साहित्य मंथन
-- उषा कुमारी
हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उदय प्रकाश जी एक बहुचर्चित
व्यक्तित्व है । हिन्दी कहानी विधा के क्षेत्र में इनके योगदान सरहनीय है । आपने
लगभग 60 से अधिक कहानियों की संरचना की है । इनकी कहानियाँ सामाजिक , राजनैतिक , पारिवारिक , ऐतिहासिक आदि प्रवृत्तियों
के आधार पर रचित है । उन्होनें अपनी कहानियों में नई –नई शैलियों का प्रयोग कर हिन्दी कहानी जगत को एक
नई दिशा प्रदान की है । आपके लिए साहित्य ही मुक्ति का मार्ग है । आप कई
पुरुस्कारों से सम्मानित हैं ।
उदय प्रकाश
जी द्वारा रचित कहानियों का संग्रह नौ अलग –अलग पुस्तकों में अलग –अलग नामकरण से
किया गया है । उनकी पहली कहानी संग्रह ‘ दरियाई घोडा ‘ नाम से है ।
इस संग्रह के अंतर्गत सात कहानियों का समावेश किया गया है । इसमें पहली कहानी ‘ मूंगा , धागा और आम का
बौर ‘, दूसरी कहानी ‘दरियाई घोडा ‘,
तीसरी कहानी ‘मौसजी ‘, चौथी कहानी ,‘ज्ञ, जेड , अलिफ , जगपति और
कर्फ़्यू’, पाँचवी कहानी ‘पुतला ‘,
छठी कहानी ‘ दद्दू तिवारी ; गणनाधिकारी’ और अंतिम
सातवीं कहानी ‘ टेपचू ’ है ।
उपरोक्त
कहानियों में पहली दो कहानियाँ ‘ मूंगा ,धागा और आम का बौर ‘ और ‘ दरियाई घोड़ा ‘ । इन दोनों
कहानियों की कथावस्तु पारिवारिक है । अगली कहानी ‘ मौसाजी ‘,‘पुतला
‘ और ‘टेपचू ‘ में सामाजिक परिवेश की झलक मिलती है । इसके पश्चात ‘ज्ञ,जेड , अलिफ , जगपति और
कर्फ़्यू ‘ और ‘ दद्दू तिवारी ; गणनाधिकारी ‘ इसमें राजनैतिक परिवेश की झलक हम पाते है ।
उदय प्रकाश
की कहानियाँ परिवेश के साथ गहनता से संबंध रखती है । इसलिए इनकी कहानियों में मूल
चरित समाजिकता से सम्पन्न है । विभिन्न सामाजिक समस्याओं का उल्लेख इनकी कहानियों
में देखने को मिलता है । हिन्दी कहानी विधा में आरंभ से ही सामाजिक परिवेश से
संबन्धित कहानियाँ देखने को मिलती है । स्वतंत्रता के पश्चात आयी हुई कहानियों में सामाजिक चित्रण
आदर्श से मुक्त देखने को मिलती है । इसके प्रतिक्रिया स्वरूप अकहानी का जन्म हुआ , जो सामाजिक और
कलात्मक दोनों स्तरों पर स्थापित मूल्यों और आधारों को अस्वीकार करती है ।
तत्पश्चात , सचेतन कहानी , समांतर कहानी , सक्रिय कहानी
आदि विभिन्न आंदोलनों में समाजिकता केंद्र में देखने को मिलती है ।
अंततः सामाजिक स्थितियों में जिस प्रकार तीव्र परिवर्तन होता रहा , उसी प्रकार विविध सामाजिक परिवेशों को देखने की दृष्टि में भी विकास और परिवर्त्तन देखने को मिलता है । इस संदर्भ में डॉ. पुष्पपाल सिंह का कथन इस प्रकार है – “ समकालीन कहानी का कथ्य इतना विविधतापूर्ण और अपनी विस्तृति में इतना व्यापक है कि उस सबको रेखांकित करना सहज नहीं है । युग -जीवन की कोई भी समस्या चिंता और महत्वपूर्ण प्रश्न ऐसा नहीं है जिसे कहनी का विषय न बनाया गया हो । आज कहानीकार के चिंतक सरोकार इतने व्यापक और गंभीर है कि समाज और परिवेश की प्रत्येक समस्या उसे आंदोलित कर जाती है , जिसका प्रतिफलन उसकी रचना में होता है । इस प्रवृत्ति को देखकर ही लगता है कि कहानी लेखकीय प्रतिक्रिया के साथ जीवन का ई . सी . जी . है । “ १
