साहित्य मंथन
मेरे विचारों में प्रेमचंद के उपन्यास
-- अवुसुला श्रीनिवासा चारी ‘ शिक्षा रत्न ‘
प्रेमचंद
जीवन परिचय :
प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय था। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास स्थित लमही नामक गाँव में हुआ। पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकरी करते थे।
वे जब सिर्फ 8 साल के थे तब माँ का निधन हो गया। पिता ने दूसरा विवाह कर लिया लेकिन वह माँ के प्यार और वात्सल्य से दूर हो गए। प्रेमचंद का जीवन बहुत अभाव में बीता।
15 साल के उम्र में ही उनका विवाह एक ऐसी लड़की के साथ किया गया था जो कुरूप थी और उम्र में भी उन से बड़ी थी। शादी के एक साल बाद उनके पिता का देहांत हो गया। अपनी पत्नी के साथ - साथ सौतेली माँ और उनकी संतान की भी देखबाल करने का बोझ सिर पर था।
प्रेमचंद को बचपन से ही पढ़ने का शौक था। वह वकील बनना चाहते थे लेकिन गरीबी के कारण नहीं बन सके। 13 साल के उम्र में से ही प्रेमचंद ने लिखना शुरू किया। आरंभ में उन्होंने कुछ नाटक लिखे और बाद में उर्दू में उपन्यास लिखे। इस तरह उनका साहित्यिक जीवन शुरु हुआ और जीवन पर्यंत चलता रहा।
आर्थिक तंगी और पारिवारिक समस्याओं के कारण उनकी पत्नी मायके चली गई और लौटकर नहीं आयी। वे उस समय के धार्मिक और सामाजिक आंदोलन, आर्य समाज से प्रभावित रहे। प्रेमचंद विधवा विवाह का समर्थन करते थे और 1906 में अपनी प्रगतिशील परंपरा को जीवन में डालते हुए उन्होंने दूसरा विवाह बाल - विधवा शिवरानी देवी से किया उसके बाद उनकी जिंदगी के हालात कुछ बेहतर हुए । अध्यापक से प्रमोशन के कारण स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर बने और इसी दौरान उनकी पांच कहानियों का संग्रह ‘ सोजे वतन ‘ 1907 में छपा जो बहुत लोकप्रिय हुआ।
प्रेमचंद आजादी से पहले के समय के समाज और अंग्रेजी शासन के बारे में लिख रहे थे।उन्होंने जनता के शोषण दुख , दर्द और उत्पीड़न को बहुत बारीकी से महसूस किया और उसे लिखा। 1910 में उनकी रचना सोजे वतन (राष्ट्र का विलाप ) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। उस समय वह नवाबराय के नाम से लिखते थे। उनकी खोज हुई और उनकी आंखों के सामने सोजे वतन की सभी ( 500 )प्रतियाँ जला दी गईं। कलेक्टर ने उन्हें बिना अनुमति के लिखने पर भी पाबंदी लगा दी।
बीसवीं सदी में उर्दू में प्रकाशित होने वाली जमाना पत्रिका के संपादक और प्रेमचंद के घनिष्ठ मित्र मुंशी दया नारायण मिश्र निगम ने उन्हें प्रेमचंद के नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद नवाब राय हमेशा के लिए प्रेमचंद हो गए और इसी नाम से लिखने लगे।
प्रेमचंद का रचना संसार बहुत बड़ा और समृद्ध है। बहुआयामी प्रतिभा के धनी प्रेमचंद ने कहानी, नाटक, उपन्यास, लेख, आलोचना, संस्मरण, संपादकीय जैसी अनेक विधाओं में साहित्य का सृजन किया है। उन्होंने कुल 300 से अधिक कहानियां, 3 नाटक, 15 उपन्यास, 10 अनुवाद, 7 बाल - पुस्तकें लिखें इनके अलावा हजारों पृष्टों के लेख, संपादकीय लिखे जिनकी गिनती नहीं है।
प्रेमचंद ने शुरुआती सभी उपन्यास उर्दू में लिखें जिनका बाद में अनुवाद हुआ। 1918 में सेवा सदन उनका हिंदी में लिखा पहला उपन्यास था। इस उपन्यास को उन्होंने पहले ‘ बाज़ारे हुस्न ‘ नाम से उर्दू में 1916 में लिखा लेकिन हिंदी में इसका अनुवाद सेवा सदन के रूप में प्रकाशित हुआ। यह एक स्त्री के वेश्या बनने की कहानी है। हिंदी साहित्यकार डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक सेवा सदन भारतीय नारी की पराधीनता की समस्या को सामने रखता है।
उसके बाद 1922 में किसान जीवन पर उनका पहला उपन्यास प्रेमाश्रम प्रकाशित हुआ। अवध के किसान आंदोलनों के दौर में प्रेमाश्रम किसानों के जीवन पर लिखा हिंदी का शायद पहला उपन्यास है। फिर रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि से होता हुआ उपन्यास लिखने का उनका सफर 1936 में गोदान तक पहुंचा।
प्रेमचंद के उपन्यासों में गोदान सबसे ज्यादा मशहूर हुआ और विश्व साहित्य में भी उसका बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। एक सामान्य किसान को पूरे उपन्यास का नायक बनाना भारतीय उपन्यास परंपरा की दिशा बदल देने जैसा था। गोदान पढ़कर महसूस होता है कि किसान का जीवन सिर्फ खेती से जुड़ा हुआ नहीं होता। उस में सूदखोर जैसे पुराने जमाने की समस्याएँ तो हैं ही, उस जमाने की पुलिस, अदालत जैसी समस्याएँ भी हैं। ये सब मिलकर होरी की जान लेती हैं । होरी की मृत्यु पाठकों को झकझोर कर रख देती है। गोदान का कारुणिक अंत इस बात का गवाह है कि तब तक प्रेमचंद का आदर्शवाद से मोह भंग हो चुका था और उनकी आखिरी दौर की कहानियों में भी यह देखा जा सकता है। जीवन के आखिरी दिनों में वे मंगलसूत्र नामक उपन्यास लिख रहे थे जिसे वे पूरा नहीं कर सके।
लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर, 1936 में उन्होंने आखिरी साँस ली। प्रेमचंद अपने उपन्यासों में भारतीय ग्रामीण जीवन को केंद्र में रखते थे। प्रेमचंद ने हिंदी उपन्यास को जिस ऊँचाई तक पहुंचाया वह आने वाली पीढ़ियों के उपन्यासकारों के लिए एक चुनौती बनी रही। प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों का भारत और दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। प्रेमचंद हिंदी साहित्य में एक मील का पत्थर बना है और बने रहेंगे।
आइए इनके कुछ उपन्यासों पर नज़र डालते हैं ---
सेवा सदन
सारांश :
सेवासदन मुख्य रूप से उस समय की सांसारिक विकृतियों को लेकर लिखा गया प्रेमचंद का पहला उपन्यास है। यह उपन्यास 1916 के आसपास उर्दू में और 1918 में हिंदी में आया है। इसमें उस समय की समस्याएँ दिखाई देती हैं जैसे इसमें समाज के आडंबर, ढोंग, दंभ, पाखंडी, चरित्र हीनता, दहेज प्रथा, बेमेल विवाह, पुलिस की घूँसखोरी, वेश्या गमन, मनुष्य के दोहरे चरित्र आदि।
इस उपन्यास में हमें उस समय में नारी की दुर्दशा, दूसरों पर उसकी निर्भरता, असुरक्षा, नारी वेदना आदि को भी दर्शाया गया है। प्रेमचंद तो इस उपन्यास में उस समय की परिस्थितियों को सहज रूप से चित्रित किया है। एक मध्यम वर्ग के परिवार की कैसी समस्याएँ होती हैं। इस उपन्यास में देख सकते हैं। इस उपन्यास की नायिका तो सुमन है। वह अत्यंत सुंदर और स्वाभिमान युक्त कन्या थी। उसके पिता कृष्णचंद एक वकील थे। कृष्ण चंद्र की दो बेटियाँ - सुमन और शांता थीं।
हर बाप के लिए बेटियाँ तो राजकुमारियाँ होती हैं। कृष्णचंद जी भी अपनी बेटियों को उसी तरह पाला - पोसा और अचानक उनकी मृत्यु के बाद बेटियों की शादी की चिंता माँ गंगाजली को सताती रहती है। गरीबी के कारण वह सुमन की शादी दरिद्र, कृपण, कंजूस, अनपढ़ और शंकाशील गजाधर प्रसाद के साथ करती है। सुमन ससुराल आकर मुरझा जाती है।जिन सुखों और उज्ज्वल भविष्य की कामना करके ससुराल में आई थी वहाँ तो उसके विपरीत ही देखने को मिला।
सुमन देखती है कि उच्च कुल और सुशील स्त्रियों को समाज में आदर और सुख नहीं मिलते हैं। उसके घर के पास ही रहने वाली भोली नाम की वेश्या को वे सब सुख और समाज में आदर मिलता है। क्यों? वह सोच में पड़ जाती है। एक दिन घर वापस आने में थोड़ी देर होने के कारण शंकाशील गजाधर उसे अपमानित करके घर से निकाल देते हैं। इससे वह अपने मित्र पद्मसिंह के यहाँ जाती है लेकिन वहाँ भी उसे अपमान ही मिलता है। तब वह वेश्यावृत्ति की ओर आकर्षित होकर भोली के यहाँ जाती है। कुछ दिनों के बाद अपनी बहन शांता के पास जाती है और उसकी सेवा करती है। वहाँ भी अपमान ही मिलने पर तंग आकर पश्चाताप कर लेने के लिए एक स्वामी जी से मिलती है। उनकी सूचना के अनुसार ‘ सेवा सदन ‘ खोलती है।
मेरे विचारों में -
साहित्य समाज का दर्पण होता है। प्रेमचंद के उपन्यास इसके लिए बेमिसाल हैं। पिता हीन परिवार, दरिद्र परिवार और कष्ट समय में गलत निर्णय लेने से जीवन किस तरह भ्रष्ट होता है उसका बेमिसाल चित्रण सुमन के माध्यम से प्रेमचंद ने आंखों के सामने रखा है। उसी समय धैर्य के साथ जीवन में कष्टों का सामना करने के लिए शांता के माध्यम से कहा। वेश्यावृत्ति और नारी वेश्या क्यों बनती है? इसका कारण कौन है? चंचल स्वभाव से होने वाले नष्टों संबंधी प्रश्न प्रेमचंद ने हमारे सामने रखा है। प्रेमचंद की भाषा और प्रस्तुति अद्भुत है।
प्रेमाश्रम
सारांश :
प्रेमाश्रम 1922 ई में प्रकाशित हुआ प्रेमचंद का दूसरा उपन्यास था। इस उपन्यास में प्रेमचंद ने जमीनदारी व्यवस्था और किसानों के कष्टों को मुखरित किया है। शायद उस समय ऐसा कोई कवि नहीं था जो किसानों के बारे में सोचा हो और उनके कष्टों को समाज के सामने रखते हुए कोई रचना की हो।
काशी के औरंगाबाद के निकट लखनपुर के निवासी थे - जटाशंकर और लाला प्रभा शंकर । ये जमींदार थे। जटाशंकर की मृत्यु हो जाती है। जिसके दो पुत्र हैं - प्रेम शंकर और ज्ञान शंकर। प्रभा शंकर के तीन लड़के - दयाशंकर, पद्मशंकर, जयशंकर और दो लड़कियाँ थीं जो अविवाहिता थीं। दयाशंकर सब इंस्पेक्टर था। पद्मशंकर और जयशंकर पढ़ रहे थे।
प्रभा शंकर जी जमींदार तो था लेकिन किसानों के प्रति उदार स्वभाव का था। उसका भतीजा प्रेमशंकर भी उसी तरह का व्यक्ति था। लेकिन ज्ञानशंकर बड़ा ही स्वार्थी निकला। वह अत्यंत कठोर और निष्ठुर था। वह चाचा जी की उदारता और किसानों तथा जरूरतमंदों के लिए खर्च करते हुए देखकर चिढ़ता था। वह घर और संपत्ति में से अपना हिस्सा ले लिया। प्रेम शंकर बी ए की पूर्ति के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अमेरिका चला जाता है। उसकी पत्नी श्रद्धा ज्ञानशंकर के घर में ही रहती थी। इसीलिए वह प्रेमशंकर की संपत्ति को भी हथियाना चाहता था।
अपने मित्र घौस खां और डिप्टी कलेक्टर ज्वाला सिंह के साथ मिलकर ज्ञानशंकर ने किसानों पर अत्याचार और उनका शोषण करते थे।
प्रेम शंकर अमेरिका से वापस आने के बाद भी ज्ञान शंकर उनकी संपत्ति वापस देना नहीं चाहता था। विदेशी यात्रा, धर्म भ्रष्ट जैसे आरोप लगाकर उसे दूर रखना चाहा। प्रेमशंकर की पत्नी भी प्रायश्चित के बिना उन्हें स्वीकारने से इनकार कर दी। इससे तंग आकर प्रेमशंकर स्वयं अपनी घर त्याग कर चला जाता है। वह कृषि शाला की स्थापना कर लखनपुर और हाजीपुर के किसानों की सहायता करना आरंभ किया था।
