Monday, January 31

मीडिया और भूमंडलीकरण - डॉ. दुर्गेश नन्दिनी (साहित्य मंथन)

साहित्य मंथन


मीडिया और भूमंडलीकरण

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डॉ. दुर्गेश नन्दिनी

    

        वर्तमान प्रौद्योगिकी युग में मीडिया एक सशक्त माध्यम के रूप में अपनी जगह बना चुका है। उसमें भी न्यू मीडिया अर्थात् वेब मीडिया लोगों के बीच अधिक लोकप्रिय होता जा रहा है। ग्लोबल-विलेज की कल्पना का आधार इंटरनेट ही था। भूमंडलीकरण के इस दौर में मीडिया का दायरा विस्तृत हो चुका है। इसका कारण है, इसकी सरलता व सुगमता। ऐसे में मीडिया को विभिन्न भाषाओं के विकास का एक सशक्त माध्यम के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। हिन्दी भी इससे अछूती नहीं है। भारत जैसे देश में हिन्दी के प्रचार व प्रसार में मीडिया के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।

      आज के युग की सबसे बड़ी सच्चाई वैश्वीकरण है। इसी तरह वैश्विक मीडिया की पहुँच को नकारा नहीं जा सकता है। आज इंटरनेट वैश्विक मीडिया की पहुँच को आसान कर दिया है। मीडिया बाजार और विज्ञापन तीनों का अन्योन्याश्रय संबंध है। हिन्दी मीडिया भी वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप उभरे बाजार का भरपूर फायदा ले रहा है।

      भूमंडलीकरण के कारण जनसंचार माध्यमों का दायरा विस्तृत हो गया है। आज का अंतरजाल का युग है, नवइलक्टोनिक माध्यमों से अंतरजाल/इंटरनेट आज अधिकांश जनसमुदाय द्वारा बोली एवं उपयोग में लाई जाने वाली हिन्दी भाषा को अनेक लोगों तक पहुँचाने का कार्य कर रहा है। भारतीय मीडिया चाहे वह इलक्ट्रोनिक मीडिया हो अथवा प्रिंट मीडिया, दोनों का ही सैद्धांतिक स्वरूप राष्ट्रीय समता, अखंडता और संप्रभुता बनाए रखने के उद्देश्य के साथ-साथ देश की जनता में सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अनुकूल और प्रेरक सोंच पैदा करने के उद्देश्य से गढ़ा गया है। आज पूरी दुनिया में मीडिया का मायाजाल है। सभी जीवित मनुष्य किसी न किसी प्रकार उससे जुड़े हुए हैं। मीडिया का क्षेत्र दूर तक फैल चुका है। यह अपने माध्यमों के साथ समाज में सूचना, शिक्षा, मनोरंजन प्रदान करता है। मीडिया का मुख्य कार्य समाज को दुनिया की महत्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी देना व उसके सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों से लोगों को अवगत कराना। मीडिया समाज का मार्गदर्शक होता है, विचारों का आदान प्रदान करके स्वस्थ जनमत तैयार करता है। यह जनसंपर्क का बहुत सफल माध्यम है।

