हिंदी साहित्य के चार कालों की सामजिक परिस्थितियां तथा नारी का स्थान
हिंदी साहित्य के चार काल निम्नलिखित हैं।
१) आदि काल - वीर गाथा काल - अलंकृत काल - सन् १०५० से १३७५ ई वी तक।
२)
भक्ति काल
- सन् १४०० से १७०० ई वी तक
३)
रीति काल
- सन् १७०० से १९०० ई वी तक
४)
आधुनिक काल
- गद्य काल - सन् १९०० ई वी से अब तक
१)
आदि काल की सामाजिक परिस्थितियां व नारी का स्थान
:
आदि काल को वीर गाथा काल,आलंकृत काल कहा गया| इसे सिद्ध काल, सिद्ध सामंत काल, चारण काल भी कहा जाता है।
आदि काल में समाज मुख्यतः दो वर्गों में बांटा गया वे हैं सेवक तथा सेव्य। सेव्य वर्ग में राजा सामंत तथा सरदार आते थे। सेवक वर्ग में प्रजा, दास,दासी,भाँट,वेश्या आदि आते आते थे।
स्वार्थ,अहंकार एवं संकीर्णता से उन्मत्त होकर राजनीतिक एकता भंग हो रही थी।
सेव्य वर्ग का मनोरंजन तथा सेवहि सेवक वर्ग के लिए परमार्थ बना हुआ था।
बारहबरसी ले कूकर ज्ञीये
औ तेरह ले जिए सियार।
बरिस अठारह क्षत्री जियें,
आगे जीवन के धिक्कार।।
उपर्युक्त उदाहरण से वीरगाथा काल के काव्य वीर रस प्रधान है इसका आभास होता है। काव्य का विषय अपने आश्रय दाता राजाओं की जीवन घटनाओं का विस्तृत वर्णन है।
नारी/स्त्री में आत्म-उत्सर्ग की भावना थी। इस काल में पत्नी पति की, बहन भाई की, माताएं वीर पुत्रों की कामना करती थी। उन्हें सदा वीर बने रहने के लिए उनका उत्साह बढ़ाती थी।
धार्मिक परिस्थितियाँ योग्य नहीं थी।
गोरी सोवे सेज पर,
मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने, रैनि भई चहुँ देस।।
पूजा पाठ यज्ञ आदि केवल कुछ लोगों के लिए सीमित थी। धार्मिक कृत्यों के नाम पर बलियाँ चढ़ाना और अन्य असामाजिक कार्य भी किये जाते थे। स्त्रियों के लिए युद्ध किये जाते थे।
कवि वीरता की रचनाएँ करते थे। उनका उत्तरदायित्व अधिक था। सैनिकों को तथा राजकुमारों को वीरता की गाथाएँ सुनाई जाती थी।
कविगण राजा की स्तुति तथा विजय पर अतिशयोक्ति की रचनायें करते थे।
बारह से बहोत्तराँ मझारी
, जेठ वदी नवमी बुधवारी।
नाल्ह रसायण आरे भई,
सारदा तूठी ब्रह्मा कुमारी।।
समाज व जनता की प्रधानता कम थी या नगण्य कहा जासकता है। नारी की पूजा नहीं परंतु नारी उनकेलिए भोग तथा मनोरंजन की कोई वस्तु बानी हुई थी।
वह पुरुष की सम्पत्ति मात्र थी। नारी का अधिक शोषण होता था। निरक्षरता के कारन धार्मिक विषमताएं, अंध विश्वास और नारी की उपेक्षा की जाती थी।
