Monday, January 31

अंतिम दो दशक की कहानियों में आर्थिक यथार्थवाद - एन. मधुसूदन राव (साहित्य मंथन)

 साहित्य मंथन


 अंतिम दो दशक की कहानियों में आर्थिक यथार्थवाद
-

एनमधुसूदन राव


    

मानव जीवन मेंअर्थका महत्वपूर्ण स्थान है। व्यक्ति की हैसियत उसके आर्थिक प्क्ष को लेकर ही आंकी जाती है। प्राचीन काल में आर्थिक दृष्टि से दो ही वर्ग जैसे अमीर और गरीब रहते थे। लेकिन देश की स्वतंत्रता के बाद नया वर्ग अस्तित्व में आया है। वह है-मध्य वर्ग। अर्थात स्वत्रतंता के पश्चात् अमीर, गरीब और मध्यव वर्ग के रूप में समाज को बाँटा गया है। इसी प्रकार नब्बे के दशक के बाद प्रौद्योगिकी के विकास से निम्न मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग भी अस्तित्व में आए हैं। आज के युग में ये दोनों वर्ग अधिकांश रूप से उपभोगवादी संस्कृति से प्रभावित होकर सामाजिक गतिविधियों को शासित कर रहे हैं। आधुनिक संदर्भों में मानव जीवन पर अर्थ के प्रभावों परमाधवी जादवने इस प्रकार अपने विचार व्यक्त किए हैं-"आधुनिक युग में अर्थ को सहज ही सर्वोपरि स्थान प्राप्त हो गया है। आज अर्थ ही जीवन की धुरी बन गयी है। अभी मूल्यही मनुष्य को उच्च पदस्थ तथा अपरदस्थ बना रहा है।"1

इस प्रकार के आर्थिक प्रभावों के फलस्वरूप मानव जीवन के विभिन्न पक्ष जैसे पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आदि परिवर्तित होना ही नहीं, अपितु मानव मूल्य जैसे मानवीय संवेदना, प्रेम, दया, आत्मीयता, परोपकार, दान-दक्षिणा आदि समाप्त हो रहे हैं। नई तकनीकियों के कारण शिक्षित लोग आर्थिक समुन्नति के लिए गाँवों अपने जन्म स्थान को छोड़कर शहर, नगर अन्यराज्य देशों की ओर प्रवास कर रहे हैं। इसके कारण परंपरागत पेशे लुप्तप्राय हो गए हैं। लोगों का ध्यान केवल अर्थ कमाने की ओर केंद्रित हो गया है। अर्थ कमाने के लिए गलत मार्ग को अपनाने से भी झिझक नहीं रहे हैं। परिणाम स्वरूप आर्थिक भ्रष्टाचार दिन--दिन बढ़ता जा रहा है। आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त इन सभी समस्याओं का चित्रण अंतिम दो दशक की हिंदी कहानीकारों ने अपनी कहानियों में चित्रित किया है। उनके द्वारा चित्रित एक समस्या का अध्ययन निम्न प्रकार किया जा रहा है-


बेरोजगारी

वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी के विकास से विश्व के देशों को सुविधाजनक जीवन प्रदान हो रहा है। आर्थिक रूप से व्यापार आदि क्षेत्रों के विस्तार के द्वारा विश्व के देश एक दूसरे के नजदीक रहे हैं। लेकिन जितने लाभ विज्ञान और तकनीकी के कारण हो रहे हैं, उतनी ही हानियों को भी लोगों को विशेषतया भारत जैसे विकासशील देशों को झेलना पड़ रहा है। कम्पयूटर जैसे साधनों के आविष्कार के बाद दस लोगों के द्वारा किए जानेवाले काम एक ही व्यक्ति संभाल पा रहा है, जिसके कारण नौकरी के क्षेत्र में बेरोजगारी की समस्या बढ़ती जा रही है। कम्प्यूटर और तकनीकी आविष्कारों के कारण अनेक निजी संस्थाएँ अस्तित्व में आई हैं। निजी संस्थाओं में सरकारी नौकरियों की तरह स्थाई के तौर पर नियुक्ति नहीं की जाती हैं। कई साल एक जगह पर नौकरी करनेवाले को अधिक वेतन देना पड़ता है। ऐसे में उन्हें किसी--किसी बहाने नौकरी से हटाया जाता है और नये व्यक्ति को नियुक्त करते हैं। इसके अतिरिक्त काम भी अधिक लिया जाता है। कंपनियों में पढ़े-लिखे रहने से कोई फायदा नहीं है। उनसे स्किल्स की अपेक्षा ज्यादा की जाती है। इसलिए आज के युवा वर्ग को स्किल्स के अभाव में बेरोजगारी का शिकार होना पड़ रहा है। इस प्रकार विज्ञान और तकनीकी में हुए इजाफे के कारण भी आधुनिक समाज में अनेक समस्याएँ पनप रही हैं।