      भूमंडलीकरण एक ऐसा जादू है, जिसके प्रभाव से बचपाना बहुत मुश्किल है। इसके जादू का रक़बा इतना अधिक है कि इसके बाहर दुनिया का वजूद ही नजर नहीं आता, यही कारण है कि सूचना क्रांति के इस युग में कोई भी राष्ट्र या समाज भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से अलग नहीं दिखता है। भूमंडलीकरण जिसे वैश्वीकरण भी कहा जाता है यह नवउदारवादी विचारधारा की दिमागी उपज है। पिछले तीन दशकों में मानव विकास की दिशा व दशा में परिवर्तन आये हैं। नवउदारवादी विचारधारा आज विश्व राजनीति के केंद्र में है। इसका आधार एक उपभोक्ता समाज और विश्व को एक बाजार में तबदील करना है एक ऐसे समाज का निर्माण है जिस पर व्यापार का प्रभुत्व हो। इस तरह की व्यवस्था कायम करने में मीडिया की केंद्रिया भूमिका है। अस्सी-नब्बे दशकी की कुछ घटनाओं ने राजनीतिक, आर्थिक और सूचना संचार की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं को एक तरह से फिर से परिभाषित कर दिया है जिससे विश्व राजनीति में परिवर्तन आए। इसी दशक में सूचना क्रांति ने भी बेमिसाल ऊँचाइयाँ हासिल की। वही से भूमंडलीकरण ने सर उठाया और दोबारा कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। भूमंडलीकरण से एक नए व्यापारिक मूल्यों और नयी उपभोक्ता संस्कृति का उदय हुआ, इन सबका जबरदस्त प्रभाव जनसंचार माध्यमों पर भी पड़ा। जनसंचार माध्यम काफी हद तक इस प्रक्रिया का हिस्सा बन गए और राजनीतिक व व्यापारिक हितों के अधिन होते चले गए। व्यापारिकरण की यह प्रक्रिया आज अपने चरम पर है, भले ही विभिन्न देशों और विभिन्न समाजों में इसका रूप स्वरूप कितना ही भिन्न क्यों न हो। इलेक्ट्रोनिक मीडिया के सफर पर नज़र डाले तो पता चलता है कि वह कितना आकर्षित कर रहा है।

      हिन्दी के लिए विश्व भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए उसका सदा सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़ा रहना आवश्यक है। हिन्दी भाषा को भूमंडलीकरण के सामान्य परिवेश में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को ध्यान में रखकर विकास पथ पर इस प्रकार आगे बढ़ाना है कि उसकी संस्कृति भी सुरक्षित रहे तथा बाजारवाद की दौड़ में हर प्रकार की चुनौतियों का सामना हिन्दी करने में सक्षम रहे। वर्तमान में इंटरनेट विकास का मुख्य आधार है। इसके माध्यम से अपने लक्ष्य को सरलता से एवं कम खर्च में प्राप्त किया जा सकता है। हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रचार-प्रसार में भी इसका समुचित उपयोग किया जा रहा है। जिससे हिन्दी का क्षेत्र न केवल विस्तृत हुआ अपितु यहाँ तक पहुँचकर आसान हुई है। दिनोंदिन हिन्दी पाठकों की संख्या में भारी वृद्धि होती गई है, न केवल देश, बल्कि विदेशों में भी हिन्दी के प्रति पाठकों का रुझान बढ़ता गया। हिन्दी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है।

      सोशल मीडिया द्वारा हिन्दी भाषा का ही नहीं बल्कि साहित्य का भी व्यापक विस्तार एवं प्रसार हुआ है। केवल प्राचीन कवियों सूरदास, तुलसीदास, कबीर, रहीम का साहित्य ही नहीं अपितु नए उभरते साहित्यकारों की प्रतिभा चाहे उसकी रचना भारत में हो या कहीं विदेशी पृष्ठभूमि पर बसे हिन्दुस्तानी द्वारा रचा जाए। उस साहित्य को सोशल मीडिया के रूप में एक मंच प्राप्त हुआ है।

      दुनिया भर में चौबिसों घंटों प्रसारित होने वाले हिन्दी चैनलों की लोकप्रियता भी कुछ कम नहीं है। आज के अंतरजाल के युग में हिन्दी के पोर्टल वन साइट्स उपलब्ध है, जिसके माध्यम से ज्ञान की नई दिशा खुली है। ई-पत्रिकाओं द्वारा कई हिन्दी साहित्य और भाषा से जुड़े नए उभरते कलाकारों की भी दुनिया के कोने-कोने में पहुँच पाई है। हिन्दी भाषा को विश्वपटल पर विस्तृत रूप प्रदान करने में लोकप्रियता के प्रसार में सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण व सर्वश्रेष्ठ प्लेटफार्म मंच है। जहाँ व्यक्ति अपनी प्रतिभा को अथवा अपने किसी भी उत्पाद को अत्यंत लोकप्रिय बना सकता है। सोशल मीडिया द्वारा कई विकासात्मक एवं सकारात्मक कार्य हुए हैं जिनसे कि लोकतंत्र को समृद्ध बनाने का प्रयत्न किया गया, देश की अखंडता, एकता, धर्मनिरपेक्षता को अक्षुण्ण बनाए रखने का प्रयत्न किया है।

