Monday, January 31

असगर वजाहत के उपन्यास साहित्य में चित्रित समाज (विशेष उपन्यासों के संदर्भ में) - डॉ वाजदा इशरत (साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


असगर वजाहत के उपन्यास साहित्य में चित्रित समाज (विशेष उपन्यासों के संदर्भ में)
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डॉ वाजदा इशरत

व्यक्ति और समाज सदैव एक दूसरे पर आश्रित है। व्यक्ति और समाज का अस्तित्व ऐसा घुला मिला रहता है, जैसे समुद्र के पानी में नमक। व्यक्तियों के घुल-मिलकर रहने वाले गुट, समूह अथवा समुदाय को समाज कहा जाता है। मनुष्य को अपने मानवीय अस्तित्व बनाये रखने के लिए दूसरे मनुष्यों के साथ रहने की आवश्यकता होती है। आस-पास के मनुष्यों के साथ परस्पर संबंध बनाये रखना पड़ता है। व्यक्तियों अथवा मनुष्यों के इस पारंपरिक संबंधों के जाल को ‘समाज‘ कहा जाता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैकावर तथा पेज का कथन है- ‘‘समाज चलनो और कार्य विधियों प्रभुत्त और पारस्परिक सहयोग उनके समूहों मानव व्यवहार के नियंत्रणों और स्वच्छंददाताओं की एक व्यवस्था है।‘‘ 1

‘‘समाज पारस्परिक सहयोग का एक विशिष्ट नाम है सहयोग एक सामाजिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के प्रत्येक कार्य में पायी जाती है।‘‘2  समाज स्वयं एक संघ है, एक संगठन है, औपचारिक संबंधों का एक योग है जिसमें सहयोग व्यत्ति परस्पर सम्बद्ध है।‘‘ 

मनुष्य को जीवन यापन करने के लिए समाज एक आवश्यक इकाई है। वह अपने विचार शक्ति को समाज द्वारा समृद्ध बनाता है। साहित्य एवं समाज एक दूसरे के पूरक हैं। साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है। साहित्यकार भी अन्य लोगों की तरह एक सामाजिक प्राणी होता है। वह समाज से अच्छा या बुरा जो भी प्राप्त करता है उसे परिमार्जित कर पुनः समाज को लौटाता है। वह सदैव समाज का मार्गदर्शक बनकर उसे सुधारने एवं विकसित करने के उत्तरदायित्व का निर्वाह करता है। 

साहित्यकार युगीन एवं समकालीन समाज के संदर्भों एवं प्रसंगों से प्रेरित होता है। यही प्रेरणा सम्प्रेषण रूप में अभिव्यक्त होती है और साहित्य कहलाती है। प्राचीन काल से ही समाज का चित्रण साहित्य में होता आ रहा है। वाल्मीकि ‘रामायण‘ में आदर्श समाज की व्यवस्था का चित्रण हुआ है। 

भारत देश ही नहीं पाश्चात्य देशों में भी कला को कला के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए उपयोगी मानकर समाज सुधार की भावना को जागृत किया गया। प्लेटो से लेकर इलियट तक के विद्वानों ने अपने सिद्धांतों एवं चिंतन में कला की परिणति को सौंदर्य आनंद और जन कल्याण में देखा है। 19वीं शताब्दी के विद्वान टेनन ने साहित्य एवं समाज के अंतर्संबंध पर विवेचन करते हुए लिखा है- ‘‘किसी भी युग की संस्कृति अवनति का अध्ययन जाति-धर्म और सामयिक प्रवृत्तियों के समीकृत अध्ययन से ही हो सकता है।‘‘ 3

अतः यह कहा है कि साहित्य और समाज का अटूट संबंध होता है तथा दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। इसलिए दोनों का घनिष्ठ संबंध होता है। दोनों का उद्देश्य और मूल चेतना में सुधारवादी दृष्टिकोण निहित है। सािहत्य, समाज को परिवर्तित करने में समाज के विचार और मान्यताओं के बदलने में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदतत्त करता है। 

असगर वजाहत ने अपने उपन्यासों में मूल रूप से मुस्लिम समाज को आधार बनाया है। अथवा इसी परिवेश के आधार पर समाज को आंकने का प्रयत्न किया है।  इन्होंने भारतीय समाज के पीड़ित, दुःखी, उपेक्षित पात्रों की ओर सहानुभूति पूर्ण विचार किया है। गांव के अभावग्रस्त समाज से लेकर समृद्ध समाज एवं अकेलापन की स्थितियों का सूक्ष्मतम निरूपण किया है और उस पर शोक प्रकट किया है। असगर वजाहत ने मुस्लिम समाज के मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग की समस्याओं को उनकी जीवन शैली को अभिव्यक्त करने की पहल हिन्दी साहित्य में की है। 

