1947 से 1997 सारा देश आजादी की 50वीं वर्षगांठ मना रहा है, किसी देश के लिए आजादी मिलना कितने गौरव और सूकून की बात होती है फिर हमें तो करीब 1600 साल के बाद सही आजादी देखने को मिली है। इस आजादी के लिए हमारी जनता को कोई एक सौ वर्ष तक का संघर्ष करना पड़ा था। हिंदू-मुस्लिम दंगों और देश विभाजन की भयानक त्रासदी झेलनी पड़ी थी। उसके बाद कहीं 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ था। उस आजादी की कल्पना आज के उन वृद्धजनों से पूछो, जिन्होंने ब्रिटिशों का शासन और उनकी गुलामी देखी थी और जिन्होंने आज़ादी का नया सूर्य उगते हुए देखा था, कैसी-कैसी सुनहरी कल्पनाएं थीं उनके मन में उस पावन दिन के लिए छोटे-बड़े, बूढ़े- जवान, स्त्री-पुरुष सभी कोई झंडे लेकर निकल पड़े थे। कोई मकान, कोई दुकान तो कोई वाहन बिना तिरंगे झंडे के नहीं था। उन्हें कल्पना दी गयी थी कि तुम्हारी गरीबी और दुःखों का कारण यह गुलामी है अंग्रेजों ने तुम्हारा शोषण किया है, देश का शोषण किया है, आजाद हिंदुस्तान में जनता का हो शासन होगा जनता यानी तुम और हम दूसरा कोई राजा नहीं होगा, कोई जागीरदार या मालिक नहीं होगा, तुम स्वयं ही देश के मालिक बनोगे, इसलिए इस देश के आजाद होने पर यहां कोई गरीब नहीं रहेगा। सभी को समान अवसर, हरेक को काम, रोजगार, मकान और रोटी कपड़ा मिलेगा अथवा सरकार मुहैया करायेगी। सामान्यजन ऐसी सुखद आजादी की कल्पना में देश प्रेम का सपना देखने लगा था। हर कोई देश के लिए कुछ-न-कुछ या सब कुछ करने की भाषा बोलने लगा था। कई बेचारे ऐसे अशिक्षित या अर्धशिक्षित भी थे जिनकी कल्पना थी कि अब रेलों, बसों में किराया भी नहीं लगेगा, कारण कि हम आजाद हैं और इन रेलों, बसों के मालिक तो हम जनता ही हैं फिर किराया कैसा? खैर, आजादी के इस जश्न में 214 दिन लोगों ने मुफ्त का मजा कर भी लिया होगा, मगर बाद में सभी को खयाल आया कि यह तो हमारी संपत्ति है, फिर भी इन्हें चलाने के लिए हमें किराया देना ही होगा, नेताओं को भी अपीले करनी पड़ी थीं कि जनता टिकट खरीदे। खैर, जनता ने भी यह समझ लिया था। सभी कुछ पूर्ववत् हो गया। बाद में बढ़ते हुए टिकट
और
टैक्स
जनता
की
नियति
बन
गए
। जिसमें दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी हो रही है। वजह व्यवस्था की बजाय बीज की चोरी उसका कारण है।
उसके
बाद
दूसरा
दौर
आया
प्रशासन
का,
जो
नेता
कल
तक
जनता
के
साथ
घूम
फिर
रहे
थे
साथ
ही
रह
रहे
थे।
वे
ही
अब
प्रशासक
बन
गये,
जैसे
गवर्नर
मंत्री,
विधायक
या
सांसद।
प्रारंभ
में
वे
सभी
के
लिए
उपलब्ध
रहे,
अपने
निजी
निवास
स्थानों
में
ही
रहे।
हर
कहीं
बिना