‘दरियाई घोड़ा ‘ कहानी संग्रह के अंतर्गत तीसरी कहानी ‘ मौसजी , है । मौसाजी एक भूतपूर्व स्वतंत्रता सेनानी है । अपने आस –पास इन्होंने एक ऐसे संसार का निर्माण कर रखा है जोकि काल्पनिक है । वास्तविक जगत से उसका कोई भी सरोकार ही नहीं है । अपने काल्पनिक जगत से वे कभी बाहर ही नहीं आना चाहते है और वास्तविक जीवन से कोसो दूर है । इस प्रकार वे एक दयनीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त है । स्वतंत्रता सेनानियों में उनकी पहुँच दादाभाई नौरोजी से लेकर मोरारजी देसाई तक है ।
वे अपने बेटों को बड़े –बड़े ओहदे पर बताते हैं । जोकि वास्तविकता के बिल्कुल विपरीत है । बड़ा लड़का होमगार्ड्स कि ट्रैनिग में भर्ती हो गया था और आब पेपर मिल में मामूली चौकीदार है । जबकि मौसाजी उनके बड़े बेटे को महेंदर बिड़ला के ओरिएंट पेपर मिल का मैनेजर बताते है । दूसरा लड़का राजेंद्र जंगल विभाग में रेंजर है । ऐसा मौसाजी का कहना था जबकि वह फॉरेस्ट गार्ड की नौकरी करता था । सबसे छोटा लड़का नरेंद्र अभी पढ़ ही रहा था और बुरी आदतों का शिकार था । इतने पर भी मौसा जी कहते है कि उनके तीनों बेटे श्रवण कुमार की तरह है जो बिना आज्ञा के कोई भी कार्य नहीं करते । परंतु वास्तव में जब मौसाजी बीमार पड़ते है तो उनके किसी लड़के ने उन्हें झाँककर तक नहीं देखा । इस प्रकार मौसाजी अपने ही द्वारा रचित झूठी दुनिया में जीने के लिए मजबूर है । और अपने इर्द –गिर्द एक झूठे संसार की रचना कर ली है , जिसे वे अंतिम सच मान बैठे है ।
लेखक उदय प्रकाश जी ने मौसजी के जीवन शैली को कहानी में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है – “ मौसाजी आप जहां , जिस हालत में रहते है उसे जानिए । उसे समझने की कोशिश कीजिए । आखिर औकात का अंदाज़ा तो आदमी को होना ही चाहिए । अगर आप अपनी स्थिति को नहीं पहचानेंगे तो पूरी जिंदगी गलत हो जायेगी । आपको अपने लिए कुछ वास्तविक ढंग से सोचना चाहिए । हो सकता है , आगे चलकर हालत और बत्तर हो जाये । मौसाजी आप एक सीधे- सादे गरीब आदमी है जिसके पास मेहनत की आखिरी पूंजी भी नहीं बची है । आप एक बेहद गए गुजरे बूढ़े आदमी हैं । अगर लड़कों के मन में मकान के लिए लोभ जागा तो आप फुटपाथ पर भीख मांगते नज़र आएंगे । मौसाजी होश में आईये । “२
मौसाजी का छोटा बेटा जब जेल जाता है और वहाँ पर उसकी बड़ी कुटाई भी होती है । यह खबर जब मौसजी को मिलती है तब वह पुलिस स्टेशन पहुँचते है और अपनी पहुँच बड़े –बड़े लोगों से बताने लग जाते है । उनकी बातों का कोई खासा प्रभाव थानेदार पर नहीं होता और वह मौसाजी जी से इस प्रकार कहता है – “ चले आते हैं साले पगलखाने से निकलकर सीधे । “ थानेदार बुड़बुड़ाया , “अबे में तेरी केस हिस्ट्री नहीं पुछ रहा हूँ । कोई ज़मीन – वमीन का इंतखाब है ? जमानत भरनी पड़ेगी । आपके सपूत चोरी के जुर्म में पकड़े गये हैं । चले आते हैं ऊटपटाँग बकने । साला, हर कोई नेतागिरी झाड़ता रहता है ।“३