मुस्लिम समाज भी अन्य समाज की भांति तीन वर्गों में विभक्त है- उच्च, मध्य और निम्न वर्ग। इन तीनों वर्गों का बखूबी चित्रण असगर वजाहत के साहित्य में किया गया है। आजकल प्रायः यह देखने में आता है कि छोटी-छोटी बातों पर परिवार में कलह होते हैं। परिवार के सदस्य एक दूसरे से असंतुष्ट रहते हैं। असगर वजाहत के उपन्यासों में इसकी झलक हम देख सकते हैं। ‘सात आसमान‘ उपन्यास में लेखक ने पारिवारिक कलह का वर्णन किया है। हुजूर के दो बेटे थे- जत्तन मियाँ और सत्तन मियाँ। हुजूर चाहते थे कि वह मिल-जुलकर रहे किन्तु इनकी यह ख्वाहिश पूरी न हो सकी। जायदाद को लेकर आए दिन दोनों में झगड़े होते थे। इन झगड़ों को देखकर हुजूर ने जायदाद का बँटवारा दो हिस्सों में कर दिया किन्तु कुछ ऐसी चीजें थी जिनका बँटवारा नहीं हो सकता था। ऐसी जायदादों में जानवरों की बाजार एक बहुत बड़ी जायदाद थी। हुजूर के आखिरी वक्त में बाज़ार से अच्छी-खासी आमदनी होने लगी थी। ‘‘आमदनी भी ऐसी जो हर हफ्ते बिल्कुल नकद रकम के तौर पर होती थी।‘‘4  वे दोनों हमेशा कुछ न कुछ बातों पर हमेशा झगड़ा करते थे। असगर वजाहत के उपन्यास ‘पहर दोपहर‘ में भी पारिवारिक कलह को दिखाया गया है। 

असगर वजाहत के उपन्यासों में दुःख का वर्णन बहुत मार्मिकता से किया गया है। उनके उपन्यासों का अध्ययनोपरांत ऐसा लगता है कि मनुष्य जिस सामाजिक बंधनों में बंधा हुआ है उन्हें तोड़कर अलग रहना उसके लिए काफी मुश्किल हो जाता है। परिवार जब फलता-फूलता है तो उस परिवार के सदस्यों में सुख, प्रेम, सौहार्द, सहानुभूति, करूणा, दया आदि भावनाओं का जन्म होता है। लेकिन किसी कारणवश परिवार में जब जब कलह होते हैं तो दुख, ईर्ष्या, क्रोध, विद्रोह, आक्रोश आदि स्थितियां जन्म लेती है। 

असगर वजाहत के उपन्यासों में दुःख के साथ-साथ प्रेम का वर्णन भी किया गया है। इनके साहित्य में प्रेम की अभिव्यक्ति कई संदर्भों में हुई है। ‘‘कैसी आगी लगाई उपन्यास में तीन छात्रों के माध्यम से प्रेम की अभिव्यक्ति की गई है। इस उपन्यास का पात्र अहमद अपने पढ़ाई के दौरान ही प्रेम की बंधनों में फंसता जाता है। वह हमेशा परेशान रहता है।‘‘ बहु विवाह प्रथा का वर्णन भी असगर वजाहत के उपन्याासों में किया गया है। यह प्रथा अधिकतर मुस्लिम समाज में देखने को मिलती है। मुस्लिम समाज में एक पुरूष एक से अधिक विवाह कर सकता है किन्तु इसके लिए कुछ शर्तें हैं जिन्हें मानना अनिवार्य है। एक मुस्लिम व्यक्ति एक से अधिक पत्नियाँ तभी रख सकता है जबवह सभी पत्नियों के साथ एक जैसा बर्ताव करने में सक्षम हो। असगर वजाहत के उपन्यास ‘बरखा रचाई‘ में भी बहु विवाह का अच्छा चित्रण किया गया है। 

मनुष्य की कुछ इच्छाएं पूरी होती हैं तो कुछ सपने टूटकर चूर-चूर होते हैं। सामाजिक अन्याय या फिर कोई गलत काम हो जाने पर एक अंतर्द्वंद्व या अपराध बोध जन्म लेता है जो मनुष्य को न जीने देता है न ही मरने देता है। बल्कि पीप से भरे फोड़े की तरह यह रिसता रहता है। इसी प्रकार के अपराध बोध का वर्णन बहुत जगह पर इनके उपन्यासों में पाया जाता है। 

पर्दा प्रथा को मानना मुस्लिम समाज में किस प्रकार आवश्यक है इसका वर्णन भी असगर वजाहत के उपन्यासों में किया गया है। ‘सात आसमान‘ में अधिकतर जमींदार तथा उनके विलासी जीवन का चित्रण किया गया है। पूरा उपन्यास जमींदारों के विलासपूर्ण जीवन से भरा पड़ा है। 

‘‘घर की औरतें यासीन मियाँ से उसी तरह पर्दा करती थी जैसे दूसरों से। जब यासीन मियाँ की बीवी जिंदा थी तो वह घर में अंदर जाती आती थी लेकिन यासीन मियाँ को अंदर जाने की इजाजत न थी।‘‘5 