रोक-टोक के जाते-आते रहे। जनता भी उन्हें बेझिझक मिल सकती थी, परंतु शनैः शनैः उन नेताओं पर सरकारी सुख सुविधा का रंग जमने लगा था, नशा चढ़ने लगा, जिन्होंने कभी कार, बंगले नहीं देखे थे, इसलिए सरकारी सुविधा मिलते ही बंगलों में चले गये, वे अब इस सुविधा के लिए लालायित और आदी होते गये। फिर उस सुविधा को बनाये रखने के लिए दो रास्ते चुने- प्रथम रिश्वत द्वारा इतना धन बटोरने लगे, जिससे कि बिना सरकार के भी अपने स्वयं के कार-बंगले बन जायें। दूसरा रास्ता अवसरवाद जोड़-तोड़ तिकड़म, दल-बदल या टांग-खेंच, कला द्वारा येन-केन प्रकारेण कुर्सी बनी रहे। देश की जिम्मेदारी या सेवा को छोड़ सब उसी कला में जुट गये। बल्कि पारंगत हो गये। फिर तो उस कला में 'म्यूजिकल चेयर का खेल चलने लगा जो 21 था वह आगे बढ़ा और 19 था पिछड़ता गया। तो ये दोनों हो प्रकार विगत पचास वर्षों तक चलते रहे हैं, नेता जो एक बार कुर्सी पर बैठा उसे मौत ने ही भले उतारा हो बाकी स्वेच्छा से किसी ने कभी कुर्सी को नहीं छोड़ा चाहे 'हेमरेज' हो गया, लकवा हो गया या शरीर बेहोश या बेजान हो गया। अथवा याद्दाश्त चली गयी पर परवाह नहीं कुर्सी पर जमे रहे, उदाहरण ही अगर देखने हों तो देश के सर्वोच्च नेता जवाहरलाल नेहरू से लेकर मद्रास (चेन्नई) के एम.जी. रामचंद्रन हाल के राजा निदेश सिंह तक का दिया जा सकता है। तीसरा प्रयास यह हुआ कि स्वयं तो कुर्सी से आजीवन चिपके रहे, साथ ही प्रयास यह कि मृत्यु पश्चात् वही कुर्सी उनकी संतानें, पलियां, वारीसों को मिलें तो विगत 50 वर्षों में नेताओं के जो भी नये चेहरे उभरे हैं उनमें अधिकांश ऐसे वारीसदार ही मिलेंगे। अपनी योग्यता से, सेवा से, स्वयं जनप्रियता पाकर नेता बनने वाले अपवाद स्वरूप हो दिखायी देंगे। कुछ आये भी तो जाति के बल पर जिनमें जात पांत,
धर्म,
गुंडई
और
सरकारी
साधनों
की
चतुष्गुणी
कला
थी।
ऐसे
नेताओं
को
सेवा
या
जनता
की
क्या
परवाह
हो?
उन्हें
तो
इस
शब्द
का
अर्थ
भी
कभी
मालूम
नहीं
हुआ
और
ना
ही
उन्होंने
कभी
उसकी
मालूमात
या
कोशिश
की
दूसरी
बात
जहां
सेवा
उनके
स्वभाव
या
कृति
में
नहीं
थी
ठीक
उसी
तरह
योग्यता
भी
उनके
लिए
बिना
कल्पना
की
वस्तु
थी,
उनका
काम,
उनकी
फर्ज
अदायगी
उनके
नीचे
के
अफसर
करने
लगे,
वे
केवल
काम
चाहे
श्मशान
के
हो
या
संडास
के,
गर्भपात
से
लेकर
अनाथालय
तक
के
उद्घाटन
करने
में
लगे
रहे,
कहीं नेता
मंत्री
या
सरकार
बदली
भी
तो
पत्थर
अपनी
जगह
अडिग
रहा,
धूल-आंधी बरसात में अपनी दुर्दशा झेलता रहा। उनकी प्रशासनिक अक्षमता को लेकर नौकरशाही बनाम अफसरशाही बेलगाम होती गयी जिसे केवल अपनी नौकरी का वास्ता होता है, बाकी देश और जनता से दूर-दूर तक का भी कोई वास्ता नहीं होता, कहीं कोई नेता थोड़ा सजग या चालाक हुआ तो वहां भी नेता से अफसर ने सांठ-गांठ व दोस्ती कर ली, नतीजा चारा से लेकर बोफोर्स की तोपें तक डकारी जाने लगीं। जनता तो वैसे ही गरीबी में सड़ती रही। विकास केवल नेता और सरकारी अफसरों व कर्मचारियों का हुआ है।
