साहित्य मंथन
डॉ. संगीता कुमारी तिवारी (पांडेय)
संसार में गुरु महिमा को विशेष सम्मान दिया गया है। सनातन धर्म में वेदों की रचना की गई है जिसमें गुरुदेव को साक्षात परब्रह्म कहकर उनकी वंदना की गई है। व्यावहारिक रूप में गुरु की परब्रह्म परमात्मा के रूप में उपासना की कमी हो गई है। प्राचीन संतो ने उपासना पद्धति का प्रचलन किया उसमें गुरु भक्ति को मुख्य भक्ति माना। गुरु भक्ति के अंतर्गत गुरु से प्रीति, गुरु के दर्शन, गुरु का वंदन, गुरु का पूजन, समर्पण, चरणामृत, प्रसाद, आशीर्वाद प्रधान है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य श्री राम चरित्र मानस में गुरु जी की महिमा का वर्णन किया है। इस महाकाव्य के प्रारंभ में उन्होंने प्रथम पूज्य गणेश जी, विष्णु जी, पार्वती जी, शंकर जी और गुरु को प्रणाम करते हुए गुरु महिमा का विस्तृत रूप से वर्णन किया है। रामचरित्र मानस में उन्होंने गुरु महिमा का गान करते हुए तमाम अलंकार उपमा , विश्लेषण के साथ प्रस्तुत किया है। गुरु महिमा एवं उनके तेज़ को बड़े ही मनोहर ढंग से उन्होंने समाज के समक्ष एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया है। गुरु महिमा एवं उसकी भव्यता उनके प्रताप के बारे दिव्य ज्ञान है जो कलियुग में एक अनुकरणीय व्यवस्था है। जिस पर चलने के लिए हमें प्रेरित करती है व सीख देती है कि हम गुरु का सम्मान करें उनके आदेशों को माने और अपना जीवन सफल बनाएं। परमपिता परमात्मा की हमारे ऊपर अनुकंपा, गुरु कृपा के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है।
रामचरित्र मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने गुरु को साक्षात श्री हरि के नर रूप, की संज्ञा दी है। जिनके वचन, महा मोह रूपी घने अंधकार को नाश करने हेतु सूर्य किरणों के समाहार है। राम चरित्र मानस के बालकांड में उन्होंने गुरु महिमा का गान बड़े ही मनोरम ढंग से प्रस्तुत किया है।
बंदऊ गुरु पद पदुम परागा।
सुरूचि सुबास सरस अनुरागा।।
अमिय मूरिमय चूरन चारू।
समन सकल भव रुज परिवारू।।
गोस्वामी जी ने गुरु चरण कमलों के रज(धूलि) को सुरुचि,सुगंध,तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण ,संजीवनी जड़ी का चूर्ण जो संपूर्ण भवरोगों के मूल को नष्ट करने वाला माना है। उसी रज को परमपिता, परमेश्वर शिव जी विभूति समान,अपने तन पर सुशोभित करते हैं।भक्तों के मनरूपी दर्पण के मैल को,माथे पर तिलक करने के द्वारा ही मिटाया जा सकता है।
गुरु चरण कमल रज की महिमा ही नहीं अपितु पदों के नाखूनों को भी उन्होंने ज्योति,मणियों के प्रकाश के समान माना है। जिसके स्मरण मात्र से ही ह्रदय में दिव्य तेज़ उत्पन्न हो जाता है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर, शिष्यों के भाग्य जगाने की क्षमता रखता है। उसके हृदय में आते ही हृदय के निर्मल नेत्रों को खोल कर संसार रूपी रात्रि के दोष एवं दुख मिटा सकते हैं। यह ऐसे माणिक्य हैं जो गुप्त या प्रगट जहां जो जिस खान में है, सब दृश्य मान हो जाते हैं। इसी सिद्ध अंजन को नेत्रों में लगाकर साधक ,पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अंदर कौतुक से ही बहुत सी खानों के दर्शन कर पाते हैं।
