Monday, January 31

हिन्दी मनोवैज्ञानिक उपन्यासों में नारी का स्थान - अलूरि कामेश्वरि "कविनि अलूरि" (साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


हिन्दी मनोवैज्ञानिक उपन्यासों में नारी का स्थान
-

अलूरि कामेश्वरि "कविनि अलूरि"


     प्रेमचंद युग के बाद के उपन्यासों में मनोवैज्ञानिक उपन्यासों को प्रमुख स्थान दिया गया हैं । इन उपन्यासों में  उपन्यासकार अनुभूति या कल्पना के बल पर व्यक्ति के मानसिक संघर्षौं  का चित्रण करते हैं । उनका प्रधान विषय अंतर्मन का निरूपण हैं। मनोविश्लेषक फ्रायड ,युग ,एडलर ,स्टेकेल व एलिस हेवलाक के सिद्धांत और मान्यताओं को लेकर मनोविश्लेषण किए हैं। मनोविश्लेषण की प्रणालियाँ -स्वप्न विश्लेषण ,प्रत्यावलोकन ,विश्लेषण ,सम्मोह विश्लेषण ,शब्द सह स्मृति परीक्षा और इतिवृत्तात्मक आदी के आश्रय में व्यक्ति के मानसिक गहराइयों को चित्रित किया है।   मनोवैज्ञानिक उपन्यासकारों में जैनेन्द्र ,अज्ञेय ,इलाचंद्र जोशी ,भगवतीचरण वर्मा ,डॉ.देवराज आदि प्रमुख हैं। जोशी और अज्ञेय के व्यक्तिवादी मनोविश्लेषण का एक ही मूल मंत्र है -"मनुष्य जो कुछ भी करता है वह अपनी दमित कामवासना या अपारितुष्ट अहं की क्षतिपूर्ति के लिए करता है। मानव के समस्त कार्यकलाप के मूल में उसके अवचेतन मन की प्रेरणा रहती है।"