इधर ज्ञान शंकर के ससुर लखनऊ के तालुकदार राय कमलानंद की दो बेटियाँ थीं । बड़ी बेटी गायत्री का विवाह गोरखपुर के जमींदार के साथ किया। जिसकी मृत्यु के बाद वह बाल - विधवा बनी। गायत्री धर्म और भक्ति में विश्वास रखती थी। वह पति की संपत्ति और जमीनदारी संभाल रही थी। कमलानंद की छोटी बेटी विद्या ज्ञान शंकर की पत्नी थी। यह बहुत ही भोली-भाली थी। जय शंकर ससुर और गायत्री की संपत्ति को हड़पना चाहा और गायत्री से शारीरिक सुख पाना चाहा। उस दौरान वह अपने ससुर को विष खिलाकर मारना चाहा। कमलानंद सारी बात विद्या से कहता है। विद्या अपने पति को गायत्री के साथ देखती है और अपने पुत्र माया शंकर को गोद लेने के षड्यंत्र को जानकर आत्महत्या कर लेती है। इससे विरक्त गायत्री अपनी संपत्ति छोड़कर तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़ती है। बाद में इनकी भी मृत्यु हो जाती है।
माया शंकर अपने ताऊ के व्यवहार से आकर्षित होकर उन्हीं के पास जाकर विद्यार्जन करता है। एक दिन वह सभी किसानों को जमींदारी व्यवस्था से मुक्ति देता है। वह सब किसानों को अपने भाई समान मानता है। यह सब देख कर ज्ञान शंकर गंगा में डूब कर आत्महत्या कर लेता है। प्रेम शंकर जी प्रेमाश्रम की स्थापना करते हैं।
मेरे विचारों में -
प्रेमचंद के उपन्यास से हमें कई बातें सीखने को मिलती हैं जैसे - जमीनदारी व्यवस्था से होने वाले नष्ट, किसानों के शोषण, गरीबी की समस्याएँ , नारी की सहायता विधवा जीवन की समस्याएँ , बुरी संगति के परिणाम आदि। प्रेमचंद ने एक ही बाप की दो संतानों में से एक के माध्यम से निस्वार्थ जीवन त्याग और सेवा गुण का परिचय कराया है तो दूसरे के माध्यम से स्वार्थी जीवन, क्रूरता और अमानवीयता का। उपन्यास में स्थित सभी समस्याएँ उस समय की परिस्थितियों को दर्शाती हैं। ऐसी परिस्थितियों को बदलने की सूचना प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से दी है। इससे हम यह भी जान सकते हैं कि सगे भाइयों के व्यवहार में भी बहुत - सा अंतर पाया जाता है व्यक्ति के गुण तो वैयक्तिक होते हैं पारंपरिक नहीं।
रंगभूमि
सारांश :
रंगभूमि नामक प्रेमचंद का उपन्यास सन 1925 में प्रकाशित हुआ। गरीब, भिखारी, दलित वर्ग का अंधा और अनपढ़ सूरदास नामक व्यक्ति की जमीन को जबरदस्ती हस्तगत कर लेने की बात को लेकर उपन्यास लिखा गया।
कथावस्तु कुछ इस तरह का था। पांडेपुर का रहने वाला सूरदास नामक व्यक्ति अंधा, भिखारी, दलित वर्ग का अनपढ़ और गरीब था उसके पास एक झोपड़ी थी और थोड़ी - सी जमीन जो परंपरागत रूप से मिली थी। उसके पास उसका भतीजा भी रहता था।
जॉन सेवक चमड़े की दुकान चलाता था। उस दुकान के पास ही सूरदास की जमीन थी, जिसमें आसपास के पशु आकर घास चरते थे। जॉन सेवक सूरदास की जमीन को हस्तगत करके सिगरेट का फैक्टरी खोलना चाहा। लेकिन सूरदास जमीन देने से इनकार किया और कई प्रयत्नों के बाद जॉन सेवक जबरदस्ती उसे हड़प लेता है। सूरदास अहिंसात्मक रूप से अकेले ही आंदोलन शुरू कर देता है। इसमें जॉन सेवक की बेटी सोफिया और भरत सिंह के बेटे विनय सिंह की प्रेम कहानी भी साथ - साथ चलती है। बाद में एक-एक करके पूरे बस्ती वाले सूरदास के साथ देने आए। आंदोलन हिंसात्मक बन जाता है। इस दौरान सूरदास को गोली लगती है। विनय सिंह अपने आप पर गोली चला कर आत्महत्या कर लेता है। सूरदास की झोपड़ी के स्थान पर बस्ती वालों ने उसकी मूर्ति स्थापित करते हैं। भरत सिंह घृणा से उस मूर्ति को नष्ट करने जाता है और खुद दबकर मर जाता है।
मेरे विचारों में -
प्रेमचंद जी उस समय के रियासतकारों की समस्याओं को इस उपन्यास के माध्यम से हमारे सामने रखा। उन्होंने उस समय के असहाय और दुर्बल लोगों पर किस तरह के अत्याचार हुआ करते थे उसका एक जीता - जागता उदाहरण दिया। एक तरफ उन्होंने सूरदास के माध्यम से यह भी सिखाया कि दुर्बल और असहाय होते हुए भी धैर्य के साथ न्याय के लिए लड़ना। जब अपने ही लोग अधर्म के मार्ग पर चल रहे होते हैं तो स्वयं धर्म के मार्ग पर चलते हुए धर्म के मार्ग पर चलने वालों का साथ देना सोफिया के माध्यम से सिखाया। प्रेमचंद में राष्ट्रीयता तो कूट-कूट कर भरी पड़ी है।
प्रेमचंद्र दूर दृष्टि वाले हैं । वे समाज और देश में किस तरह का सुधार चाहता है वह अपनी रचनाओं के माध्यम से सुनाता है। इसीलिए वह समाज सुधारक भी हैं। उनकी हर एक रचना में समस्या के साथ-साथ या तो समाधान होता है या समाधान की ओर सोचने के लिए पाठक को मजबूर कर देने की बात होती है। उनकी रचनाएँ वास्तविकता के बहुत निकट और सहज होती हैं। उन्हें पढ़ते समय हमें ऐसा महसूस होता है कि रचनाओं से संबंधित घटनाएँ हमारी आंखों के सामने घट रही हो। मैं मानता हूँ कि उनकी रचनाओं के लोक प्रचलन का यह भी एक कारण है।
निर्मला
सारांश :
हिंदी के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी लिखित निर्मला एक चरित्र प्रधान उपन्यास है,जो भारतीय नारी जीवन की एक दुख - दर्द पूर्ण करुण कहानी है। यह उपन्यास दहेज और अनमेल विवाह की सामाजिक समस्या पर आधारित है।