श्री गुरु चरणों की रज, कोमल और सुंदर नयनामृत अंजन है जो विवेक रूपी नेत्रों को निर्मल करके संसार रूपी बंधन से मुक्त करने का औचित्य प्रदान करते है। गुरु व संतों का चरित्र कपास की जीवन के समान शुद्ध एवं शुभ होता है, जिसका फल नीरस,विशद एवं गुणमय होता है। गुरु में विषयाशक्ति नहीं होती हैं। गुरु सद्गुणों की खान, अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाने में सामर्थ्य वान होते हैं। जैसे कपास का धागा सुई के किए हुए छेद को अपना तन देकर ढकता है, अथवा कपास लोड़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर वस्त्र के रूप में परिणत होकर मनुष्य के गोपनीय स्थानों को ढकता है, उसी प्रकार गुरु स्वयं दुख सह कर शिष्यों के दोषों को ढकते हैं। जिसके कारण गुरु ने, संसार में वंदनीय एवं पूजनीय स्थान प्राप्त किया है।
श्री राम चरित्र मानस में, तुलसीदास जी ने उच्च कोटि के गुरु वह संतों का उल्लेख
किया है। जैसे वाल्मीकि, याज्ञवल्क्य,भरद्वाज, विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम, जमादाग्नि, कश्यप, अत्रि आदि। इन्हीं में से सात महान
ऋषि यों को सप्तर्षि की संज्ञा दी गई है। क्योंकि वह व्यक्ति विशिष्ट है जिन्होंने अपनी विलक्षण एकाग्रता के बल पर गहन ध्यान में विलक्षण शब्दों के दर्शन किए हैं। उनके गूढ़ अर्थों को जाना, वह मानव अथवा प्राणी मात्र के कल्याण के लिए ध्यान में देखें गए शब्दों को लिखकर प्रकट किया। अर्थात ऋषि तो मंत्र को देखने वाले हैं ना कि बनाने वाले। बनाने वाला तो केवल एक परमात्मा ही है।
"श्रद्धा वान लभते ज्ञानम् "
गुरु के प्रति श्रद्धा होगी तो ही वह ज्ञानी बन पाता है। हमारे देश के वांग्मय में गुरु को इस भौतिक संसार और परमात्म तत्व के बीच की कड़ी या सेतु कहा गया है। विधि के विधान अनुसार इस विश्व में मानव, जन्म भले ही, माता-पिता से पाता है, परंतु उसका जीवन, गुरु कृपा से ही सार्थक हो पाता है। गुरु के सम्मुख हमें कोई भेद नहीं छिपाना चाहिए। इस कथन को मानस के बालकांड में निम्न दोहे के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं:
संत कहहिं असि नीति प्रभु,श्रुतिपुरान मुनि गाव ।
होत न विमल विवेक उर,गुरू सन किए दुराव ।।
संतो, वेद पुराण, एवं मुनि जनों का कथन है कि गुरु के साथ छिपाव करने से ह्रदय में निर्मल ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती।
बालकांड में ही शिव पार्वती संवाद के द्वारा गुरु वचनों की शक्ति का प्रतिपाद्य किया गया है;
गुरु के वचन प्रतीक न जेहिं ।
सपनेहुं सुगम न सुख सिधि तेहिं ।।
कई उदाहरण बताते हैं कि आध्यात्मिक संबंध की वास्तविकता व समर्पण भाव से ,गुरु के निर्देशों का परिपालन करने वालों को, जी भर कर गुरु के अनुदान मिले हैं। श्रद्धा की परिपक्वता, समर्पण की पूर्णता, शिष्य में अनंत संभावनाओं के द्वार खोल देती है। उसके सामने ,देहधारी गुरु की अंतः चेतना की, जितनी भी रहस्यमयी परते होती हैं , सब की सब एक-एक करके खुलने लगती हैं।
रामचरित्र मानस की नहीं अपितु "महाभारत के शांति पर्व " के ३२६/२२/२३ में भी भवसागर के कर्णधार को ही, गुरु माना गया है।
न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्ष स्याधिगमो भवेत् ।
न विना गुरू सम्बंध ज्ञान स्याधिगमःस्मृतः।।