इसी
तरकीब
व
तिकड़म
से
देश
का
जनतंत्र
चलता
रहा।
नेता
आते
या
जाते
रहे,
पार्टियां
बदलती
रहीं
पर
बाकी
का
शासन-प्रशासन वही अफसरी ढरे वाला रहता। नयी आजादी के बाद चीन ने न सिर्फ शासकों को बदला बल्कि अपनी नौकरशाही को भी बदल लिया था जिस पर पूर्णतया पार्टी का कब्जा रहा। उसका एक नुकसान रहा कि उसी एक पार्टी की विचारधारा ही नौकरशाही का धर्म बन गया। परंतु जनता के प्रति जवाबदेही जिम्मेदारी तो गले में आयी ही, जिस दिन दूसरी पार्टी आयेगी तो उस मुताबिक फिर से वैसा धर्म परिवर्तन हो जायेगा, पर नौकरशाही जनता के प्रति जवाबदेह तो बनेगी ही आखिर लोकशाही का मतलब ही जनता है लेकिन हमारे देश की अफसरशाही पूर्णतया अंग्रेजों की देन रही है और उसी अफसरशाही के तौर तरीके से नौकरशाही पनपी है जिसकी नौकरी पक्की है, मगर जवाबदारियां जिम्मेदारीयां कुछ भी नहीं हैं, दोष सारा उस चलती बदलती पार्टी या नेता का माना जाता है जिसके जिम्मे केवल चंद महीनों या वर्षों का शासन आया। ज्यादा असंतोष हुआ तो इस नौकरशाही की एक जगह से दूसरी जगह बदली कर दी बाकी कोई दंड या सजा इसके लिए नहीं है तो जवाबदेही कहां से आये। नेता का भी दंड केवल त्यागपत्र है। नौकरशाही भारत की इतनी ही चालाक व बेईमान है जो सरकार बदलते ही पल में धर्म बदल लेती है? उसे जवाबदेह बनाने की कल्पना आज तक किसी अयोग्य नेता के मन में पिछले 50 वर्षों से नहीं आयी है तो जनता के काम कैसे बनें? कैसे विकास हो कैसे उसके कष्ट मिटें? लाल फीताशाही इस हद तक क्रूरता वाली पनपी है कि एक कर्मचारी के रिटायर्ड होने पर वर्षों तक उसकी पेंशन नहीं मिल पाती, बहुत मामलों में तो आदमी के मरने के बाद पेंशन मंजूर हुई। कागजों में कुएं, तालाब या पुल बने हैं, बीमार का इलाज या मौत का मुआवजा भी इसी लालफीताशाही के जाल में बंद रहता है। नौकरशाही के चलते ऐसी अंधेरगर्दी इसी देश में पनपी या चल सकती है।
अफसरों
के
दो
प्रकार
देखे
गये-
एक
तो
वह
जो
पूर्णतया
ईमानदार
रहा।
वह
स्वभाव
से
काफी
अकड़
या
एकांकी
बना
रहा
किसी
से
मिलता
नहीं
केवल
अपनी
अकड़
की
अफसरी
में
बने
रहना।
वैसे
ईमानदारों
की
तादाद
काफी
कम
रही
या शनैः-शनै: घटती गयी है, भले ही उनमें स्वाभिमान का गुण रहा हो परंतु जनता के शासन में जनता से पूरी तरह दूर बना रहा, नौकरी, क्लब या बंगले की हद तक स्वयं को सीमित कर लिया। नेता से पटी तो ठीक, नहीं पटी तो बदली से लेकर उपेक्षा तक के सारे दंड भुगत लिये परंतु जनता से तो दूरी हर हाल में बनाये ही रखी, दूसरी श्रेणी में वे अफसर काफी बड़ी तादाद में रहे जिनकी साठगांठ नेता मंत्री से बनी रही, इसलिए अपनी नियुक्ति को लेकर नेता मंत्री से रिश्वत की हिस्सेदारी जारी रखी। फलस्वरूप नीचे के अफसर से लेकर चतुर्थश्रेणी के चपरासी तक की नियुक्ति या ट्रांसफर के