उपन्यास की कथा कुछ इस प्रकार है बाबू उदयभानु लाल बनारस के अमीर और प्रतिभावान,प्रतिष्ठित वकील थे। उनकी पत्नी कल्याणी, दो लड़कियाँ - निर्मला और कृष्णा तथा दो लड़के - चंद्रभानु और सूर्यभानु थे।
निर्मला की शादी लखनऊ निवासी बाबू भालचंद्र सिन्हा के बड़े पुत्र भुवन मोहन के साथ निश्चित की। इतने में उदयभानु जी की हत्या होने के कारण इसे अपशकुन मान कर लड़के वाले शादी रोक देते हैं। घर की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ता जाता है।
कल्याणी बेबसी में निर्मला की शादी तोताराम के साथ कर देती है। वे उम्र में बड़े और विधुर थे। उनके पहले से ही तीन लड़के थे - मंसाराम 16 साल का, जिया राम 12 साल का, सियाराम 7 साल का। घर में विधवा ननद रुक्मिणी भी रहती थी।
तोताराम पत्नी को खुश रखने के लिए कई उपहार लाकर देते थे। उन्हें ख़ुश रखने के लिए कई प्रकार की कोशिशें करते थे। निर्मला खुश नहीं थी। उसका मन मर चुका था। वह बच्चों की सेवा - शुश्रूषा में लगे रहती थी। मंसाराम से अंग्रेजी भी पढ़ने लगती है, किंतु इसमें काम - वासना में अंधे पति को शक उत्पन्न होता है और वे किसी बहाने मंसाराम को छात्रालय में भेज देते हैं। पति की शंका को दूर करने के लिए निर्मला मंसाराम के प्रति क्रूरता का अभिनय करती है। परंतु किशोर हृदई मंसाराम इस अभिनय को सत्य समझकर चिंतनशील होता है और दुर्बल होकर बीमार भी हो जाता है।
बीमार पड़ने पर भी तोताराम उसे घर ना लाकर अस्पताल ले जाता है।वहाँ मंसाराम निष्कलंक सिद्ध करके मर जाता है। तोताराम अपनी पत्नी से क्षमा माँगता है लेकिन जो नष्ट हुआ उसे पूरा तो नहीं कर पाता।
अस्पताल में डॉक्टर सिन्हा और उनकी पत्नी का परिचय स्नेह में बदल जाता है। डॉक्टर सिन्हा के साथ अपनी शादी रद्द होने की बात निर्मला सिन्हा की पत्नी सुधा से कहती है, जिससे सुधा अपने पति को व्यंग्य बाणों से कोसती रहती थी। इससे बचने के लिए डॉक्टर सिन्हा अपने छोटे भाई की शादी निर्मला की बहन कृष्णा के साथ करता है।
तोताराम अपने पुत्र के वियोग में सुचारू रूप से काम भी नहीं करता। वह घर चलाने के लिए पैसे उधार लेता है। कर्जा न चुकाने का कारण बताकर साहूकार तोताराम का मकान नीलाम करवा देता है। इस बीच निर्मला एक पुत्री आशा को जन्म देती है। सुधा का पुत्र सोहन ज्वर से पीड़ित होकर मर जाता है।
तोताराम का छोटा पुत्र जियाराम बुरी संगति में फँसकर उद्दंड हो जाता है। एक दिन वह निर्मला के गहने चुराता है। लेकिन घर की इज्जत बचाने के लिए निर्मला पुलिस को रिश्वत देकर मामला शांत करती है। लेकिन डर के मारे जियाराम आत्महत्या कर लेता है।
मातृविहीन सियाराम पर एक साधु की बात का गहरा असर पड़ता है। वह एक दिन घर छोड़ कर भाग जाता है। उसे ढूंढने तोताराम भी घर से निकल जाता है। मानसिक शांति के लिए एक दिन निर्मला सुधा के घर जाती है। वहाँ सुधा की अनुपस्थिति में सिन्हा उससे छेड़छाड़ करता है। इस बात को जानकर सुधा अपने पति को भलि - बुरी बातें सुनाती है। परिणामतः अपने दुष्कर्मों से लज्जित होकर आत्महत्या कर लेते हैं।
अंत में बीमार निर्मला अपनी पुत्री आशा को ननद रुक्मिणी के हाथों सौम्प कर इस क्रूर समाज से सदैव के लिए विदा ले लेती है।
मेरे विचारों में -
निर्मला उपन्यास मुख्य रूप से दहेज प्रथा और अनमेल विवाह के आधार पर लिखा गया है। यह 1925 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में प्रेमचंद जी की भाषा अत्यंत सहज दिखाई देती है। इस उपन्यास में घटित घटनाएँ भी जैसे अनमेल विवाह और दहेज प्रथा उस समय के समाज की समस्याओं को दर्शाती है। छोटी उम्र में ही लड़कियों की शादी करवा देना, दहेज प्रथा से डरकर बेटी की शादी उससे बहुत अधिक उम्र वाले आदमी के साथ अनमेल विवाह करना, शादी में दहेज ना दे पाने के कारण शादी से मना करना, एक मध्यम वर्गीय परिवार की समस्याओं को आँखों के सामने रखा गया। शादी से पहले लड़कियाँ किस तरह भयभीत होती हैं। ससुराल में आने के बाद ननद जैसे लोगों से किस तरह की समस्याओं से झेलना पड़ता है, उन्हें अपने पिता समान उम्र वाले पति से वह कैसे दूर भागती रहती है। और अपने समान उम्र वाले अपने सौत के पुत्रों से वह किस तरह की समस्याओं का सामना करती है आदि बातों का इसमें अच्छी तरह वर्णन किया गया।
अपनी जवान पत्नी के प्रति एक बूढ़े पति के विचार कैसे होते हैं, अपने ही बेटे और पत्नी को लेकर वह कैसे सोचने लगता है, उसे जानकर हमें बहुत ही दुख होता है ।
एक बेबस और असहाय पत्नी अपने पति को समझाने में कैसे असमर्थ होती है और अपने बेटे को अपने पति की खुशी के लिए कैसे दूर करना चाहती है, एक बेटा जो अपनी सौतेली माँ में ही अपनी माँ को देख रहा था। अचानक उनके व्यवहार में बदलाव आने से वह किस तरह लाचार बन जाता है और अपनी जान खो बैठता है।
घर की समस्याएँ और माता पिता के पालन - पोषण सुचारू रूप से ना होने पर लड़का किस तरह लाचार बन जाता है? यह हम जियाराम नामक पात्र से जान सकते हैं। और सियाराम के पात्र से भी हम समझ सकते हैं कि घर की समस्याएँ बच्चों पर किस तरह का असर डालती हैं ।
