Sunday, January 30

आधुनिक युग के साहित्य में समायित 'साधारण आादमी' की संकल्पना - डॉ जटावत श्रीनिवास राव (साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


आधुनिक युग के साहित्य में समायित 'साधारण आादमी' की संकल्पना 
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डॉ जटावत श्रीनिवास राव 

    आधुनिक युग में पहली बार साहित्य के अन्तर्गत 'साधारण आदमी' को विषय के रूप में चुना गया जो कि काफी परिवर्तन के बाद हिंदी साहित्य में एक जबर्दस्त आन्दोलन पूर्ववर्ती साहित्य और सामाजिक परिवेश की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप चला क्योंकि विलास और प्रेम को छोड़कर जैसे साहित्य का कोई दूसरा अर्थ ही न था । हिंदी साहित्य को साधारण लोगों तक पहुँचा कर सार्थक बनाने के लिए भारतेन्दु युग का साहित्यिक आंदोलन शुरू हुआ था।
    समान्तर कहानी आंदोलन के माध्यम से कमलेश्वर ने आम आदमी को साहित्य में पूर्ण प्रतिष्ठा प्रदान की।मानसिक धरातल पर लिखी जानेवाली   मनोविश्लेषणवादी कहानियों के कहानिकार : जैनेन्द्र,अज्ञेय और इलाचन्द्र जोशी आदि पात्राें के संदर्भ में कहानिकार कमलेश्वर ने 'नयी कहानी' की भूमिका में लिखा है कि- "भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के महान इतिहास और व्यक्तित्वों की रोमांटिक परछाइयाँ ही साहित्य में आई जो अपनी कुण्ठित और दमित वासनाओं की तृप्ति खोज रही थी। कोई दबंग, हाड़मांस का क्रांतिकारी साहित्य में नहीं घुस पाया। जीवन को झेलनेवाले केन्द्रीय पात्रों की जगह लिजलिजे, संदर्भों से कटे, कुण्ठाग्रस्त उपजीवी पात्र सामने आ गए, जो जिन्दगी को वहन करने वाले व्यक्तियों को अपदस्थ कर स्वयं उनकी जीवन पूँजी के साथ भोग और मानसिक विलास में रत हो गए और अपरिग्रह वेदना और दुखवादी दर्शन का ढोंग रचने लगे"।
    नयी कहानी के प्रमुख प्रवक्ता के रूप में कमलेश्वर ने नयी व्याख्या और परिभाषा से अपने समय को जोडा़। समान्तर कहानी आंदोलन में नयी कहानी को विकसित करते हुए आम आदमी को जोड़ने वाले सर्वप्रथम कमलेश्वर ही हैं।
      'आम आदमी' की परिधि में मजदूर, छोटा किसान, आफिस का कलमगसीट-कूली, टांगा चालक, अध्यापक से लेकर सिनेमा के एक्टर्स, वेश्या, कंपोजिटर तथा फुटपाथ और झुंगी झोंपड़यों में रहने वाले लोगों को समेटा जा सकता हैं। डाॅ. सतीश दुबे ने अपनी लघुकथाओं का आधार इसी साधारण 'आम आदमी' को बनाया है।
     इनकी 'समकालीन सौ लघुकथाएँ'  नामक संग्रह में मानवीय सम्बन्ध सर्वोपरि है।उनकी कथाएँ आम आदमी को खोजती है,जो बाजा़र, राजनीति और अव्यवस्था की भीड़ में खोया हुआ है। इस संग्रह की चौखट, चिड़िया ने कहा..,संजीवनी, जीवनफरोश, स्टेट्स सिंबल, नाॅन लिविंग थिंग, खौफ आदि जैसी अनेक लघुकथाएँ जहाँ एक ओर व्यक्ति तथा समाज की सोच में आ रहे बदलाव को चित्रित कर रही है तो दूसरी ओर अनुभव, गोबर, उसूल, रामभरोसे, भगवान के घर आदि लघु कथाएँ मानवीय मूल्यों के ह्रास होते संबंधों की दास्तान हैं।
    इससे इस तथ्य का भी पता चलता है कि लघुकथाएँ आम आदमी जीवन के विस्तृत कैनवास को बड़े ही कम शब्द प्रयोग द्वारा प्राय: वैसी ही विस्तृत अनुभूति देती है, जैसे अन्य गद्य विधाएँ। इसलिए लघुकथाओं पर और शोध होना आवश्यक और उचित ही प्रतीत होता है।
     आज के परिवेश में आदमी मुख्यत: दो रूपों में हमारे सामने दिखाई देते हैं जिसमें एक है खास आदमी तथा दूसरा है आम आदमी।
      आाधुनिक युग के आाजाद भारत में आज 25 प्रतिशत खास आदमी अभी भी मौजूद है जो कि अपनी इच्छानुसार सत्ता को मजबूती से चलाते रहते है और अपनी अलग ही दुनिया बनाने व बिगाड़ने में जुटे रहते हैं। 75 प्रतिशत ऐसे लोग भी भारत में रह रहे हैं जो कि सत्ता से तो वंचित है ही साथ ही साथ मेहनथ मजदूरी करके भी भरपेट भोजन उनको नसीब नहीं हो रहा है। ये निम्न वर्ग की श्रेणी में आने वाले लोग है।