यह सब सुनकर मौसजी धीरे- धीरे बाहर की तरफ रेंगने लगे । उनके कंधे झुके हुए थे । टांगे थरथरा रही थीं । वे चुपचाप गाते से बाहर निकाल गये । लेखक के पूछने पर मौसाजी बोले – “ बेटा जो थानेदार मिश्रा है न ! इसके दद्दा के साथ हमाई पुरानी दाँत – काटी रोटी की दोस्ती हती । तो उसने हाथ जोड़ दिये । हमाए पाँव छुए । कैन लगा ,‘मौसाजी, बड़ी गलती हो गयी । हम खों का मालूम हतो कि नरेंदर आप – ई को मोड़ा (लड़का) आय । पै जो क़ानूनी गलती भई सो भई , अब हम का करें? आप- ई कछू बताओ । ‘ हमने कही ,‘ कौनों बात नई बेटा, तुम तो अपनो फर्ज़ पूरी करो । नमक बजाओ।‘ जब हम उतै से आवन लगे तो कैन लगा कि मौसाजी चलो , हम आप खों आपी जीप में घर छोड़ आयें, पै हमने मिश्रा थानेदार को मना कर दिया ।“४
वर्तमान समाज में मौसाजी जैसे व्यक्तित्व वाले लोग प्रत्येक स्थान पर देखने को मिलेंगे । जो वास्तविक संसार के बजाए अपने काल्पनिक जगत में जीना अधिक उपयुक्त समझते है । लेखक ने कहानी के माध्यम से समाज के वास्तविकता को पाठकों तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया है।
‘ दरियाई घोड़ा ‘ संग्रह में सामाजिक परिवेश से जुड़ी अगली कहनी है ‘ पुतला ‘ । प्रस्तुत कहानी में शोषक वर्ग के विरोध में शोषित वर्ग का आक्रोश लेखक ने किशनू के माध्यम से किया है । चौधरी भीखमदास और उसका छोटा भाई हरसूप्रसाद है । गाँव में भीखमदास का रौब चलता है । चौधरी भीखमदास चौहदी को अपनी इज्ज़त मानता है। चौहदी के खिलाफ चल रहा मुकदमा भी वह जीत लेता है । चौहद्दी में प्रदर्शिनी , मेला ,हाट सबकुछ लगता है और उसकी प्रतिष्ठा और ख्याति का कारण यह है कि यहाँ पर हर साल रामलीला का आयोजन किया जाता है ।
रामायण में
राम का पात्र भीखमदास का लड़का हरनारायण करता है जबकि रावण का पात्र गाँव के मोची
धनुख का लड़का समनू करता है । हरसूप्रसाद रामलीला के आयोजन हेतु ३०००/- रुपए भेजता
है । रामलीला के लिए पुतला बनाने का काम ढुनू पासी के लड़के किशनू को सौंपा जाता है
। ढुनू पासी पहले से ही कर्जदार था इस कारण उसके लड़के को यह कार्य पूरा करना पड़ता है । पुतला बनाने की कला में वह
निपुण है । दिन रात की मेहनत से उसने रावण ,कुंभकर्ण और
मेघनाथ तीनों के पुतले बना डाले ।
किशनू को अपने मरे हुए पिता की याद हो आती है उसे
लगता है कि – “ सौ रुपयों के पीछे वह बाईस वर्षों तक अपना हाड़ तोड़ता रहा , पसीना बहाता
रहा , दिन- रात चौधरी के खेतों के साथ झुझता रहा, ईटें भापता रहा, और आखिर में
निचुड़- निचुड़ कर मर गया । लेकिन मूल धन बना ही रहा । सूद तक अदा नहीं हुआ । दद्दा
चौधरी ने जिस तरह तुम्हारा हाड़ लगाया हैं .....तुम्हारी देह को गन्ने की तरह
निचोड़कर जैसा अपनी मूँछों में गुड़ लगाया है ......... मैं उसका पूरा दर्द जानता
हूँ दद्दा। पूरा किस्सा मुझे मालूम है। किशनू के पेट से कोई खाली गुब्बारा ऊपर उठा
और छाती तक आते-आतेफूट गया । उसकी आँखें पनीली हो गयी थीं । “ ५
कहानी में