एक अबला पर उनके अपने जीवन में बार-बार किस तरह की समस्याएँ आती हैं? किस तरह वह अपने अस्थित्व को बनाये रखने के लिए, समाज में जीने के लिए, अपने मान की रक्षा के लिए हर पल उसे किस तरह का युद्ध करना पड़ता है? निर्मला के माध्यम से हम जान सकते हैं।
निर्मला उपन्यास उस समय के समाज का दर्पण है। वह दर्पण आज भी है लेकिन उस पर धूल चढ़ा हुआ है, जिसके कारण ठीक से दिखाई नहीं देता लेकिन आज भी ऐसी ही समस्याएँ एक अबला के प्रति घट रही हैं। प्रेमचंद जी की इस रचना से हमें कई सीख मिलती हैं।
कायाकल्प
सारांश :
इस उपन्यास में प्रेमचंद ने विलासमय जीवन के दुष्परिणामों के उजागर करने के साथ-साथ बहुविवाह, वृद्ध विवाह और अनमेल विवाह के दुष्परिणामों को भी व्यक्त किया है। इस उपन्यास में राजा विशाल सिंह अपनी तीन रानियाँ होने के बावजूद मनोरमा पर लट्टू हो जाते हैं। वस्तुतः मनोरमा चक्रधर से प्रेम करती है किंतु चक्रधर द्वारा अहिल्या को पसंद करने के कारण मजबूरन उसे राजा विशाल सिंह के साथ विवाह करना पड़ता है। यद्यपि राजा विशाल सिंह चार - चार विवाह तो कर लेते हैं परंतु वह एक भी पत्नी को संतुष्ट नहीं रख पाते।
उपन्यास का नायक चक्रधर भी आत्मिक उन्नति को महत्व देता है। इसीलिए वह नौकरी करने के बजाय स्वतंत्र रहना चाहता है। इस उपन्यास में भी वह समाजसेवी और राष्ट्र सेवी के नायक के रूप में चित्रित हुआ है। एक दिन रात वह अपनी पत्नी अहिल्या और पुत्र शंखधर को छोड़कर चला जाता है और सन्यासी बन कर समाज सेवा करने लगता है।
रानी देवप्रिया और राजकुमार महेंद्र के प्रसंगों में अलौकिक घटनाओं की सृष्टि हुई है। विलासी स्वभाव वाले देवप्रिया यवन प्रदान करने वाली औषधि सुधाबिंदु का सेवन करती है और इसके चमत्कारी प्रभाव से वह सुंदर बनती है।
महात्मा और राजकुमार महेंद्र के प्रसंगों के माध्यम से प्रेमचंद जी ने विज्ञान और योग के चित्रण से इन क्षेत्रों में भारत की श्रेष्ठता को सिद्ध करने का प्रयास किया।
कायाकल्प उपन्यास रानी देवप्रिया के कायाकल्प को दर्शाता है क्योंकि रानी देवप्रिया की विलासप्रिय प्रवृत्ति अंततः बदलकर त्याग एवं तप में समायोजित हो जाती है और वह विलासिनी देवप्रिया से तपस्विनी देवप्रिया बन जाती है।
इस उपन्यास में प्रेमचंद ने सिद्ध किया है कि शारीरिक परिवर्तन वास्तविक कायाकल्प नहीं है वास्तविक कायाकल्प तो विचारात्मक या भाव कल्प होते हैं। विचारों में उन्नयन होने से ही व्यक्ति का उन्नयन होता है।
मेरे विचारों में -
कायाकल्प प्रेमचंद के उपन्यासों से कुछ अलग है। यह आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास है। पूर्व जन्म और भावी जन्म के कल्पनात्मक चित्र इस रचना में देखने को मिलते हैं। यह सब कार्य और संस्कारों के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। इसमें वासना और प्रेम का संघर्ष आध्यात्मिक फलक पर चित्रित किया गया है।अंत में प्रेम द्वारा ही मानसिक शांति का लोक प्रचलित आदर्श मार्ग बताया गया है। अतिशय चमत्कारिता होने के कारण यह उपन्यास अन्य उपन्यासों की भाव गरिमा को छू नहीं सका है।
एक सामान्य व्यक्ति रचना करता है तो पाठक की अपेक्षाएँ भी असामान्य रचना की ओर ही होती हैं। प्रेमचंद की रचनाएँ तो सहज और सजीव होती हैं। शायद कायाकल्प रचना असहज और काल्पनिक होने के कारण ही उतना सफल ना हो सकी। लेकिन अपनी बात पाठकों तक पहुंचाने में तो सफल हो पाए हैं।
प्रतिज्ञा
सारांश :
इस उपन्यास का प्रकाशन सन् 1927 के आसपास मानते हैं। मुख्यतः प्रेमचंद जी ने इस उपन्यास में विधवाओं की समस्याएँ , विधवाओं के प्रति समाज की दृष्टि और नारी की समस्याओं के बारे में लिखा है।
इस उपन्यास का सारांश कुछ इस तरह का है - उपन्यास का नायक अमृतराय हैं। इनकी शादी लाला बदरी प्रसाद जी की बड़ी बेटी से हो जाती है प्रसव काल के समय इनकी मृत्यु हो जाती है। इस कारण अमृता राय विधुर बन जाते हैं। पत्नी मर जाने के दुख में वह दो साल देशाटन करके वापस लौटते हैं।
लाला जी की दूसरी बेटी प्रेमा भी सयानी हो जाती है। अमृतराय और प्रेमा के बीच की दोस्ती प्यार में बदल जाती है। वे एक दूसरे को चाहने लगते हैं। लालाजी प्रेमा की शादी अमृतराय के मित्र दाननाथ के साथ करना चाहते थे। लेकिन प्रेमा और अमृता राय के आपसी प्यार को देखकर अमृतराय से शादी करने का निर्णय लेते हैं।
इतने में अमृत राय के विचार बदल जाते हैं। वह किसी मंदिर में प्रवचन सुनकर यह प्रतिज्ञा कर बैठते हैं कि वह विधुर होने के कारण किसी विधवा से ही शादी करेगा। लाला जी को बहुत दुख होता है। अंततः लालाजी उसकी शादी दाननाथ से ही करने का निर्णय कर लेते हैं। अमृतराय भी अपने मित्र को समझाता है कि प्रेमा से वह शादी कर ले। अपने मित्र की बात मानकर दाननाथ प्रेमा से शादी कर लेता है।
अमृतराय अपनी सारी संपत्ति बेचकर वनीता भवन का निर्माण करता है जो विधवाओं और अनाथ लड़कियों के लिए एक शरणालय था। अमृतराय इसके माध्यम से उनकी सेवा करना चाहता था।