एक बेरोजगार व्यक्ति जीवन को सुचारू रूप् से चला नहीं पाता है। घोर गरीबी में उसको जीना पड़ता है। दिन गुजारना उनके लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। हर दिन जीवन के लिए आवश्यक वस्तु जुटाना उनके लिए कठिन होता है। ऐसी दुर्भाग्य स्थिति में जीनेवालों की विडंबनात्मक जीवन का चित्रण 'ममता कालिया' ने 'वसंत सिर्फ एक तारीख' कहानी में किया है। इस कहानी की 'मैं' अपनी आजीविका चलाने के लिए लेखन कार्य करती है। आर्थिक अभाव में जीवन का प्रति पल उसके लिए समस्यात्मक बनकर सामने आता है। उसके लिए दिन गुजारना अचंभा और खुशी का कारण बनता है। आर्थिक अभाव और बेरोजगारी से उत्पन्न समस्या की गंभीरता का चित्रण लेखिका ने इस प्रकार किया है-"हर महीना जब बीत जाता, हमें हल्का अचंभा और गहरी खुशी हेती कि हम भूख महंगाई, बीमारी और दुर्घटनाओं को चकमा देते हुए एक और महीना जिंदा रह लिये।"2

आधुनिक समाज में बेरोजगारी एक गंभीर समस्या बन गई है। पढ़-लिखकर डिग्री हासिल करने के बावजूद भी उचित नौकरी मिलने के कारण पूरे परिवार को आर्थिक संकट एवं विपन्नता की स्थिति में जीना पड़ रहा है। नौकरी पाने के लिए आधुनिक पीढ़ी अनेक हथकंडों को अपना रही है। उनमें से एक रिश्वत है। रिश्वत देकर नौकरी पाने की लालसा में पूरी संपत्ति को बेच डालने की नौबत आती हैं इस प्रकार नौकरी के लालच में पूरी संपत्ति को बेचनेवाले बेरोजगार का चित्रण मिथिलेश्वर ने 'जमुनी' कहानी में किया है। इस कहानी का आलोकनाथ नौकरी के लिए दलाल के पास पहुँच जाता है तथा दलाल उससे पंद्रह हजार रुप्ये की मांग करता है। किसान परिवार का आलोकनाथ रिश्वत देने के लिए अपनी संपत्ति को गिरवी रखने का जोखिम उठाता है। नौकरी पाने के लिए रिश्वत के रूप में दलाल के द्वारा पूछे गए पंद्रह हजार रुपयों के इंतजाम के लिए घर गिरवी रखने का निर्णय लेनेवाले बेरोजगार का चित्रण मिथिलेश्वर ने इस प्रकार किया है-"पंद्रह हजार का इंतजाम भी आलोकचनाथ जैसा किसान परिवार कहाँ से करे? इतनी बड़ी राशि गाँव में उधार पैसा देने के लिए भी कोई तैयार नहीं होता है। अंततः उसके यहाँ यह निर्णय होता है कि गोयंड के पास का एक बीघा खेत रेहन कर दिया जाए। नौकरी पाने के बाद पैसे चुकाकर रेहन छुड़ा लेगा आलोकनाथ।"3

गोविंद मिश्र की कहानीहमदर्दीबेकार युवा की स्थिति का चित्रण करती हैं यह कहानी समाज के सामने एक प्रश्न खड़ा करती है। कहानी में बेरोजगार युवक कहता है-"अपने पैरों पर खड़े होने की सुविधा चाहिए... दे सकते हो क्या?"4 इस तरह गिरिराज किशोर की 'वल्द रोजी' में 'विकास', मालती जोशी की 'सार्थक दिन' में 'दिलीप', ममता कालिया की 'उसका यौवन' में 'मैं', ये सभी पात्र समाज में बेरोजगारी की समस्या का सजीव उदाहरण हैं। समाज में बेरोजगारी की समस्या में फंसे हुए युवा वर्ग का सजीव चित्रण इन कहानियों में देखा जा सकता है। अंतिम दो दशक के कहानीकारों ने अपनी कहानियों में आर्थिक यथार्थवाद को विश्लेषित करते हुए प्रमुख रूप से बेरोजगारी की समस्या पर अपनी लेखनी चलाई है और वास्तविकता का बोध कराने में वे सफल भी हुए हैं।

 

संदर्भ :

1.मन्नू भंडारी के साहित्य में चित्रित समस्याएँ

2.वसंत सिर्फ एक तारीख, ममता कालिया, पृ. 211

3.जमुनी, मिथिलेश्वर, पृ. 58

4.हमदर्दी, गोविंद मिश्र, पृ. 76

 

संदर्भ ग्रंथ :

1.मन्नू भंडारी के साहित्य में चित्रित समस्याएँ

2.वसंत सिर्फ एक तारीख, ममता कालिया

3.जमुनी, मिथिलेश्वर



एन. मधुसूदन राव
अध्यापक
शोधार्थी, पार्ट टाइम
उस्मानिया विश्वविद्यालय

पता :

भद्राचलम पोस्ट

जिला भद्राद्री,

तेलंगाणा- 507 111

99499 39859


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