किशनू के माध्यम से लेखक ने शोषित वर्ग की बेबसी और लाचारी को अभिव्यक्त किया है ।
किन्तु किशनू एक क्रांतिकारी एवं अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों में से है तभी तो जब चौधरी
उससे यह कहता है की पुतला अभी तक तैयार नहीं हुआ तब उसका जवाब किशनू इस प्रकार
देता है –“ चौधरीजी ,बहुत हो गया । बाप के नमक का लिहाज कर रहा हूँ , वरना एकाध बात
ऐसी- वैसी जुबान से निकाल देता । आप चुपचाप देखते रहो , ये मेरा काम
है । वक़्त पर न बने तो कहना । जुता हुआ हूँ... देह के ज़ोर की भी तो कोई हद होती
हैं । “चौधरी उसे थोड़ी देर घूरता रहा , फिर चला गया ।“६
अंततः पुतला बनकर तैयार होता है तब सभी गाँव वालों के आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं होता है । पुतला में साफ- साफ चेहरा दिखाई देने लग गया था । जनता में कानाफूसी शुरू हो गयी- “ अरे देखो , यह तो चौधरी भीखमदास का पुतला मालूम होता है । कमाल बनाया है किशनू पासी ने । तभी कुंभकर्ण का चेहरा भी आतिशबाज़ी की चमकदार रोशनियों में झलका । समनू के गेंग ने अचानक जोरदार नारा लगाया- हरसू-देखो हरसूप्रसाद ।“ ७
किशनू ने रावण और कुंभकर्ण के पुतले में चौधरी भीखमदास और चौधरी हरसूप्रसाद का चेहरा बनाकर अपनी प्रति हुये अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध प्रतिशोध लेने का प्रयत्न किया है । इस प्रयास में किशनू क्रांतिकारी विचारों के साथ उभरकर सामने आता है । समाज में शोषक वर्ग का प्रतिनिधि करता किशनू सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ता प्रतीत होता है । पुतला बनाने की कला में वह निपुण है इसमें वह सार्थक रूप से अपने मन की भावाभिव्यक्ति करते हुये प्रतीत होता है ।
‘दरियाई घोड़ा ‘ कहानी संग्रह में अगली सामाजिक परिवेश से जुड़ी कहानी है ‘टेपचू ‘ । इस कहानी में अदम्य जिजीविषा और जीवन के प्रति संघर्षशीलता के दर्शन होते है । उदय प्रकाश जी द्वारा लिखित यह एक अनूठी कहानी है । कहानी में कहानीकार की सामाजिक नज़रिया स्पष्ट जान पड़ता है ।
इस कहानी के संदर्भ में विजयमोहन सिंह का कथन इस प्रकार है –“ उसे कोई जल्दी नहीं है , न कहानी के ब्योरों को लेकर कोई स्थूल उलझन है , इसलिए वे लगभग प्रत्येक कहानी में वह अपने विषय की संभावनाओ को अंत तक निचोड़ सका है और उन्हें प्राय; निशेष करके ही दम लेता है ।“८
टेपचू
कहानी में ऐसा जान पड़ता है कि कहानीकार
उदय प्रकाश जी ने अपने ही गाँव के परिवेश का वर्णन किया है । गाँव में अब्बी नाम
का मुसलमान था ,टेपचू उसी के लड़के का नाम है । फिरोज़ा टेपचू की माँ है। टेपचू
के पिता की मृत्यु हो जाती है । फिरोज़ा दिन-रात मजदूरी करके टेपचू को पालती है ।
वह हमेशा टेपचू को अपने से चिपकाई रहती है ।
फिरोज़ा को
अकेला जानकर गाँव के छोकरे उसे पकड़ने की और छेड़ने की कोशिश करते है लेकिन टेपचू
हमेशा माँ के पास कवच की तरह होता है । “दूसरी बात, वह इतना
घिनौना था कि फिरोज़ा कि जवानी पर गोबर की तरह लिथड़ा हुआ लगता था । पतले –पतले सूखे