     मनोवैज्ञानिक उपन्यासों के बारे में डॉ. रामदरश मिश्र कहते हैं -" मनोविज्ञान की नई खोजों और प्रयोगो ने चरित्र सम्बन्धी धारणाओं को बदल दिया। मनुष्य का चरित्र चेतन से नहीं बल्कि अवचेतन से निर्मित तथा संचालित होता है। अवचेतन में मनुष्य की आदिम वृत्तियाँ भले -बुरे की चिंता किये बिना बनी रहती है। ये वृत्तियाँ हमारे समस्त व्यक्तिगत और सामाजिक आचारो की मूल होती हैं। इस वृत्ति ने ही मनुष्य में अविस्मरणीय ,प्रभावशाली ,सशक्त की अपेक्षा व्यक्तित्वहीन तथा सामाजिक उद्देश्यौं से रहित पात्रों की सृष्टि की ,मगर सत्य है। "
        प्रेमचंद लिखते हैं -"मानव चरित्र पर प्रकाश डालना तथा उसके मूल रहस्यो क़ो खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है। अतः उपन्यास मानव चरित्र का चित्र मात्र है। "न्यू इंग्लिश डिक्शनरी में लिखा है -बृहत आकार गद्य आख्यान या वृत्तांत के अंतर्गत वास्तविक जीवन के प्रतिनिधित्व का दावा करनेवाले पात्रों व कथानक को चित्रित किया जाता है। "डॉ.देवराज कहते हैं -"उपन्यास में दो बातों का समावेश नितांत आवश्यक है प्रथमतः किसी व्यक्ति की कहानी होना तथा द्वितीय में उस कहानी के द्वारा उस व्यक्ति के आतंरिक व्यक्तित्व पर तथा उसके मानस व्यापार की रहस्यात्मकता पर प्रकाश डालना चाहिए। ''इलाचंद्र जोशी ने लिखा है -"आज के बुद्धिवादी श्रोता या पाठक की अंतरानुभूति के ऊपर कड़ी तिझल्ली की पर्त किसी साधारण रस को प्रवेश नहीं करने देती। जब तक आज के जीवन की गहन और व्यापक अनुभूतियों से प्राप्त रस कवि अथवा साहित्यकार के मूल रस में घुलकर ,एक रूप होकर एक तीव्र रसायन की सृस्टि नहीं करता तब तक आज के आलोचक अंतर की उस कड़ी झिल्ली के सूक्ष्म कोषों से होकर छनकर ,उसकी रसानुभूति से तादाम्य स्थापित नहीं कर पाता। 
        बीसवीं शती में यूरोपीय साहित्य का गहरा प्रभाव हिन्दी उपन्यासों पर पड़ा। मनुष्य को समझने के लिए विज्ञानिक प्रणाली लाई गई। इसका परिणाम स्वरुप ही मनोविज्ञान  के विभिन्न सम्प्रदायों का जन्म हुआ। हिन्दी उपन्यासों में मनोवैज्ञानिक प्रभाव से लेखकों ने अनेक रचनाएं की। जैनेन्द्र और अज्ञेय में विषयगत और शैलीगत में नवीनता और मनोवैज्ञानिकता देखने को मिलती है। आधुनिक युग में वैज्ञानिक अध्ययन को दर्शन से स्वतंत्र कर अनेक संप्रदायों ने जन्म लिया। मनोविश्लेषण संप्रदाय ,संपूर्णवादी संप्रदाय ,आचरणवादी संप्रदाय ,प्रवृत्तिवादी संप्रदाय तथा जीववादी संप्रदाय। फ्रायड ,युंग और एडलर विश्लेषणवादी हैं। मैक्डूगल के अनुसार मनुष्य में ज्ञानात्म ,भावात्मक और क्रियात्मक अनुभव की बारह प्रवृत्तियाँ होती हैं। वे हैं -राग द्वेष ,उत्साह ,प्रतिद्वंद्विता,अभिरुचि ,राग -विराग आदि। इन्ही प्रवृत्तियों को मनोविश्लेषण में स्वतंत्र रूप से  चित्रित किया गया जाता है। इससे मनुष्य के सच्चे रूप को समझा जा सकता है। 
        प्रेमचंद के उपन्यासों में मनोवैज्ञानिकता का दर्शन मनोविश्लेषण संप्रदाय के कोटी में नहीं है। मनोवैज्ञानिकता का पूर्ण समावेश जैनेन्द्र कुमार के परख उपन्यास में देखने को मिलता है मनोवैज्ञानिकता जैनेन्द्र कुमार के सुनीता ,सुखदा ,त्यागपत्र ,कल्याणी ,विवर्त और व्यतीत आदी उपन्यासों में भी देखने को मिलता है। जैनेन्द्र कुमार के सभी उपन्यासों में द्वन्दात्मक कथा वस्तु और उसका आधार दमन ,कुण्ठायें तथा मनोविकृतियाँ है। 