स्वयं वर को चुनने का अधिकार होने पर भी कठपुतली की तरह थी। नारी की शिक्षा पर कोई बल नहीं दिया गया था। नारी को केवल त्याग की मूर्ति के रूप में देखा गया था।
२)
भक्ति काल की सामाजिक परिस्थितियां व नारी का स्थान
:
भक्ति काल हिंदी साहित्य का विशेष काल है। समाज की साड़ी विषमताओं को सहन करते हुए और शासकोमन के कर वसूली,
उनके साथ व्यवहार तथा शोषण को सहन करते हुए प्रजा ऊब गयी थी इसलिए उन्होंने भक्ति को मोक्ष का मार्ग माना।
जब हम होते तब तू नहीं,
अब तू है,
मै नहीं।
अतल अगम जैसे लहरी भाई उदधि,
जल केवल जल माहि।।
कबीर की उपासना निर्गुण परब्रह्म की है। इसके राम दशरथ के पुत्र रामचंद्र नहीं ह।
इनके राम निर्गुण निराकार के भी ऊपर ओमकार से भी परे है अकार, उकार, मकार इनके परे भी बताया गया है।
इनके परब्रह्म इनके ह्रदय में ही स्थित है।
वे कहते हैं ,
तेरा साई तुज्झ में,
ज्यों पहुपन में बॉस।
कस्तूरी का मिरग ज्यों,
फिर-फिर ढूंढे घास।।
कई संतों ने भरसक प्रयास किया की भक्ति कमें जो शक्ति है वह प्रजा को बदले और उन्हें प्रशांतता प्रदान करे ।
कवियों ने जैसे सूरदास,मीराबाई,रैदास,रसखान,घनानंद, के काव्य संग्रह रस,चंद अलंकार, बिम्ब ,प्रतीक, सोरठा,रूपक, भाव का सुन्दर चित्रण किया है।
समाज में नारी को केवल उच्च कोटि का मन जथा था परंतु बाल विवाह, पुनर विवाह पर रोक, देवदासी,प्रथा जैसी कुरीतियों के माध्यम से नारी जाती का शोषण हो रहा था।
नारी को पूजने की बात करते हुए ही पुरुष आधिक्यता तथा विचारों में संकीर्णता बानी हुई थी। बहु पत्नी प्रथा भी थी। नारी की प्रशंसा व निंदा दोनों का बोलबाला था।
भक्ति काल में मुसलमान आक्रमण कार्यों एवं निरंकुश शासक वर्ग के कारण नारी की स्थिति बदतर थी। कवित्यों के कलमों से नारी का आदर्श झलक था।
नाथों के प्रभाव में ज्ञानमार्गी शाखा कवियों ने विलासिनी , कामिनी , अथवा कुलटा शब्दों से आलोचना की। भक्ति कालीन हिंदी काव्य की प्रमुख भाषा ब्रज भाषा है।
इसके अनेक कारण है। परंपरा से पछाँही बोली शौरसेनी मध्यदेश की काव्य भाषा रही है। ब्रजभाषा आधुनिक आर्यभाषा काल में उसी शौरसेनी का रूप थी।
सूरदास ने नारी को हृदयहीन एवं कठोर कहा है।
नारी नर सौ प्रीत लगावै,
पै नारी तिह मन महि लावे।
नारी सगै प्रीति जो करे,
नारी ताहि तुरत परिहरै ।।
संतों ने नारी से दूर रहने का उपदेश दिया। सूरदास यशोदा को वात्सल्य की मूर्ति तथा राधा को प्रेयसी के रूप में उभरा था।
निर्गुण कौन देश को वासी
?
