Sunday, January 23

वक्त - मीनाक्षी एस यलाल (स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य)

 स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य



वक्त


ऐसा ही वक्त आ गया है

जब अपने काम में आप ही दखल लेते हैं तो 

वह गुनाह होने लगा है।

वह सुबह उठते ही जब घूमने निकलते हैं 

जहां कोई सिटी बस जाती है तब दौड़े हुए घर आना पड़ता है 

ऐसा ही वक्त आ गया है।


आजकल तो समय का तकाजा सीर पर मंडराने लगा है 

सुबह जब सब्जी मंडी में निकलते हैं वहां पर किसी सौदे की 

पूरी-ना पूरी समय चला जाता है तो सिटी बस जाती है 

तब दौड़े हुए घर आना पड़ता है ऐसा भी वक्त आ गया है।


आजकल वक्त हर जगह घूमने लगा है बच्चे के स्कूल में, 

काम करने वाले मजदूर के काम से लेकर 

ऑफिस के ऑफिसर के घड़ी में ऐसा भी वक्त आ गया है।


यह वक्त का तकाजा मनुष्य को केवल कोरोना की लागत से पता चला है 

कभी वह जनवरी, फरवरी या मार्च में तो 

सरकार के आदेश के lock-down में ऐसा भी वक्त आ गया है।


मनुष्य को अब वक्त है वक्त की अहमियत पहचानने के लिए 

एक और मौका दे दिया है ऐसा भी वक्त आ गया है।




मीनाक्षी एस यलाल 

सचिव यलाल यज्यूकेशन सोसायटी 

हुमनाबाद

9341162560


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Editor
Prasadarao Jami

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