     आज के परिवेश में निम्न वर्ग के आदमियों को विभिन्न नाम रूपों से जाना जा सकता है। जैसे-सामान्य जन, मामूली आदमी, साधारण जन या आम आदमी अर्थात जो आर्थिक तंगी के कारण समाज के साथ कदम मिलाने की होड़ में बुरी तरह तहस-नहस हो चुका है वहीं निम्नवर्ग का इंसान है। यह इंसान मशीनी युग के आगमन और विज्ञान से भरपूर आज की दुनिया में भी खाने के लिए मजदूरी की तलाश में इधर-उधर भटकता दिखाई देता है।
    स्वतंत्रता के 50 वर्ष बीत चुकने के बाद भी लेखों, संपादकीयों और गोष्ठियों में साधारण इंसान को ब्रह्म की तरह खोजना पड़ता है या साहित्यकार एक अमूर्त कल्पना में ही 'आम आदमी' की रचना कर डालता है। इसका प्रमुख कारण है अधिकतर साहित्यकार मध्यवर्ग से संबंधित हैं। इसलिए निम्न वर्ग का अनुभव उन्हें लेश मात्र भी नहीं है।
      "जून, सन् 71 में आई.आई.टी, बंबई में 'समान्तर लेखन' की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण गोष्ठी हुई थी, जिसमें देशभर से नई रचनाशीलता से प्रतिबद्ध सक्रिय लेखक जमा हुए थे वही 'मामूली आदमी' की बात पहली बार उठी थी।"     ۔कमलेश्वर
       आज स्थिति काफी बदल गई है। आज का पाठक अब सतर्क हो चुका है, वह मामूली और विशिष्ट की पहचान भली भांति कर सकता है। जिसमें साहित्य को मानवतावादी सौंदर्य के लिए और सरकारवादी राजनीति को अपने वोट के लिए सिर्फ आदमी की जरूरत पड़ती है। स्वार्थवश ये दोनों ही साधारण आादमी का प्रयोग अपनी इच्छानुसार स्वार्थ की पूर्ती के रूप में प्रकृति को इस्तेमाल करना शुरु किया। जब यही इच्छा सामाजिक, सांस्कृतिक प्रतिष्ठा और शक्ती के रूप में जन्मी तो साहित्य में 'हीरों' पैदा होने लगे। जैसे कालिदास के सौंदर्यवादी राजा दुष्यंत। ये 'हीरो' साहित्य की व्यक्तिवादी सामाजिकता को छोड़कर अहंवादी व्यक्तिवादी सामाजिकता को छोड़कर अहंवादी व्यक्ति का रूप लेने लगे।
      आज के साहित्य का सामान्य जन  या मामूली आदमी वह जो किसी भी क्षेत्र में नियंता न होकर भी हर कार्यक्षेत्र की आधारशिला बनाता है। वह अमूर्त और दार्शनिक इंसान नहीं, बल्कि आदमी और आदमी के बीच सामाजिक सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों की अति से शोषित व्यक्ति है। वे अल्प जन है जो अपनी मर्जी के मालिक है, तथा जो अपनी मर्जी के मालिक नहीं है वे बहुजन कहलाते हैं।
     वस्तुत: सामान्य जन अपने अधिकारों के असमान संघर्षों में आज भी लगातार पिटता जा रहा है। वह आज की उत्पादन व्यवस्था और जीवन प्रणाली में सत्ता, सरकार, आक्रांता, राजनीति और पूँजीवाद के झूठे दिलासों से उत्पीड़ित,अस्थित्व के लिए नियंत्रित, अधिकार रहित, आर्थिक रूप में शोषित सामाजिक स्तर पर दलित अपने टूटे हुए वर्तमान और अँधेरे में डूबे भविष्य के लिए असमान ऐतिहासिक लड़ाइयों से जूझता, ज्यादातर हारता है। फिर भी संघर्ष को मरते दम तक खींचने वाला अल्पजन के समक्ष खड़ा यह आदमी ही वास्तव में 'साधारण आदमी' है।
    यदि आम आदमी को वास्तव में परिवर्तन की चाहत है तो उसे परिवर्तनकामी और परिवर्तनवादी में सबसे पहले बदलना होगा। आजकल राजनीतिज्ञ भी लेखन को भ्रष्ट करके सामान्य आदमी को धोखा देने से नहीं कतरा रहीं है। आज यह स्थिति बन गई है कि साधारण आदमी पर लिखी गई रचना स्वयं आम आदमी को ही पढ़ने के लिए नसीब नहीं होती क्योंकि यह अभी अनपढ और पिछड़ा हुआ है। उसके पास आर्थिक विपन्नताएँ ऐसी जम गई है कि वह लाख कोशिश करे फिर भी उससे बच नहीं पा रहा है। "साहित्य सिर्फ लिखा और पढा़ ही नहीं जाता, वह वातावरण भी तैयार करता है, कामना को इच्छा में बदलता है, आम आदमी के मिजाज और तेवर को भी परिवर्तित करता है उसका यही सहज विवेक उसे साहित्य से परोक्ष रूप में जोड़ता है और 'ज्ञान' प्राप्त कर लेने के बाद वह उसी साहित्य का अध्येता या पाठक भी बनता है।"   - कमलेश्वर



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