मधुकर हँसी समुझाय सौंह दे बूझती साँच,
न हाँसी।
को है जनक,
जननी को कहियत,
कौन नारी,
कौन दासी।
कैसे वरन भेस है कैसो,
केहि रास की अभिलासी।।
भोग विलासता में डूबे शासकों के कारण मध्य युग में नारी की स्थिति दयनीय थी और उपभोग्य के रूप में देखी तथा मानी गयी।
केशवदास जी ने स्त्री को बड़ी मान्यता दी, कहीं भी अश्लीलता की तुलना से नारी को न देखा गया था। चिंतामणि, देव, रसलीन, जैसे कवियों ने नारी को विलासता की सामग्री तथा श्रृंगार की वस्तु माना।
नख-शिख पर्यंत उनका सौंदर्य आभूषणों का वर्णन किया। इस काल में पावन भक्ति की धरा प्रवाहित हुई। हिंदुओं पर जिजिया कर लगाया गया। समाज में पर्दा तथा सति प्रथा का प्रचलन था।
नारी की स्थिति समाज में अत्यंत उपेक्षा पूर्ण हो गयी थी।
छायावादी कवियों ने नारी को सहचारी,माता,देवी, आदि रूपों में देखा और उनका गुण गान किया।
महादेवी वर्मा ने छायावादी कवित एके माध्यम से नारी /प्रेमिका की विरह वेदना पर अधिक बल दिया।
विरह की घड़ियाँ हुई अली
मधुर-मधु की यामिनी-सी
मिलन का मत नाम लो मै,
विरह में चिर हूँ।।
प्रगतिवाद में नारी के काव्य चित्रण में अधिक बदलाव आया।
स्त्री की सम्मुख आनेवाली सामाजिक, आर्थिक समस्याओं के बारे में अधिक महत्व दिया गया परंतु कविता या काव्य अपनी धारा से अश्लीलता के पथ पर चलने लगी।
समकालीन कवयित्रियों ने मानसिक तथा शारीरिक उत्पीड़न झेलने वाली नारी का मार्मिक ह्रदय स्पर्शी चित्रण किया।
लेकिन नारी ने कभी अधीनता को स्वीकार नहीं किया था।
३)रीतिकाल की सामाजिक परिस्थितियां तथा नारी का स्थान
(सन १७०० से १९०० तक)
रीतिकाल का युग सामंतवादी युग था और कई दोषों से युक्त था। इस काल में नैतिक तथा सामाजिक मूल्यों को पतन हुआ था।
नारी को संपत्ति मानकर उसका भोग इनके जीवन का कार्य बना हुआ था। रीतिकाल ब्रज भाषा का स्वर्ण युग है।
क्योंकि जहाँ भक्तिकाल में यह भाषा कृष्ण भक्ति कवियों तक सीमित थी वही इस काल तक आते-आते पूर्ण रूप से काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी।
इसके बाद ब्रज भाषा में लगभग २०० वर्षों तक हिंदी कविता पर छाई रही।
राजा जयसिंह जब छोटी रानी के प्रेम में अत्यंत लींन होकर राज- काज संभालना छोड़ दिया तो बिहारी ने उन्हें अपने दोहे से सचेत किया कि:
नहीं पराग नहीं मधुर मधु,
नहीं विकास यही काल।
अली काली ही सो बंध्यों,
आगे लोन हवाल।।
भ्रष्टाचार और पाप का केंद्र धर्म-स्थान बने हुए थे। रूढ़िवादिता अधिक होने के कारण वास्तविकता से दूर और असामाजिक कार्यकलापों में अधिक था।
साहित्य और कला की दृष्टि में काफी समृद्ध काल रहा।
चमक-झमक-वारि-ठमक-जमक-वारी,
रामक-तमक-वारी जाहिर जगति है।
राम
! ऐसी रावरे कि राण में नरन में--
निलज वनिता सी होरी खेलन लागति है।।
ललित कलाएँ चित्रकला तथा संगीत कला का पोषण तथा आदर होने लगा। कला वासना-पूर्ति का साधन और नारी उसका आलम्बन बनी हुई थी।
सूरा तथा सुंदरी के संगत में विलास जीवन बिताना उनकी दैनिकी बन चुकी थी।छोटे राज्यों के राजा तथा सामंत अपने आपको अंग्रेजों को समर्पित कर आँख मूंदकर जीवन बिता रहे थे।
चिकित्सा , शिक्षा का कोई प्रमुख प्रबंध नहीं थी। मुग़लों के शासन का वैभव चरम सीमा पर थी।