हुए झुर्रीदार हाथ-पैर , कद्दू की तरह फूला हुआ पेट , फोड़ों से भरा
शरीर । लोग टेपचू के मरने का इंतज़ार करते रहे ।
एक साल गुजरते –गुजरते हाड़-तोड़ मेहनत ने फिरोज़ा की देह को झिंझोड़कर रख दिया
,वह बूढ़ा गयी । “९
टेपचू जब
सात –आठ साल का हुआ तो एक दिन पुरनिहा तालाब में घुसकर वह कमलगट्टे और पुरइन की
कांद निकालना चाहता था । पुरइन के घने नालों में टेपचू उलझ जाता है । परमेसुरा उसे
मछली समझ कर निकालता है तो वह टेपचू ही होता है । पेट गुब्बारे की तरह फूला हुआ सा
और मरा हुआ सा पड़ा था टेपचू । किसी तरह उसकी जान बच जाती है । यह उसके जीवन
की पहली घटना है जहां वह मृत्यु से संघर्ष
करता है जीवन के लिए ।
एक टेपचू ताड़ी चखना चाहता है । मदनसिंह ताड़ी की रखवाली करता
है । उसे सोता देख टेपचू ताड़ी के झाड़ पर चढ़ जाता है। मटके में हाथ डालता है तो
उसमें असल नाग होता है । नाग भी ताड़ी के नशे में होता है । नाग उसके हाथ में लिपट जाता है । टेपचू घबराकर अपना संतुलन खो बैठता है। दोनों साथ में गिरते है । नीचे टेपचू
और नाग भी अधमरा सा पड़ा हुआ था । आवाज़ सुनकर मदना सिंह दौड़कर आता है । उसे लगता है
कि टेपचू मर गया । सारे गाँव वाले और उसकी माँ वहाँ इकठ्ठा हो जाते है ,परंतु वहाँ तो
टेपचू होता ही नहीं । “ गाँववालों को उसी दिन विश्वास हो गया कि हो न हो टेपचू
साला जिन्न है , वह कभी मर नहीं सकता ।“१०
टेपचू के
व्यवहार को देखकर उसकी माँ को लगता है कि वह कहीं आवारा न हो जाए । पंडित भगवानदिन
के यहाँ पर भैंसों के लिए चरवाहे कि जरूरत होती है इसलिए पन्द्रह रुपये महीने और
खाना खुराख पर टेपचू को रख लिया जाता है ।
उसे खेतों का काम भी देखना पड़ता है और बचा कुचा खाने को मिलता है । एक महीने में
ही उसकी हालत देखकर माँ का मन पसीज जाता है । माँ के काम छोड़ने के लिए कहने पर भी वह नहीं छोड़ता । टेपचू यहाँ पर भी अपना
जुगाड़ जमा लेता है । भैंसों को जंगल में खुला छोड़कर वह पेड़ के नीचे सो जाता है और
अपनी रात की नींद पूरी करता है । हर रोज एक लीटर भैंस का दूध निकाल कर
वह पीने लग जाता है और कुछ दिनों में ही उसकी तबीयत अच्छी होने लगती है । एक दिन पंडिताइन ने उसे खाने के
लिए बासी खाना दे देती है । टेपचू वह खाना नाद में डाल देता है और भैंसों को लेकर
जंगल चला जाता है । वह थकान महसूस करने लग जाता है । शाम को जब भैंसे दुही जाती है
तो छटाँक भर भी दूध नहीं निकलता है । पंडित भगवानदिन को शक हो जाता है और वह टेपचू
की जूतों से पिटाई करता है । उसे मुर्गा बनाता है और काम से भी निकाल देता है ।