आज भारतीय समाज में नारी की स्थिति दृढ़ नहीं है। आज भी समाज पुरूष प्रधान ही है। समाज में नारी के अलग व्यक्तित्व की स्थापना नहीं हो पाई है। अवैध संबंधों के कारण नारी की परिस्थिति और भी चिंतनीय हो गई है। ‘सात आसमान‘ में उपन्यासकार ने यह बहुत जगहों पर दर्शाया है कि किस प्रकार अधिकतर जमींदारों का अनेक स्त्रियों से संबंध रहता है। ‘‘सत्ती अगर खूबसूरत थी तो जत्तन मियाँ की बेगम, नवाब लताफत यार जंग की बेटी, जहाँआरा बेगम जो बड़ी बहू कहलाती थी, कम खूबसूरत न थी। लेकिन मुश्ताक के कहने के मुताबिक जत्तन मियाँ ने बड़ी बहू को सिर्फ अच्छे खानदान और नस्ल की औलादें पैदा करने के लिए रख छोड़ा था। बाकी दूसरे कामों के लिए सत्ती थी।‘‘6 

असगर वजाहत के उपन्यासों में जातिगत भेदभाव का वर्णन हमें जगह-जगह पर देखने को मिलता है। जिनमें भी दो तरह की स्थितियाँ हैं एक स्थिति वह है जिसमें मुस्लिम व्यक्ति दलित हिन्दू जाति के व्यक्ति से जातिगत भेदभाव का बर्ताव करता है दूसरी स्थिति के अनुसार एक उच्च जाति के मुसलमान व्यक्ति से अपने निचली जाति के मुसलमान व्यक्ति से भेदभाव का व्यवहार करता है। अतः इन दोनों स्तरों पर जातिगत अंतर का पता चलता है और यह सिद्ध होता है कि भारतीय मुसलमान भी जाति प्रथा से बुरी तरह ग्रस्त है। 

बेमेल विवाह किसी भी समाज के लिए एक अभिशाप माना जाता है। विवेच्य उपन्यास में आर्थिक मजबूरी के कारण हुए अनमेल विवाह तथा उसके परिणामों को स्थापित किया गया है। ‘‘स्कूल में टीचरें हमें देखने आती थी हंसती थी कि देखो इतनी छोटी लड़की की शादी हो रही है। हम डरकर भाग जाते थे ........ फील्ड में बैठ जाते थे टीचरें कहती थी कैसे जाहिल माँ बाप है। हमें ये अच्छा नहीं लगता था।‘‘ 7

इस प्रकार हम देखते हैं कि अशिक्षित वर्ग में यह रोग ज्यादा दिखाई देता है। 

असगर वजाहत के उपन्यासों में शोषण के विरूद्ध संघर्ष की चेतना को भी दिखाया गया है। ‘बरखा रचाई‘उपन्यास में शोषण का अच्छा चित्रण किया गया है। पारिवारिक संबंधों में विघटन, गरीबी आदि मुद्दों पर भी प्रकाश डाला गया है। आर्थिक विपन्नता कई समस्याओं को जन्म देती है। इस यथार्थ को गहरे स्तर पर पकड़ने का प्रयास इन उपन्यासों में किया गया है। एक तरह से ये उपन्यास निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार के आर्थिक पतन का इतिहास भी है। 

अतः इन सभी पहलुओं को देखकर कहा जा सकता है कि असगर वजाहत के विवेच्य उपन्यासों में भारतीय मुसलमानों की आशा और आकांक्षाओं का दुःख एवं पीड़ा का तनाव एवं अंतर्द्वंद्व का सफलता एवं असफलताओं का, अशिक्षा एव अंधविश्वासों का, सामाजिक विसंगतियों का, उनमें उत्पन्न हो रही सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक चेतना का यथार्थपरक चित्रण हुआ है। 


संदर्भ सूची

[1] Society is a system of usages and procedures of authority and mutual aid of many grouping and divisions of controls of human behavior and of liberties society, Pg. 5, Maclvered Page.

[2]  Mutual aid is a special for co-operation society - Bogardus, Pg. 351

[3]  राही मासूम रज़ा के उपन्यासाों का समाजशास्त्रीय अध्ययन - मो. फकुरीद्दीन, प्रथम संस्करण, पृ.सं. 75 

 [4] सात आसमान - असगर वजाहत, पृ.सं. 76

 [5] सात आसमान - असगर वजाहत, पृ.सं. 28 

 [6] सात आसमान - असगर वजाहत, पृ.सं. 77

 [7] बरखा रचाई - असगर वजाहत, पृ.सं. 166 



डॉ वाजदा इशरत

दूरस्थ शिक्षा निदेशालय
मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी
गच्ची बौली
हैदराबाद - 500 032
94419 53360

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