            डॉ. देवराज के शब्दों में -"जैनेन्द्र के प्रत्येक उपन्यास में अचेतन अहं और अचेतन का घात -प्रतिघात चलती ही रहती है। प्रत्येक के घर में बाहर की आकांक्षा है। पुकार है और वह घर बाहर के लिए आत्म समर्पण करने को विवश है। "सुनीता का हरिप्रसन्न के प्रति आत्म समर्पण ,'त्यागपत्र' की मृणाल का कोयले वाले का साथ देना ,'सुखदा "की दॄढ़ मर्यादा बुद्दी के लाल के सामने परास्त हो जाना ,'कल्याणी 'में अपने पति से उन्मत्त रहना ,'व्यतीत' में ब्याहता का एक ही दिन पहले क्रूर पापी को खबरदार कहकर तमाचा मारना ये सब प्रकारांतर से प्रतीक के रूप में विजय की ही कहानी है। "जैनेन्द्र कुमार के उपन्यासों में बाह्य द्वन्द की अपेक्षा आतंरिक द्वन्द्व का अधिक महत्व दिया गया है। इसी कारण जैनेन्द्र कुमार के उपन्यासों को मनोवैज्ञानिक उपन्यासों  के रूप में स्वीकार किए गए हैं। 
        मनोवैज्ञानिक उपन्यास मानव कार्य कलाप की मानसिक भूमिका को प्रत्यक्ष करता है। उसमें देश काल ,परिस्थिती के बंधनों से बहुत कुछ निरपेक्ष ,सहज मानवीय चेतना को मुख्य स्थान मिलता है। हिन्दी मनोवैज्ञानिक उपन्यासकारों में अज्ञेय ने मानवीय चेतना के अंतर्गत उसके "कलानुभव "तथा 'भावानुभूति' के सापेक्षिक महत्व का प्रश्न उठाया है।मनुष्य का कलानुभव तथा उसकी भावानुभूति प्रवृत्ति में परस्पर भिन्न है। एक को यदि सीधी रेखा की उपमा दी जाय तो मनुष्य का दूसरा बोध गुंजल्क के समान गहन है। अज्ञेय ने अपने प्रथम उपन्यास "शेखर एक जीवनी 'में  प्रसंगवश ,इस तथ्य पर प्रकाश डाला है ,फिर उन्होने "नदी के द्वीप "तथा 'अपने अपने अजनबी 'उपन्यासों में इसे सुनिश्चित दर्शन जैसा रूप दे दिया है। 
        सन्यासी इलाचंद्र जोशी का प्रथम उल्लेखनीय उपन्यास है। इसकी रोचक कथा प्रवाहमयी लेखन शैली द्वारा भली भाँती व्यक्त हुई है। जोशी ने स्पष्ट करना चाहा है कि स्त्री और पुरुष विपरीत लिंग प्राणी होने के कारण परस्पर एक दूसरे के अस्तित्व को उत्कटता से अनुभव करते और आकृष्ट होते हैं। किन्तु साथ ही उनमें अपने पृथक महत्व का बोध रहता है। जोशी का विश्वास है कि मनुष्य का मन ऐसी विभिन्न विरोधी प्रवृत्तियों के संयोजन से गठित है। जोशी ने अपने उपन्यास "पर्दों की रानी "में और नारी के अहम् की पारस्परिक टकराहट के दारुण दुष्परिणाम का चित्र खींचा है। जोशी ने यत्न पूर्वक मनोवैज्ञानिक उपन्यासों की रचना की। उनमें मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के स्पस्टीकरण का विशेष आग्रह है और उनकी कला में उत्तेजना का तत्व प्रमुख है। 
        हिन्दी के प्रमुख मनोवैज्ञानिक उपन्यास -शेखर एक जीवनी ,नदी के द्वीप ,अपने अपने अजनबी ,सुनीता ,त्यागपत्र ,कल्याणी ,सन्यासी ,पर्द  की रानी ,प्रेत और छाया ,पथ की खोज आदि हैं। इन उपन्यासों में मुख्य रूप से यौन मनोविज्ञान पर प्रकाश डाला गया है। मनोवैज्ञानिक उपन्यास मानव जीवन की यदार्थ को समझाने तथा समझने का साहित्यक प्रयास किया है। इन उपन्यासों के द्वारा लेखक ने मानव मन की गहराइयों को झांकने का प्रयास किया है। आधुनिक मनोविज्ञान मानव मन के विभिन्न रूपों को अभिव्यक्ति करने का प्रयास कर रहा है। उपन्यासकारों ने विभिन्न मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को अपने उपन्यासों के द्वारा उपन्यासों में घटित करने का प्रयास आज भी कर रहे हैं। 


सहायक ग्रन्थ 
जैनेन्द्र के विचार - प्रभाकर माचवे 
हिन्दी उपन्यास की प्रवृत्तियाँ - डॉ। शशि भूषण सिंहल 
हिन्दी के मनोवैज्ञानिक उपन्यास  - धनराज मानघाने 



अलूरि कामेश्वरि "कविनि अलूरि"

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