टेपचू इसके बाद पी. डब्लू. डी. में काम करने लगता है । कड़ी मेहनत करते –करते उसका शरीर मजबूत होने लगता है। अब वह एक भरपूर आदमी बन चुका है । लेखक गाँव छोड़कर चला आता है । टेपचू की माँ भी मृत्यु को प्राप्त हो जाती है । अब टेपचू अकेला हो जाता है । बैलाडिला में गाँव के कई लोग मजदूरी करने लगते है । पंडित भगवानदिन भी हैजा के कारण मृत्यु को प्राप्त हो जाते है । किशनपाल सिंह ताड़ी उतरवाने का काम करते है और कई साल तक गाँव के सरपंच पद पर भी रह चुके है । अब गाँव में पक्का मकान हो गाय है । और अभी एम. एल. ए. बन चुके है । टेपचू भी बैलाडिला आता है । परंतु किशनपाल गुंडों से उसकी पिटाई करवाता है । और सोननदी में फेकवा देता है । उसी रात किशनपाल की पुआल में टेपचू आग लगा देता है । और वहाँ से भाग निकलता है । लेखक ने ऐसा निडर , बेधड़क और मुहज़ोर कभी नहीं देखा था । लेखक की सिफारिश पर टेपचू को बैलाडिला में मजदूरी का काम मिल जाता है ।
जापान ने बैलाडिला कारखाने से लोहा मँगवाने का काम बंद कर दिया । कच्चे लोहे का उत्पादन कम हुआ और मजदूरों की छँटनी का फरमान निकाला गया । मैनेजमेंट ने छँटनी पर फौरन काम शुरू किया । लोगों को कारखाने से निकाला जाने लगा । इस पर टेपचू बाकी मजदूरों के साथ मिलकर कारखाने के सामने धारणा देने लगता है और नारे लगाने लगता है। टेपचू पूरे धरणे का प्रतिनिधि करता नज़र आता है । टेपचू के बारे में लेखक उदय प्रकाश लिखते है कि- “ टेपचू बहुत बादल गया था । मेंने गौर से देखा – उसकी हँसी के पीछे घृणा, वितृष्णा और गुस्से का विशाल समंदर पछाड़ें मार रहा था । कुर्ते के बटन टूटे हुए थे । कारखाने के विशालकाय फाटक की तरह खुले हुए कुर्ते के गले के भीतर उसकी छाती के बाल हील रहे थे , असंख्य मजदूरों की तरह , कारखाने के में गेट पर बैठे हुए । टेपचू ने अपने कंधे पर लटकते हुए झोले से पर्चे निकाले और मुझे थमाकर तीर की तरह चला गया । “ ११
पुलिस आकर तीसरे दिन यूनियन की ऑफिस पर छापा मारती है । पुलिस और मज़दूरों में हाथापाई हो जाती है । टेपचू एक पुलिस वाले को नंगा कर देता है । जिस कारण से अगले दिन टेपचू के घर पुलिस छापा मारकर उसे गिरफ्तार कर लेती है । टेपचू को जीप के पीछे बाँधकर मील तक घसीटकर ले जाते है । उसकी पीठ की पर्त निकल जाती है और लाल टमाटर की तरह जगह –जगह पर गोश्त झाँकने लगा ।पुलिस वाले उसे यह कहकर भागने पर मजबूर करते है कि अपनी जान बचाने के लिए जितना भाग सकता है उतना तेज़ भागे । जैसे ही टेपचू भागने को होता है पुलिस तूफान सिंह निशाना लगाकर पहली फायरिंग करता है । एक गोली टेपचू की कमर में तो दूसरी गोली कंधे पर आकार लगती है । इस प्रकार टेपचू की मृत्यु हो जाती है । उसकी लाश को सन्दुक में बंद कर दिया जाता है । अस्पताल में जब डॉ. ने उस्तरा उठाया तो टेपचू ने आँखें खोली । कराहा और बोला –“ डॉक्टर साहब ये सारी गोलियाँ निकाल दो । मुझे बचा लो । मुझे इन्हीं कुत्तों ने मरने की कोशिश की है । “ १२
उदय प्रकाश
जी कहानी के अंत में स्वयं के विचार इस प्रकार प्रस्तुत करते है-“ आपको अब भी
विश्वास न हो तो जहाँ, जब, जिस वक़्त आप चाहें मैं आपको टेपचू से मिलवा सकता हूँ ।“१३
मधुरेश जी
इस कहानी को लेकर अपना मत इस प्रकार व्यक्त करते है – “ टेपचू यथार्थवाद से विचलन का स्पष्ट उदाहरण है
जिसमें व्यक्तित्ववादी रोमानी क्रांति की धारणाओं को ही फंतासी से ढांक तोपकर हवा
देने की कोशिश की गई है ।“१४
डॉ.