मुग़लों पर धीरे-धीरे अंग्रेजों का बोलबाला होता गया।
राजपुत्र कुचक्रों, षड्यंत्रों और आतंरिक कलह के शिकार होकर पतन की और नैतिक मूल्यों का ह्रास हो गया था।
रामलीला तथा तुलसीदास का रामचरित मानस केवल मनोविनोद तक ही सीमित था।
जयशंकर प्रसाद जी की छायावादी कविता में लाक्षणिक शब्दों का प्रयोग बहुत लाजवाब था ।
झंझा झकोर गर्जन था,
बिजली थी,
नीरद माल।
,
पाकर इस शून्य ह्रदय को, सबने आ डेरा डाला।।
रहसयवादी कविता के अंतर्गत कबीर ने कहा:
लाली मेरे लाल की जित देखो तिथ लाल।
लाली देखन मै गयी,
मै भी हो गयी लाल।।
कविता ने अपनी चरम सीमा तक पहुँचने का प्रयत्न किया।
तुम प्राण और मै काया।
तुम शुद्ध सच्चिनानन्द ब्रह्मा,
मै मनमोहिनी माया।
तुम प्रेममयी के कंठहार,
मै वेणी काल नाशिनी,
तुम कर-पल्लव झंकृत सितार,
मै व्याकुल विरह संगिनी।।
इस प्रकार सारे भारत वर्ष में कविता की धाराएँ रहस्यवाद, छायावाद आदि का विकास हुआ।
४)
आधुनिक काल कि सामाजिक परिस्थितियां व नारी का स्थान
(सन १९०० से अब तक
)
अंग्रेजी शासन से ऊबकर कई परिवर्तन हुए।उनकें शासन, नियम तथा नीतियों का प्रभाव भारतीय जीवन शैली, खान-पान पहनावा आदि में भी कुछ बदलाव आये।
सामाजिक तथा धार्मिक सुधार भी होने लगे।विलियम बेंटिंक ने सति प्रथा का खंडन किया। राजा राममोहन रॉय ने पुनर्विवाह को माना तथा दहेज़ प्रथा, बाल्य विवाह का खंडन किया।
अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और तेजी से विकास हुआ। कड़ी बोली भाषा को स्वीकार किया गया और इसी भाषा को इस काल के लिए सही माना गया। नाटक, कहानी, उपन्यास लेखन के लिए स्वर्ण युग माना गया।
कई हिंदी समाचार पत्रों का प्रकाशन हो रहा है। उनमे से मुख्य पत्रिकाएं उदन्त मार्तण्ड, बनारस अखबार, सरस्वती , प्रजा हितैषी आदि ने साहित्य, कविताएँ, राजनीती आदि समाचारों से जनता का मनोरंजन भी किया और साहित्य की सेवा भी की।
भारतेन्दु हरिस्चन्द्र में राष्ट्रीयता का भाव कूट-कूट कर भरा हुआ था।भाषागत इनका सिद्धांत इस प्रकार है।
निज भाषा उन्नति आहे,
सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय की सूल।।
जोतिबा फूले तथा सावित्री बाई फूले ने स्त्रियों के उद्धार हेतु शिक्षा के महत्त्व का प्रचार व प्रसार किया।
सावित्री बाई फूले पहली स्त्री शिक्षिका बानी और कई विद्यालय खोले तथा कई स्त्रियों को शिक्षा प्रदान की। दलित उद्धार के लिए कटिबद्ध बने।
नारी शिक्षा ही देश के उद्धार तथा विकास का कारण बनेगा।प्रजा की सोच में बदलाव आएगा इसका उन्होंने बड़ा विश्वास किया और सिद्ध भी किया कि एक स्त्री शिक्षा अनेकों के जीवन में अपेक्षित बदलाव ला सकती है।
समाज और धर्म के क्षेत्र में हुए इन बदलावों का सही प्रभाव हिंदी साहित्य पर,पड़ा जो अपेक्षित थी।
क्योंकि भारतीय संस्कृति, परंपरा पर शक,हूण, तुर्की , फारसी, पुर्तगाली, फ़्रांसीसी, अंग्रेज सभी का भी प्रभाव था और इस सभ्यता, संस्कृति में सबके लिए अमिट छाप रहता है और इसलिए भिन्नता में एकता दृष्टिगोचर होती है।
डा बी आर आंबेडकर ने भी शोषितों, पीड़ितों, दलितों के हक़ के लिए आजीवन कार्य किया और संविधान की रचना तथा नियमों की रचना की।