लाला बदरी प्रसाद जी का बेटा कमला प्रसाद बड़ा ही दुराचारी और लंपट आदमी होता है। लाला जी के पड़ोसी बसंत कुमार नदी के प्रवाह के बीच में जाकर डूब जाने से इनकी मृत्यु हो जाती है। जिससे उनकी पत्नी पूर्णा विधवा बन जाती है। पूर्णा का कोई नहीं होता और इसके पति के मरने से वह अनाथ बन जाती है। लालाजी उस पर तरस खाकर उसे अपने घर में आश्रय देते हैं। लेकिन लाला जी का बेटा कमला प्रसाद उसके सौंदर्य से मुग्ध हो जाता है। उसके साथ छेड़ - छाड़ करता रहता है। कमला प्रसाद की पत्नी सुमित्रा पूर्णा को धैर्य के साथ समस्याओं से लड़ने की प्रेरणा देती रहती है।
एक दिन कमला प्रसाद बहाना बनाकर पूर्णा को बगीचे में ले जाता है और वहाँ उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश करता है। पूर्णा धैर्य के साथ उससे लड़ती है और कुर्सी से उसके सिर पर मार कर अपने - आप की रक्षा कर लेती है।
दाननाथ कमला प्रसाद की दोस्ती के कारण बिगड़ता जाता है। वह अपनी पत्नी प्रेमा पर शक करने लगता है। दाननाथ भड़काऊ में आकर सोचता है कि प्रेमा अभी भी अमृतराय से ही प्यार करती है। इस कारण दोनों के बीच हमेशा झगड़े होती रहती हैं। प्रेमा वनीता भवन में जाकर विधवाओं की सेवा करते हुए वहीं रहने लगती है।
कमला प्रसाद के बारे में जानकर पिता लाला जी को बहुत दुख होता है। दाननाथ असलियत को जानकर प्रेमा और अमृतराय से क्षमा माँगता है। इधर कमलाप्रसाद को समाज के लोग बुरा - भला सुनाते हैं। जिससे वह पूर्ण रूप से बदल जाता है। और समाज सेवक बन जाता है। अमृतराय चंदा वसूल कर शरणालय को चलाने का निर्णय लेता है। दाननाथ अपने मित्र से जब प्रतिज्ञा के बारे में याद दिलाता है, तो अमृत राय कहते हैं - मैं मानता हूँ कि इस वनीता भवन शरणालय को बिना किसी रूकावट से चलाने में ही मेरी प्रतिज्ञा की पूर्ति है।
मेरे विचारों में -
प्रेमचंद जी के सफल उपन्यासों में यह भी एक है। इसमें प्रेमचंद्र जी विधवाओं की उन्नति के बारे में सोचा है। विधुर दूसरी शादी कर सकता है लेकिन विधवा दूसरी शादी करने की बात को यह समाज स्वीकार नहीं करता है। प्रेमचंद जी आदर्श पूर्ण बातों को कहते ही नहीं है बल्कि अपने निजी जीवन में भी विधवा से शादी करके कई लोगों के लिए आदर्श बने हैं। प्रेमचंद के कई उपन्यासों में यह देख सकते हैं कि सेवा सदन, प्रेमाश्रम या वनीता भवन खोलना। इससे स्पष्ट होता है कि वह एक सच्चे समाज सुधारक थे।
स्त्री के प्रति उनके विचार बहुत ही उदार थे। हर एक उपन्यास में उन्होंने स्त्रियों की समस्याओं को मुखरित किया और उनका समाधान भी हमारे सामने रखा। प्रेमचंद जी के उपन्यासों में सहजता झलकती रहती है। उपन्यास की घटनाएँ हमें कहीं ना कहीं सुनी या देखी हुई लगने लगती हैं। इसीलिए पाठक उपन्यास पढ़ते समय मु्ग्ध होकर अपने आपको भी उपन्यास का एक पात्र होने का अनुभव महसूस करता है।
गबन
सारांश :
गबन माने चोरी है। प्रेमचंद जी को कलम का सिपाही कहा जाता है। उपन्यास की नायिका जालपा है। इनकी माता का नाम मानकी है, पिता दीनदयाल। इनकी महीने भर की कमाई मात्र ₹5 होती है।
एक दिन हार बेचने वाला आदमी उनकी गली में आता है। जालपा को आभूषण व हार बेहद पसंद आते हैं। वह अपनी माँ से हार खरीदने के लिए जिद करती है। वह हार 20 आने की होती है जो अपने लिए बहुत महंगा होता है। फिर भी खरीद लेते हैं।
एक दिन दीनदयाल अपनी पत्नी के लिए चंद्रहार खरीद कर लाता है। जालपा को वह बहुत पसंद आता है। हार माँगने पर उनकी माँ कहती है कि तुम्हारी शादी के समय तुम्हारे ससुराल वाले तुम्हें जरूर लाकर देंगे। फिर वह सपने देखने लगती है।
दीनदयाल का मित्र दयानाथ है। उसके बेटा रमानाथ के साथ जालपा की शादी करना चाहते हैं। रमानाथ तो काम - काज कुछ करता ही नहीं है। रमानाथ के दोस्त भी इसी तरह के होते हैं। वे सब मिलकर एक योजना बना लेते हैं। दस लोग दस अलग-अलग उद्योगों से संबंधित कपड़े सिलवा लेते हैं और आपस में रोज बदल-बदल कर पहनने लगते हैं। अपने - आपको एक दिन डॉक्टर, दूसरे दिन वकील मानते हुए खुश होने लगते हैं।
दयानाथ की पत्नी कहती है कि रमानाथ की शादी करेंगे तो शायद वह सुधर जाएगा। इसलिए शादी की बात पक्की कर देते हैं। शादी के लिए अपनी हैसियत से बढ़कर शादी का इंतजाम करते हैं। आभूषण उधार पर लेते हैं।
जालपा की सोच के अनुसार शादी में चंद्रहार ना मिलने पर वह नाराज़ होती है और शर्त रखती है कि चंद्रहार लाने के बाद ही मैं दूसरे आभूषणों को पहनूँगी। रमानाथ तो अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था।लेकिन कर्जा बढ़ते ही जाने के कारण विरक्त रमानाथ उन गहनों को एक रात स्वयं चोरी करके अपने पिता को देता है और दोनों मिलकर उन्हें बेच देते हैं तथा उधार चुकता करने की कोशिश करते हैं।
कर्जा और भी होने के कारण वह पिताजी की सहायता के लिए काम करके पैसे कमाना चाहता था। पत्नी के कहने पर रमानाथ के साथ शतरंज का खेल खेलने वाला रमेश की सहायता से नौकरी पाकर रमानाथ नौकरी करने लगता है। वहाँ वह अंधाधुंध पैसे कमाता है। पैसे तो बहुत मिल रहे थे। इसी विश्वास से वह उधार में गहने खरीदकर माँ और पत्नी को देता है। माँ और पत्नी बिना बताए गहने खरीदने लगती हैं। इससे कर्जा बढ़ता ही जाता है। विवश होकर वह फिर से चोरी करने की योजना बनाता है और 800 रुपये जहाँ वह काम करता था, वहाँ से उठा लिया था। पुलिस चोरी के इल्जाम में पकड़ कर ले जाने के डर से वह कोलकाता भाग जाता है । जाने से पहले अपनी पत्नी को पत्र के जरिए सब कुछ बता देता है।