      सोशल मीडिया ने आज हिन्दी भाषा के आकाश के विस्तार को बढ़ाया है। आज हिन्दी ही ब्लॉग लेखन का सशक्त माध्यम बन चुकी है। जितनी भाषाई विविधता हिन्दी के ब्लॉगों में होती है उतनी विश्व की किसी भाषा के ब्लॉग में नहीं पाई जाती। कई शुद्ध साहित्यिक ब्लॉग हैं जिनमें कहानी, कविताएँ, एकाँकी आदि प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यूनिकोड के अवतरण ने हिन्दी एवं अन्य भाषाओं को ब्लॉगिंग में सक्रिय बनने में योगदान दिया।

      जनसंचार माध्यम के द्वारा व्यक्ति के साथ बहुत बड़ी जनसंख्या के साथ संचार संबंध स्थापित करने में सहायक होते हैं। इसमें समाचार पत्र से लेकर इंटरनेट तक सभी उपकरणों के साथ संबंध स्थापित करता है। सोशल मीडिया, फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर आदि ने भी हिन्दी को हाथों हाथ लिया है।

      रोबिन मनसैल के अनुसार इंटरनेट पर मौजूद सामग्री को मूलतः दो कोटियों में बाँटा जा सकता है। प्रथम कोटि उत्सवधर्मी साहित्य सामग्री की है, जो इंटरनेट को महामंडित करती है। दूसरी कोटि में वह साहित्य है जो पलायनवादी है। दूसरी कोटि के लोग इंटरनेट की किसी भी किस्म में सकारात्मकता नहीं देखते। दोनों कोटियाँ खूब फल-फूल रही हैं। आज लाखों की संख्या में उपलब्ध हिन्दी वेबपेजों की संख्या निरंतर तीव्र वृद्धि  हो रही है। 20 प्रतिशत से अधिक उपभोक्ता हिन्दी इंटरनेट सर्फिंग को पसंद करते हैं।

      इंटरनेट एवं वेब मीडिया हमें इन जटिलताओं से ऊपर उठकर भाषा के स्वतंत्र निर्बाध प्रचार का मौका उपलब्ध कराता है। आज हिन्दी जनमानस की संपर्क भाषा है। जिसमें निरंतर वृद्धि हो रही है। आज मीडिया के माध्यम से भी हिन्दी को अहमियत दे रहे हैं। हिन्दी सामग्री के प्रति बढ़ता रुझान नित नयी वेबसाइटों तो तो सामने ला ही रहा है। आज मीडिया बाजारोन्मुख होता चला जा रहा है। उसमें से जनसरोकार गायब हो रहे हैं। बौद्धिक तेजस्विता कमजोर होती जा रही है। इस प्रवृत्ति से मीडिया का पठन-पाठन भी प्रभावित हुआ है। अभी इंटरनेट माध्यम अपनी प्रयोगशीलता के दौर में ही है। इसीलिए वह अभी निजता की अभिव्यक्ति का माध्यम ही अधिक हैं।

      सूचना संचार प्रणाली किसी भी व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। आज भी वैश्वीकरण की व्यवस्था की जान इसी में बसती है। दूसरी तरफ समाज के दर्पण के रूप में साहित्य भी संचार माध्यम ही है, जो सूचनाओं का व्यापक संप्रेषण करता है। साहित्य की तुलना में संचार माध्यमों का ताना-बाना अधिक जटिल और व्यापक है क्योंकि वे तुरंत और दूरगामी असर करते हैं।