लिए कमीशन दलाली की हिस्सेदारी शुरू कर दी। यह हिस्सेदारी ऊपर से नीचे तक व्यापक और दूरगामी फैलती गयी, जिसका अंतिम प्वाइंट जनता ही होती है। परंतु उसे कदम-कदम पर हर काम की रिश्वत देनी पड़ती है, वह रिश्वत राशन से लेकर रेल बस के टिकट, स्कूल-कॉलेज से लेकर हॉस्पिटल तक के दाखिले में, पेंशन से लेकर पोस्टमार्टम तक के सभी काम की बंधी बधाई रिश्वत होती है, परंतु उसे इसके अलावा टेंडर ठेके की भी रिश्वत फिर उनके पेमेंट के लिए चैकों के हस्ताक्षरों तक की रिश्वत उनकी वह सारी रिश्वत काम की कीमत पर ही होती है। फलस्वरूप काम कमजोर करके ही रिश्वत चुकायी जाती है तो इस कमजोर काम को पास करने की भी रिश्वत चलने लगी है तब दूसरे समूह व्यवसाई, वकील या डॉक्टर, शिक्षक कैसे चुप रहते सभी ने बहती गंगा में हाथ धोने का धर्म बना लिया। सभी ने अपनी लूट की हिस्सेदारी बढ़ा दी। न्यायालय में भी भ्रष्टाचार घुस गया है। तो अब जनता को न्याय कहां मिले? न्याय भी इतना महंगा, खर्चीला और वक्तखाऊ हो गया जिसमें फैसलों में पीढ़ियां बीतने लगीं तो लोगों को मजबूरन रिश्वत का रास्ता या आज का दूसरा रास्ता माफिया गुंडाई सुपारी द्वारा लिया जाने लगा। परिणाम जो भी आये परंतु इतना तो स्पष्ट है कि इन दोनों प्रक्रियाओं से लोगों का विश्वास कानून न्याय अथवा शिक्षा स्वास्थ्य जैसी सेवा व्यवस्था से उठ चुका है।
इन
तमाम
दुर्गुणों
व
तकलीफों
के
बाद
जनतंत्र
की
मालिक
जनता
को
अपनी
फरियाद
की
अर्जियां
लेकर
इधर-से-उधर मारा-मारा भटकना पड़ता है। जनतंत्र के कार्यालय सचिवालय में भी जनता के लिए तरह तरह की पाबंदियां पास परमिट और तरह-तरह की जांच पड़ताल डिटेक्टरों से गुजरना पड़ता है तब भी वे काले अंग्रेज अफसर मिलेंगे या नहीं मिलेंगे तो काम करेंगे या नहीं उनका काम एक सोमवार से दूसरे सोमवार या अगले महीने के लिए टलता जाता है। बिना वजन रिश्वत के अर्जी एक टेबल से दूसरे टेबल तक नहीं पहुंचती है। अफसर से मिलने के लिए अर्दली को सलामी बनाम चाय-पानी बनाम रिश्वत का नैवेद्य भरना ही पड़ता है। बाकी अफसरों को काम के मुताबिक रिश्वत अलग से देनी पड़ती है।
हर
काम
चाहे
वह
कैसा
हो
गैरकानूनी
या
फर्जों
क्यों
ना
हो
नौकरशाही
को
हिस्सा
दिये
बिना
अगर
काम
हुआ
तो
वह
मामला
बोफोर्स
या
चारा
घोटालों
की
तरह
अखबार
में
पहुंच
जायेगा।
परंतु
नौकरशाही
की
रिश्वत
के
मामले
अभी
भी
उजागर
नहीं
हुए
हैं।
फलस्वरूप
उसके
द्वारा
अर्जित
अकूट
संपत्ति
अभी
भी
रहस्य
बनी
हुई
है।
उसी
के
नतीजे
के
कारण
अपराध
को
लगाम
नहीं
लगा
पाया
है।
जिस
दिन
नौकरशाही
की
संपत्ति
नीचे
से
ऊपर
तक
पकड़
में
आ
गयी
देश
में
कानून
व्यवस्था
अपने
आप
लागू
हो
जायेगी।
ऊंचे
अफसरों
को
नीचे
द्वितीय
श्रेणी
के
वे
लोग
आते
हैं
जो
फाइल
बनाते
हैं
उनकी
शक्ति
अपरिमित
होती
है
वे
किसी
काम
को
