भण्डारी ने अपनी कहानियों में स्त्री-पुरुष संबंध, अहम भावना, मानसिक क्षय, मनस्ताप आदि मनोवैज्ञानिक प्रत्ययों को चित्रित किया गया। शिवप्रसाद सिंह की नन्हों’, कलंकी अवतार’, ज्ञानरंजन की संबंध’, गिरिराज किशोर की ‘केस’, दूधनाथ सिंह की ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, धर्मवीर भारती की ‘गुल की बन्नों’, काशीनाथ सिंह की ‘लोग बिस्तरों पर’, सिध्दीकी की ‘सनक’, तीन काल कथा आदि कहानियां मनोविज्ञान के प्रभाव में लिखी गई है। 

      उपर्युक्त रचनाकारों के अतिरिक्त भीमसेन त्यागी, हरिशंकर परसाई, रविंद्र कालिया, प्रयाग शुक्ल, शैलेश मटियानी आदि कहानीकारों ने भी इस क्षेत्र में पर्याप्त योगदान दिया। संक्षेप में यह कि मनोविज्ञान संबंधी प्रत्यय हिंदी कहानियों में भरपूर मात्रा में मिलते है जो कि आधुनिक जीवन के उपज है।   


संदर्भ ग्रंथ :


1. राजेंद्र यादव, एक दुनिया समानांतर’, पृ.क्र.17

2.  भवानी शंकर उपाध्याय, कार्ल गुस्ताव युंग विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान’, पृ.क्र.259

3.  प्रेमचन्द, कुछ विचार’, पृ.क्र.30

4. राजेंद्र यादव, कहानी स्वरुप और संवेदना’, पृ.क्र.36 

5. जैनेंद्र के विचार’, पृ.क्र.28, संपादक प्रभाकर माचवे, पूर्वोदय प्रकाशन, नई दिल्ली 

6. डाँ. रामदरश मिश्र, नरेंद्र मोहन, हिंदी कहानी दो दशक की यात्रा पृ.क्र.100 

7. रामकुमार भ्रमर, सचशूल (श्रेष्ठ प्रेम कहानियाँ), राजेंद्र अवस्थी पृ.क्र.208

8. शशि प्रभा शास्त्री, खुली पलके पृ.क्र.17

9. मणिका मोहिनी, अभी तलाश जारी है’, पृ.क्र.68 

10. महीप सिंह, ‘घिरे हुए क्षण (घिराव) पृ.क्र.46 

11. शिवानी, अपराजित (स्वयं सिध्दा) पृ.क्र.52

12. शशिप्रभा शास्त्री, ग्रोथ (अनुत्तरित) पृ.क्र.25

13. रविंद्र कालिया, मौत (काला रजिस्टर) पृ.क्र.61 



डाँ. के. संगीता
असि. प्रो. आर्ट्स कालेज
उस्मानिया युनिवर्सिटी,
हैदराबाद, तेलंगाना
93924 28593

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