स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
वन्दना
कोस कोस मे बदले पानी, दस कोस मे बानी
बानी कितना भला बदले, भावरूपता नही भिगडी।
कितना सुन्दर देश हमारा, है ही उतनी महान हमेशा
विश्व भर मे जब था अन्धेरा, भारत मे तो जगमग सवेरा
अक्षर ज्ञान के तडपन क्षण मे, सहित्य का विकास देखा।
जितने शैतान किया हमला, पर है मेरा भारत अचन्चल,
झड मेरा उतना अढ़िग, चाहे पत्ते को वे कितना उखाढ़ लिये
मजबूती का जो झड खडा, वह पाला पोसा गया सहित्य से।
भक्ति, ज्ञान, प्रभोध, प्रेरणा, सब का दिया सहारा,
प्रेम का काव्य हो, भगवान का भजन,
हालवाद हो, या छायावाद, आम आदमी का स्पूर्ती बनकर,
दिशा दिखाया, आगे बढाया, दास्य स्रुन्काला से छुडाय।
अन्धरुनी अज्ञान तिमिर को भगाभगाकर पुणीत किया।
साहित्य का असली अर्थ, सा-हित बनकर, दिख़ाया जग को।
आसमान मे तारा अनेक, मेरा प्यारा साहित्कार अनेक,
रहेन्गे विश्व मे सदा चमकते, प्यासे दिल को निपट निपट्ते।
महान मेरा भारत है, महान मेरा साहित्य।
मनः पूर्वक प्र्णाम समर्पण, यही हमारी गिलहरी यत्न।
जय हो भारत, जय जय हो साहित्य समाज।।
रामनरसिंहम
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