करने
में
विश्वास
नहीं
करते
और
इनकी
वह
अपरिमित
शक्ति
काम
को
न
करने
के
लिए
या
बाधाएं
खड़ी
करने
के
लिए
या
फिर
कानून
की
वैसी
विचित्र
परिभाषा
निकालने
के
लिए
होती
है,
जिसके
द्वारा
'काम
नहीं
हो
सकता',
उस
फाइल
पर
फतवा
बनाम
रिमार्क
लगा
देते
हैं,
परंतु
रिश्वत
से
वे
सारे
रिमार्क
दूर
होकर
फाइलें
हवा
में
उड़ने
लगती
हैं,
एडवांस
फैसले
को
मंजूरी
मिल
जाती
है।
हमारी
इस
डेमाक्रेसी
में
तृतीय
श्रेणी
का
क्लर्क
या
रेवेन्यू
का
पटवारी
ही
असरदार
होता
है।
उसने
एक
बार
किसी
फाइल
पर
नकारात्मक
फतवा
लगा
दिया
तो
उसे
हटाने
के
लिए
सिवाय
रिश्वत
के
किसी
अफसर-कलेक्टर की मजाल नहीं होती फिर भले ही फाइल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक तहसील से दिल्ली तक घूमती रहे।
मजे
की
बात
इस
लोकतंत्र
बनाम
जनतंत्र
में
चुने
हुए
नेता
मंत्री
का
आदेश
अफसर
रोक
सकता
है
या
विना
पालन
किये
कचरे
में
डाल
सकता
है।
ठीक
इसी
तरह
उस
उच्च
अफसर
के
आदेश
को
द्वितीय
तृतीय
श्रेणी
के
कर्मचारी
रोक
सकते
हैं,
इस
आजाद
देश
के
कानून
या
वेतन
काम
करने
के
लिए
नहीं
बल्कि
काम
न
करने
के
लिए
या
हर
काम
पर
रोड़े
अटकाने
के
लिए
हुआ
करते
हैं।
कहीं-कहीं तो इस मानसिकता के प्रति दुःखद परिणाम देखे जा सकते हैं, पैंशन आदमी के मरने के बाद तक नहीं मिल पाती तो दूसरे काम या न्याय पीढ़ी-दर-पीढ़ी रगड़ने के बाद भी नहीं मिल पाते जनता को इतनी रिश्वत देने और तकलीफों के बावजूद हर काम की अर्जी परिमिट की किल्लत उठानी पड़ती है, बात चाहे रोजमर्रा के बिजली की, पानी कैनेक्शन या राशन की हो या गैस के चूल्हे से लेकर टेलीफोन लगाने की हो हर चीज की कृत्रिम किल्लत या अव्यवस्था को लेकर भटकना पड़ता है। बावजूद उसे वह नियमानुसार आसानी से नहीं मिल पाती। जिस चीज की जितनी आवश्यकता है, उसका उपयोग नहीं होगा, जो परमिट लायसेंस अंग्रेजों के जमाने में नहीं थे वे अब हो गये हैं बल्कि बढ़ते जा रहे हैं, कहीं आटे की चक्की लगानी हो या कच्चे घर की रिपेरिंग या नया बनाने की बात हो इनकी रिश्वत तो पक्की होगी ही। सीधे शब्दों में काम चाहे जितना छोटा हो परंतु सरकारी विभाग में बिना धक्के या परेशानीया रिश्वत के संभव नहीं होता, यह इस जनतंत्र का एक व्यावहारिक रूप हो गया है। जनता को भी जबरन इसे स्वीकार करना पड़ा है। देश की सर्वोच्च नेता और भ्रष्टाचार जननी इंदिरा गांधी ने इसे 'वर्ल्ड फिनोमिना' बताकर और अधिकृतता प्रदान कर दी थी। वर्ल्ड फिनोमिना तो कई बुराईयों में है, परंतु उसे रोकना हो शासन, शासक और कानून का काम होता है।
सबसे
बड़ी
दुःखद
और
शर्मजनक
कोई
हालत
होगी
तो
वह
यह
कि
हमें
जनतंत्र
में
जनता
को
सरकारी
हर
महकमें
में
उपेक्षित
या
चोर
की
तरह
जिल्लत
अपमान-
तिरस्कार
बरदाश्त
करना
पड़ता
है,
चतुर्थ
श्रेणी
के
कर्मचारी
से
लेकर
बड़े
अफसर