      संचार माध्यम यदि आज के आदमी को पूरी दुनिया से जोड़ते हैं तो वह ऐसा भाषा के द्वारा ही करते हैं। अतः संचार माध्यम की भाषा के रूप में प्रयुक्त होने पर आधुनिक विषयों को सहजता से जोड़ती है। आज व्यवहार क्षेत्र की व्यापकता के कारण संचार माध्यमों के सहारे हिन्दी भाषा की भी संप्रेषण क्षमता का बहुमुखी विकास हो रहा है। अतः कहा जा सकता है कि वैश्विक संदर्भ में हिन्दी की वास्तविक शक्ति को उभारने में संचार माध्यमों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बाजारीकरण ने आर्थिक उदारीकरण, सूचना क्रांति तथा जीवनशैली के वैश्वीकरण की जो स्थितियाँ भारत की जनता के सामने रखी, इसमें संदेह नहीं कि उनमें हिन्दी भाषा के अभिव्यक्ति कौशल का विकास ही हुआ है।

      उदारीकरण, निजीकरण के दो दशक पूरे हो गए। निजीकरण की गाड़ी पर मीडिया ने अपनी पहुँच और असर देश की करोड़ों जनता तक पहुँच बनाने में सफलता पाई है। सभ्यता के विकास के साथ ही वैश्वीकरण और मीडिया एक प्रक्रिया के रूप में बहुत ही मंद गति से आगे बढ़े हो लेकिन पिछले दो दशकों में जो बदलाव हुआ किसी क्रांति से कम नहीं। वैश्वीकरण और मीडिया का असर भी कायम रहा।

      आज वर्तमान समय में युवा पीढ़ि जब इंटरनेट की हो रही है तो इसमें बढ़ोतरी को देखा जा सकता है क्योंकि जमाना एप्स का आ चुका है। मोबाइल और कंप्यूटर की संचार क्रांति की चर्चा न की जाए तो बात अधूरी रह जाएगी। इन माध्यमों से दुनिया को सचमुच मनुष्य मुट्ठी में कर दिया है। सूचना, समाचार और संवाद प्रेषण के लिए हिन्दी को विकल्प के रूप में विकसित करके संचार तकनीक को तो समृद्ध किया है। 21वीं शताब्दी में मीडिया और इलेक्ट्रोनिक दोनों ही प्रकार के जनसंचार माध्यम नए विकास के आयाम को छू रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप हिन्दी भाषा नई-नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तत्पर हो रही है।

      मीडिया की भूमिका संवाद वहन की भी होती है। वह समाज के विभिन्न वर्ग, सत्ता केंद्रो, व्यक्तियों और संस्थाओं के बीच सेतु का कार्य करता है। आधुनिक युग में मीडिया का अर्थ समाचार पत्र, पत्रिकाओं, टेलिविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि से लिया जाता है। मीडिया समाज का निर्माण व पुनःनिर्माण करता है। मीडिया भाषा के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति उनका प्रचार-प्रसार करना व उसका संरक्षण करता है। शिला-लेखन, ताम्रपत्र, प्रिटिंग प्रेस इत्यादि से होते-होते डिजिटल प्रेस विकास यात्रा की नवीनतम कड़ी हमारे सामने है।

      अंततः मीडिया को भूमंडलीकरण के सामान्य परिवेश में रखकर विकास पथ को आगे बढ़ाना है कि उसकी संस्कृति भी सुरक्षित रहे तथा बाजारवाद की दौड़ में हर चुनौतियों का सामना करने में सक्षम रहे।     


डॉ. दुर्गेश नन्दिनी

शासकीय पाठशाला रामकोट

हैदराबाद, तेलंगाना।

संपर्क : 8019001223


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