जालपा को पहले बहुत गुस्सा आता है लेकिन क्षमा करके किसी ना किसी तरह पैसों का इंतजाम करके पुलिस को चुका देती है। कोलकाता में पुलिस रामनाथ को पकड़ कर जेल में डाल देना चाहती है लेकिन उस पर कोई मुकदमा ना होने के कारण उसे अपने पास ही रख लेती है और जबरदस्ती किसी क्रांतिकारी के खिलाफ गवाही दिलवाती है जिससे वह जनता के भी खिलाफ बन जाता है। जनता उसे मार देने का आग्रह करती है। पुलिस मुकदमा पूरी होने तक उसे पकड़े रखती है।
रमानाथ की पत्नी कोलकता घूमने जाती है। वहाँ पति को ढूंढती है लेकिन पता ना चलता। फिर वह एक योजना के अंतर्गत शतरंज का एक नक्शा बनाती है और कहती है कि जो भी उसे भर देगा उसे 50 रुपये का इनाम दिया जाएगा। इसके मदद से वह अपने पति तक पहुंचती है और उसे छुड़ाती है। इसमें जोहरा नामक वेश्या भी उसकी मदद करती है।
सब वापस गाँव आते हैं। रमानाथ खेती करने लगता है। सारे बुरे काम छोड़ देते हैं। जोहरा भी इन्हीं के साथ रहने लगती है। एक दिन जोहरा की मृत्यु नदी के बाढ़ के कारण होती है।
मेरे विचारों में :
साहित्य समाज का दर्पण होता है। मुख्यतः प्रेमचंद जी की रचनाएँ तो अत्यंत सहज होती हैं। उनकी रचनाएँ पढ़ते समय हमें ऐसा लगता है कि कहीं ना कहीं कभी ना कभी देखी या सुनी हुई घटनाएँ हैं।
जालपा के माध्यम से प्रेमचंद जी हमें बताते हैं कि आभूषण या किसी अन्य चीज के प्रति जरूरत से ज्यादा लालच रखना ठीक नहीं है। मानकी के माध्यम से वे कहते हैं कि बच्चों के मन में अनुचित उमंगों से भरना भी ठीक नहीं है। रमानाथ के माध्यम से कवि ने बताया कि कर्तव्य भ्रष्ट होकर घूमना, आडंबर जीवन जीना, फ़ुज़ूल खर्चे, गबन माने चोरी करना अपने जीवन पर किस तरह कुप्रभाव डालते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि मानवता, सहायता का गुण तो व्यक्ति के स्तर पर निर्भर नहीं होता बल्कि उनके विचारों और संस्कारों पर निर्भर होता है।
प्रेमचंद के जीवन सम्बंधित कुछ मुख्य बातें -
प्रेमचंद का प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा। सौतेली माँ का व्यवहार, बचपन में शादी, पांडे - पुरोहित का कर्मकांड, किसानों और क्लर्कों का दुखी जीवन ये सब प्रेमचंद ने 16 साल की उम्र में ही देख लिया था। इसीलिए उनके ये अनुभव एक जबरदस्त सच्चाई लिए हुए उनके कथा साहित्य में झलक उठे थे।
13 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने तिलिस्म ए होशरूबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रतन नाथ ‘ शरसार ‘, मिर्जा हाथी रुसवा और मौलाना शरर के उपन्यासों से परिचय प्राप्त कर लिया।
प्रेमचंद जी का पहला विवाह 15 साल की उम्र में ही हुआ। उनकी पत्नी कुरूप और उम्र में उनसे बड़ी थी। 1906 में उनका दूसरा विवाह शिवरानी देवी से हुआ जो बाल - विधवा थी। वह सुशिक्षित महिला थी। उनकी तीन संताने हुई - श्रीपद राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
1898 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्त हो गए। 1910 में अंग्रेजी, दर्शन, फारसी और इतिहास लेकर इंटर किया और 1919 में अंग्रेजी फारसी और इतिहास लेकर बी ए पास किया। इसके बाद वे शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए।
1921 ई. में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के सरकारी नौकरी छोड़ने के आह्वान पर स्कूल इंस्पेक्टर पद से 23 जून को त्याग पत्र दे दिया। इसके बाद उन्होंने लेखन को अपना व्यवसाय बना लिया।
प्रेमचंद का साहित्यिक जीवन : प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन का आरंभ 1901 से ही हो चुका था। आरंभ में वह नवाब राय के नाम से उर्दू में लिखते थे। प्रेमचंद की पहली रचना के संबंध में रामविलास शर्मा जी लिखते हैं कि प्रेमचंद की पहली रचना जो अप्रकाशित ही रही शायद उनका वह नाटक था जो उन्होंने अपने मामा जी के प्रेम और उस प्रेम के फलस्वरूप चमारों द्वारा उनकी पिटाई पर लिखा था। इसका जिक्र उन्होंने पहली रचना नाम से अपने लेख में लिखा है।
उनका पहला उपलब्ध लेखन उर्दू उपन्यास असरारे म आबिद है जो धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ। इसका हिंदी रूपांतरण देवस्थान रहस्य नाम से हुआ। दूसरा उपन्यास हमखुरमा व हमसवाब है जिस का हिंदी रूपांतरण प्रेमा नाम से 1907 में प्रकाशित हुआ। 1907 में ही उनका पहला कहानी संग्रह सोजे वतन प्रकाशित हुआ। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत इस संग्रह को अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया और इनकी सभी प्रतियाँ जब्त कर लीं। उसके लेखक नवाब राय को भविष्य में लेखन कार्य ना करने की चेतावनी दी। इसके कारण उन्हें नाम बदलकर प्रेमचंद के नाम से लिखना पड़ा। उनका यह नाम उनका मित्र दया नारायण निगम ने रखा था।