तक
की
झिड़कियां
तिरस्कार
सुनना,
सहना
होता
है,
इतना
ही
नहीं,
उस
गरीब
जन
ने
जैसे
कोई
बहुत
बड़ा
अपराध
कर
दिया
हो।
यहां
कैसे
आ
गये,
बिना
पूछे
अंदर
कैसे
आ
गये
या
कुर्सी
पर
कैसे
बैठ
गये,
खड़े
होकर
बात
करो,
चपरासी
इसे
बाहर
निकालो,
साले
कहां-कहां से चले आते हैं, सिर खाने के लिए। रिश्वत देकर भी जनता को गालियां सुननी पड़ती हैं और वे बेशरम नमकहराम जिसका अन्न खाते हैं वेतन खाते हैं, उसी के साथ वैसी बेरहमी या बदतमीजी का कठोर व्यवहार करते हैं, अफसर क्लबों में मजे उड़ाते मगर जनता की किसी समस्या का निराकरण नहीं करेंगे उनकी टेबलों पर फाइलों के जत्थे पड़े रहेंगे। यही हाल नीचे के द्वितीय, तृतीय श्रेणी का है, वह भी जैसे फाइलों का जखीरा जमाये रखते हैं। रिश्वत के बाद 'मेहरबानी उपकार' के साथ अब आपका काम हो जायेगा या फिर आज मैंने आपकी फाइल आगे भेज दी है। वहां भी उसी तरह आगे चलाने के लिए नैवेद्य धरना पड़ता है। आजादी के बाद इस देश को केवल फाइलों की लायसेंस, परमिट वाली रिश्वती सरकार मिली है जिसका बोध चिह्न 'सत्यमेव जयते' उस आजादी या जनतंत्र के लिए जनता में क्या उत्साह-उल्लास रहेगा? अब 15 अगस्त या 26 जनवरी जैसे दिन केवल सरकारी छुट्टी के होते हैं और उनका जश्न भी केवल सरकारी तौर पर मानता है, मंत्री, गवर्नर, राष्ट्रपति आदि सलामियां लेते हैं जरूर, परंतु जनता की कोई हिस्सेदारी नहीं होती, उसी आजादी को, उसी जनतंत्र की 50वीं वर्षगांठ या जनता के तिरस्कार या कष्टों की 50वीं सालगिरह ? किसे कितना उत्साह या खुशी होगी अक्षम नेता, अय्याश अफसर, बदतमीज कर्मचारी के चलते उपेक्षित जनतंत्र और आजादी किसे कितनी खुशी व उत्साह देगी? इस प्रश्न का जवाब सरकारी जश्न या सार्वजनिक छुट्टी से नहीं जनता के दिलों से पूछो पर वह भी उतना ही कठिन भगीरथ प्रयास है। जिसकी शुरुआत में ही समस्या का हल है यानी कि समस्या समझना ही समाधान का रास्ता है। प्रश्न केवल उनसे हैं कि शुरुआत कौन करे और कब करे? जनता भी अपनी माली को एहसास कभी कर सके तो यह उपेक्षा और तिरस्कार से मुक्त हो सकेगी। उसी दिन देश को सच्ची आजादी का आभास सकेगाऔर जनता को भी इस सड़े गले लाचार जनतंत्र की जगह स्वस्थ जनता का राज जनता द्वारा जनता के लिए जनता का राज वाला सच्चा जनतंत्र मिल सकेगा।
आधुनिक
हिंदी
राजनीतिक
उपन्यासों
में
समकालीन
राजनीतिक
बोध
तथा
उससे
प्रभावित
विभिन्न
वर्गों
की
मानसिकता
का
सम्यक
विश्लेषण
किया
गया
है।
राजनीति
की
घटनाओं
को
जीवन
प्रभाव
में
डालकर
उपन्यासकारों
ने
उसका
रचनात्मक
प्रयोग
किया
है।
राजनीति
के
प्रभाव
से
बनते
हुए
कृत्रिम
परिवेश
और
राजनीतिक
शक्तियों
के
खोखलेपन
को
भी
बड़ी
ही
सहजता
और
सतर्कता
से
व्यंजित
किया
है।
भारतीय
राजनीति
विध्वंस
से
प्रेरित
और
सामाजिक
निर्माण
की
दृष्टि
से
असफल
हो