सामजिक परिस्थितियों में बदलाव के साथ-साथ श्रृंगार, भक्ति व कुलीन वर्ग के विषयों से परे आम आदमी की, समाज की परिस्थितियों तथा प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए रचनाएँ की गयी।
रामचंद्र शुक्ल भारतेन्दु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विववेदी, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी जैसे कवियों ने हिंदी साहित्य को एक नया रूप दिया।प्रगतिवाद, प्रयोगवाद का बोलबाला प्रारम्भ हुआ।
नारी चेतना, हर क्षेत्र में स्त्रियों का योगदान है।आज महिला घर के चार दीवारों से निकलकर अंतरिक्ष गमन तक हर क्षेत्र में अपना अस्तित्व बना रही है और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए हर पल समय को ठीक से उपयोग में ला रही है।
जॉन ऑफ़ आर्क, मदर टेरेसा , मेरी क्यूरी, इंदिरा गाँधी, मर्लिन मुनरो , आंग सां सूकी , एलिज़ाबेथ १ जैसे कई नारी शिरोमणियाँ अपने अपने देशों का नाम रोशन कर रही हैं ।
खेलों में राजनीति में, अंतरिक्ष में हर क्षेत्र में अपनी सत्ता दिखा रही हैं।अपना चाप छोड़ रही है। आधुनिक काल के परिस्थितियों के हिसाब से पुरुष की विचारधरा भी बदल गयी है।
समाज में गाँव, शहर, नगर सभी लोग नौकरी के लिए,पढाई के लिए जा रहे है। उनकी जीवन शैली भी बदली और उनकी विचारधारा भी ।
आज ऐसा समय आया है की पुरुष और स्त्री दोनों को समाज के सामान अंग माना जा रहा है। और दोनों एक दुसरे का हर कार्य में साथ दे रहे है। हिंदी काव्य अपने नए रूप में ढल चूका है।
पंथ जी लिखते हैं ,
मै नहीं चाहता चिर सुख,
मै नहीं चाहता चिर दुःख,
सुख-दुःख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरण,
फिर घन में ओझल हो शशि
फिर शशि में ओझल हो घन।।
इस कविता से पता चलता है कि सुख-दुःख जीवन में आती जाती है जैसे कभी मेघो के पीछे चन्द्रमा छिप जाता है कभी चन्द्रमा के पीछे मेघ छिप जाते हैं।
जीवन भी ऐसे ही एक सुख दुःख की आँख मिचौनी खेल है। कोई आता है , कोई जाता है। कोई यहाँ पर हमेशा के लिए नहीं रह जाता। इसमें वैराग्य की भावना भी है। जीवन का सत्य भी।
आधुनिक काल को हिंदी साहित्य का विशेष युग माना जा सकता है, जिसमें पद्य,के साथ गद्य, समालोचना, कहानी, नाटक व पत्रकारिता का भी विकास हुआ।
इस कार्य के लिए गद्य ही अधिक उपयुक्त होती है। इस कारण आधुनिक युग की विशेषतः गद्य प्रधान रही है।
इस काल के आविष्कारों ने भाषा विकास में महान योगदान दिया।
नारी तेरी यही कहानी,
आँचल में दूध आँखों में पानी।
काल बदलने पर भी नारी की स्थिति में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ। वह पढ़ी-लिखी कमाऊ है। चार कालों में नारी की स्थिति और समाज का नारी पर व्यवहार अधिक न बदला। आज नारी की आर्थिक स्वंत्रता आने पर भी अत्याचार बढ़ने लगे। पुरुषहंकार स्त्री के प्राणों पर हावी है। आज समाज के दो अंग पुरुष और स्त्री माना जाता है फिर भी स्त्री पूर्ण रूप से स्वतंत्र नही। यह तभी संभव है जब मनुष्य की विचारधारा में बदलाव आये।
वी एन वी पद्मावती
हिंदी सहायक
,
सरकारी बालिकोन्नत पाठशाला
,
लालबाजार,
तिरुमलगिरी मंडल,
हैदराबाद-५०
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