प्रेमचंद नाम से उनकी पहली कहानी बड़े घर की बेटी ‘ जमाना ‘ पत्रिका के दिसंबर, 1910 के अंक में प्रकाशित हुई। 1914 में उस समय की प्रसिद्ध हिंदी मासिक पत्रिका सरस्वती के दिसंबर अंक में पहली बार उनकी कहानी सौत नाम से प्रकाशित हुई। 1917 ई. में उनका पहला हिंदी उपन्यास सेवा सदन प्रकाशित हुआ।
उन्होंने कुछ महीने मर्यादा नामक पत्रिका का संपादन किया। इसके बाद उन्होंने लगभग 6 वर्षों तक हिंदी पत्रिका माधुरी का संपादन किया। 1922 में उन्होंने बेदखली की समस्या पर आधारित प्रेमाश्रम उपन्यास प्रकाशित किया। 1925 में उन्होंने रंगभूमि नामक वृहद उपन्यास लिखा जिसके लिए उन्हें मंगल प्रसाद पारितोषिक भी मिला। उन्होंने महादेवी वर्मा द्वारा संपादित हिंदी मासिक पत्रिका चांद के लिए धारावाहिक उपन्यास के रूप में निर्मला की रचना की। इसके बाद उन्होंने कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि और गोदान की रचना की।
उन्होंने 1930 में बनारस से अपना मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। 1932 ई. में उन्होंने हिंदी साप्ताहिक पत्र जागरण का प्रकाशन आरंभ किया। उन्होंने लखनऊ में 1936 में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता की। उन्होंने मोहन दयाराम भवनानी की अजंता सीने टोन कंपनी के कथा लेखक की नौकरी भी की। 1936 में प्रदर्शित फिल्म मजदूर की कहानी उन्होंने ही लिखी थी। मरणोपरांत उनकी कहानियाँ मानसरोवर के नाम से आठ खंडों में प्रकाशित हुईं ।
भाषा शैली : प्रेमचंद जी उर्दू से हिंदी में आए थे। अतः उनकी भाषा में उर्दू की लोकोक्तियाँ तथा मुहावरों की प्रयोग की प्रचुरता मिलती है। उनकी भाषा सहज, सरल, प्रवाह पूर्ण मुहावरेदार एवं प्रभावशाली है। उसमें व्यंजना शक्ति भी विद्यमान है। मुंशी प्रेमचंद्र की भाषा पात्रों के अनुसार परिवर्तित हो जाती है। मुंशी प्रेमचंद की भाषा में सादगी एवं अलंकरिकता का समन्वय विद्यमान है।
इनकी शैली आकर्षक है। इसमें मार्मिकता है। उनकी रचनाओं में चार प्रकार की शैलियाँ उपलब्ध होती हैं। वे इस प्रकार हैं - वर्णनात्मक, व्यंग्यात्मक, भावात्मक तथा विवेचनात्मक। चित्रात्मकता मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं की विशेषता है।
प्रेमचंद युग की परिस्थितियाँ : प्रेमचंद के युग को मोटे तौर पर 1880 से 1936 तक माना जा सकता है। यह युग भारत की दासता का युग था जबकि पूरे भारतवर्ष में ब्रिटिश साम्राज्य के जड़े दृढ़ता पूर्वक जम गई थीं।
एक ओर भारत की अधोगति को चित्रित करता है वहीं दूसरी ओर भारत की भावी उन्नति के पथ को स्पर्श करता है। अंग्रेजों ने देश की ग्रामीण व्यवस्था को पूर्णतः नष्ट कर दिया था। उन्होंने जमींदारों को मध्यस्थ बना दिया था। जमींदारों को पूरी छूट थी और उन्होंने अपना मनमाना लगान वसूल करना शुरू कर दिया। इसके अतिरिक्त जमींदारों का जीवन विलासिता का जीवन था। जो खर्चें वे स्वयं पूरा करने में असमर्थ थे, उन्हें किसानों से वसूल करने लगे। मालगुजारी वसूल करने के लिए अंग्रेज तरह - तरह के कानून बनाते थे। जिससे किसानों को आवश्यकता से अधिक धन देना पड़ता था।
जहाँ तक धर्म से संबंध है प्रेमचंद के समय में एक आंदोलन आर्य समाज का था। इस युग में अनेक सुधारवादी आंदोलनों का सूत्रपात हुआ और धीरे-धीरे धार्मिक रूढ़ियों में लोगों की आस्था कम होती गई।
देश में अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता की लड़ाइयाँ चल रही थीं। गाँधी जी के नेतृत्व में भारत के भविष्य के निर्माण की ओर लोग आगे बढ़ रहे थे।
प्रेमचंद यह मानते थे कि व्यक्ति सामाजिक इकाई है। वह समाज की सीमाओं के भीतर ही बनता बिगड़ता है। समाज की सत्ता सर्वोपरि होती है। इसलिए प्रेमचंद जी ने समाज की ज्वलंत समस्याओं की कभी उपेक्षा नहीं की और ना कभी उन्हें अविश्वसनीय ढंग से ही चित्रित किया। अपने काल की सभी परिस्थितियों का प्रेमचंद जी ने अपनी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि से अध्ययन किया। मूल तत्व का अन्वेषण किया और प्रगतिशील मूल्यों की स्थापना करते हुए सामयिक, सामाजिक सत्यों का चित्रण किया।
1904 में रूस जापान युद्ध हुआ। इसी समय के आसपास बंग - भंग आंदोलन आरंभ हुआ। जिसका पूर्वाभास 1904 - 05 में ही मिल चुका था। इस आंदोलन से बंगालियों में तीव्र असंतोष की भावना फैली और यह बंगाल तक ही सीमित ना रह कर उसकी ध्वनि भारत के कोने - कोने में फैल गई। रविंद्रनाथ ठागोर ने अपनी कविताओं से राष्ट्रीय चेतना उभारने में बहुत सहायता पहुँचाई। यह आंदोलन प्रेमचंद के जीवन में शक्ति के उद्गम स्त्रोत के रूप में ही आया और उनमें सामाजिक सदस्यता की एक नई लहर व्याप्त हो गई। उन्होंने भी अपने साहित्य में इन्हीं भावनाओं को अभिव्यक्ति देकर भारतवासियों को राष्ट्रीय जागरण की ओर उन्मुख किया।
अवुसुला श्रीनिवासा चारी ‘ शिक्षा रत्न ‘
टी जी टी ( हिंदी )
कार्य स्थल : समाज कल्याण आवासीय पाठशाला,
नल्लावागु , सिरगापुर मण्डल, संगारेड्डी जिला, तेलंगाना - 502287
चरवाणी : 8801600139 , 8328191672
ईमेल : charysrinivasa53@gmail.com
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