गुरूः प्लावयिता सत्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते।
विज्ञान कृत्कृत्यस्तु जीर्ण स्तदुभयं त्यजेत्।।
जैसे ज्ञान विज्ञान के बिना मोक्ष नहीं हो सकता, उसी प्रकार सद्गुरु से संबंध हुए बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरु इस संसार सागर से पार उतारने वाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान नौका के समान बताया गया है। मनुष्य उस ज्ञान को पाकर भवसागर से पार होकर कृतकृत्य हो जाता है फिर उसे नौका और नाविक दोनों की अपेक्षा नहीं रहती।
गुरु एक तेज़ है जिनके हमारे जीवन में आते ही ,सारे संशय के अंधकार समाप्त हो जाते हैं। गुरु वो मृदंग है जिसके बजते ही , अनाहद नाद सुनने शुरू हो जाते हैं। गुरु वो दीक्षा है, जो सही मायने में मिलती है तो, भवसागर से पार हो जाते हैं। गुरु वह अमृत है, जिसे पीकर कोई भी प्यासा नहीं रहता। गुरु वो कृपा है ,जो केवल कुछ ही शिष्य को विशेष रूप से प्राप्त होती है, तो कुछ पाकर भी अनभिज्ञ रहते हैं। गुरु प्रसाद है, जिसके भाग्य में आ जाए, तो उसे कुछ मांगने की जरूरत नहीं पड़ती।
रामचरित्र मानस में शिव पार्वती संवाद के माध्यम से गुरु के वचनों की शक्ति बताते हुए तुलसीदास जी ने कहा जिसे गुरु के वचनों में विश्वास नहीं होता उसको सुख और सिद्धि स्वप्न में भी प्राप्त नहीं होती है।
गोस्वामी तुलसीदास जी अयोध्या कांड का प्रारंभ भी गुरु चरण सरोज की वंदना दोहे से ही करते हैं:
श्री गुरु चरण सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरन ऊं रघुवर बिमल जसु जो दायक फल चारि ।
अयोध्या कांड के प्रारंभ में गुरु वंदना करते हुए गोस्वामी जी कहते हैं:
जे गुरु चरण रेनु सिर धरहीं ।
ये जनु सकल विभव बस करहीं ।
मोहि हम यह अनुभय उ न दूजें ।
सबु पायऊं रज पावनि पूजें।।
जो लोग गुरु के चरणों की रज को अपने मस्तक पर धारण करते हैं ,वे मानो समस्त वैभव एवं ऐश्वर्य के स्वामी बन जाते हैं इसका वे स्व।नुभव बताते हैं। उनका कथन है कि, पवित्र चरण धूलि का पूजन कर मैंने सर्वस्व पा लिया है।
अयोध्या कांड में ही ,भगवान राम और सीता के संवाद के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी एक दोहे में कहते हैं:
सहज सुहृद गुरु स्वामी सिख जो न करें सिर मानि ।
सो पछिताई अघाइ उर अवसि होई हित हानि ।।
स्वाभाविक है हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता ,वह हृदय में पछताता है और उसका अहित होना निश्चय है
श्री रामचरितमानस के उत्तरकांड में काकभुशुंडि जी के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी एक चौपाई में कहते हैं:
गुरु बिन भव निधि तरहिं न कोई ।
जौं विरंचि संकर सम होई ।।
ब्रह्मा जी, भले ही भगवान शंकर जी तुल्य हो, बिना गुरु ज्ञान के भवरू पी सागर को पार नहीं किया जा सकता।
गुरु को सब देवों में महान एवं श्रेष्ठ कहा गया है इसीलिए गुरु वंदना के लिए एक श्लोक प्रचलित है जिसे जन-जन मंत्रमुग्ध होकर गाते एवं स्वीकारते हैं।यह हमें मानना ही होगा।
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर:
गुरुर साक्षात परम ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः
ॐ श्री गुरुवे नमः
हिन्दी शिक्षिका
SA Hindi
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