रामनरेश पवार जी ने टेपचू कहानी के संदर्भ मेँ अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया है
–“ भूखा पेट व्यक्ति के सारे भय भगा देता है । उसे मौत का डर होता नहीं । जिसमें
जिजीविषा इतनी प्रबल होती है कि मरकर भी वह जी उठता है । मरने से घबराने वालों को
तो पहले ही मौत आती है । मृत्यु का दर जिसमें से निकाल गाय वह जिन्न की तरह कार्य
करता है ।“१५
इस कहानी
के संदर्भ में विजयमोहन सिंह जी इस प्रकार से लिखते है कि –“ जितनी जीवंत
अतिनाटकीयता के साथ ‘टेपचू’ के निर्माण की प्रक्रिया कहानी में चित्रित की गई है , वह एक ओर
उपन्यास की आवश्यकता को दर किनार कर देती है । टेपचू अगर ताड़ से गिर कर नहीं मरता , पुलिस की गोली
से नहीं मरता तो ‘फंतासी ‘ नहीं है , अतिरंजना जरूर है , लेकिन टेपचू
है कौन ? “१६ और वे आगे
कहते है –“ टेपचू अगर व्यक्ति होता और पूरी कहानी अभिधा में लिखी जाती तो वह अतिरंजित नहीं ,अविश्वसनीय भी
हो जाती , लेकिन ‘टेपचू ‘ अगर वह संघर्षशील ऊर्जा है जो उन्हीं स्थितियोंमें बनती ,विकसित होती और
बरकरार रहती है तो उसके मरने का प्रश्न ही नहीं उठता , अतः कहानी का
अंत सही है ।“१७
टेपचू
कहानी के संदर्भ में उदय प्रकाश जी ने एक
साक्षात्कार में कहा है कि – ‘ टेपचू ’ कहानी का संदेश
अत्यंत सीधा है । यह कहानी मेरे छात्र जीवन की कहानी है और वह है मनुष्य की जिजीविषा । जिसको कभी निराश नहीं
होना चाहिए । अपने भीतर की जिजीविषा को जीवित रखना चाहिए और एक अदम्य संघर्षशीलता
वह ‘टेपचू’ में दिखाई देती है । मैंने यह वाक्य लेनिन से लिया था – ‘ जो सर्वहारा
है उसको पराजित नहीं किया जा सकता । ‘ यह सच है कि जो श्रम करता है और
अपने परिश्रम पर अपना जीवन यापन करता है
उसे संसार कि कोई शक्ति पराजित नहीं कर सकती । “१८
उदय प्रकाश
जी ने अपने समय की जीवंत एवं सार्थक प्रस्तुति अपने कहानियों में की है ।उनकी
कहानियों में जीवन संबन्धित यथार्थता का समावेश देखने को मिलता है । उनकी कहानियाँ
सामाजिक परिवेश के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आती
है । अपने द्वारा निर्मित झूठे संसार में रहने वाले मौसाजी समाज की
विषमताओं से अपने को अछूता मानते हैं । शोषण एवं अन्याय के विरोध में किशनू की
उठती आवाज़ लेखक ने ’पुतला ‘ कहानी के माध्यम से अभिव्यक्त किया है । अदम्य जिजीविषा
एवं संघर्ष को टेपचू के माध्यम से लेखक ने बताया है । आपकी कहानियों में दलित
चेतना देखने को मिलती है । सामंती शोषण ना रुकने का चक्र भी है ।
समाज की एक नई परिभाषा आपकी कहानियों में देखने को मिलती है । नए –नए संदर्भों को लेकर आपने कहानी की संरचना की है ।
संदर्भ
१. डॉ . पुष्पपाल सिंह – समकालीन हीदी कहानी ; युगबोध का
संदर्भ , पृ. ११३
२.
दरियाई
घोड़ा – मौसाजी – उदय प्रकाश , पृ. ४७
३.
दरियाई
घोड़ा – मौसाजी – उदय प्रकाश , पृ . ५०
४.
दरियाई
घोड़ा – मौसाजी – उदय प्रकाश , पृ . ५१
५.
दरियाई घोड़ा – पुतला – उदय प्रकाश , पृ . ८१
६.
दरियाई
घोड़ा – पुतला – उदय प्रकाश, पृ .८२
७.
दरियाई
घोड़ा – पुतला – उदय प्रकाश, पृ . ८६
८.
सारिका
– १६-३० नवंबर- १९८३ ,पृ. ६९
९. दरियाई घोड़ा – टेपचू –उदय प्रकाश , पृ . १०५
१०. दरियाई घोड़ा – टेपचू –उदय प्रकाश,पृ . ११२
११. दरियाई
घोड़ा – टेपचू –उदय प्रकाश, पृ .११६
१२. दरियाई
घोड़ा – टेपचू –उदय प्रकाश,पृ . १२०
१३. दरियाई
घोड़ा – टेपचू –उदय प्रकाश, पृ. १२०
१४. मधुरेश
– हिन्दी कहानी अस्मिता की तलाश , पृ . २१
१५. डॉ.
रामनरेशपवार – नवम दशक की कहानियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन, पृ. १५१
१६. सारिका१६-३०नवंबर१९८३, पृ .६९
१७. सारिका
१६-३० नवंबर १९८३ , पृ .६९
१८. समकालीन
कहानीकार उदय प्रकाश – डॉ. देवकीनंदन महाजन , पृ . ११३
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