गयी
है।
इसने
हमारे
जीवन
को
भीतर
से
तोड़
दिया
है।
सारे
मानवीय
संबंधों
को
विभिन्न
कठघरों
में
बांट
दिया
है।
मूलत:
हमारे
देश
की
राजनीति
सत्ता
प्रतिष्ठानों
का
आधिपत्य
प्राप्त
करने
की
राजनीति
बन
गयी
है।
ऐसी
राजनीति
समाज
को
कभी
वर्ग-संघर्ष और कभी जाति संघर्ष में बदलने का प्रयास करती रहती है। समाज के बदलाव में वर्ग-संघर्ष की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन इसके लिए राजनीति का रचनात्मक होना अत्यंत आवश्यक है।
मन्नु
भंडारी
का
उपन्यास
'महाभोज'
एक
हरिजन
युवक
की
निर्मम
हत्या
और
उससे
बनने
वाले
परिवेश
की
व्याख्या
करता
है।
उपन्यास
का
केंद्र
स्थल
सरोहा
गांव
है,
जहां
एक
उपचुनाव
में
दो
विरोधी
शक्तियां
अपना
प्रभुत्व
बनाये
रखने
का
प्रयास
करती
हैं।
इसी
समय
'हरिजन
टोला'
की
कुछ
झोपड़ियों
में
आग
लगा
दी
जाती
है।
आग
लगने
की
खबर
जैसे
ही
शहर
पहुंचती
है
कि
वहां
के
मंत्री
और
नेता
अपना
अपना
स्वार्थ
सिद्ध
करने
के
लिए
आ
जाते
हैं।
लेखिका
के
शब्दों
में:
"नेताओं
ने
गीली
आंखों
और
रुंधे
हुए
गले
से
क्षोभ
प्रकट
किया
और
बड़े
बड़े
आश्वासन
दिये
और
अखबार
नवीस
आये
तो
दनादन
उस
राख
के
ढेर
की
ही
फोटो
खींच
कर
ले
गये।
दूसरे
दिन
अखबार
में
छापकर
घर-घर भी पहुंचा दिया इस घटना का सचित्र ब्यौरा।"
इसी
उपन्यास
के
एक
पात्र
हैं
भूतपूर्व
मुख्यमंत्री
सुकूल
बाबू,
जिन्होंने
पिछले
चुनाव
में
हारने
के
बाद
घोषणा
कर
दी
थी
कि
वे
अब
चुनाव
नहीं
लड़ेंगे।
"अब
सक्रिय
राजनीति
से
संन्यास
ले
लेंगे।
जीवन
के
बचे
हुए
दिन
जनता
की
सेवा
में
ही
बितायेंगे,
पर
पहला
अवसर
आते
ही
वे
लपक
लिये।
सुकूल
बाबू
दस
वर्षों
तक
मुख्यमंत्री
रहे
हैं।
लोग
इन्हें
और
दा
साहब
को
एक
बराबर
मानते
हैं।
सुकूल
बाबू
के
व्यक्तित्व
का
चित्रांकन
करते
हुए
लेखिका
लिखती
हैं:
"सांवला
रंग,
नाटा
कद,
थोड़ा
थुलथुल
शरीर,
सुरा
सुंदरी
से
किसी
प्रकार
का
परहेज
नहीं
बल्कि
कहना
चाहिए
कि
अनुरागी
हैं।
दोनों
जग
के
सकल
पदारथ
नपाने
वाले
हैं।
महीनों
में
वे
अपने
को
शमार
नहीं
करवाना
चाहते।
मस्त
फक्कड
हैं,
एकदम
निजी
दोस्तों
के
बीच
फूहड़
भाषा
का
प्रयोग
करते
हैं,
ज्योतिष
पर
अनन्य
विश्वास
है
सुकूल
बाबू
कोभूतपूर्व
मुख्यमंत्री
सुकूल
जी
के
विरुद्ध
लखनसिंह
चुनाव
लड़
रहे
हैं।
जोरावर
सिंह
वर्तमान
मुख्यमंत्री
का
समर्थक
है
जो
भूमिपति
तो
है
ही
अपनी
बर्बरता
और
करता
के
लिए
भी
विख्यात
है।
जोरावर
सिंह
मुख्यमंत्री
का
विश्वास
प्राप्त
है।
वह
हरिजन
युवक
बीसू
की
हत्या
करा
देता
है।
उसकी
हत्या
हो
जाने
के
उपरांत
मुख्यमंत्री
दा
साहब
गांव
जाते
हैं।
वे
मृतक
के
पिता
से
मिलते
हैं
और
उसे
लेकर
सभा
स्थल
पर
जाते
हैं
और
बीसेसर
की
मृत्यु
पर
सहानुभूति
प्रकट
करते
हुए
वे
कहते
हैं
: " आज
एक
बहुत
ही
खेदजनक
मौके
पर
एक
दुःख
के
मौके
पर
हूं,
मैं
आप
लोगों
के
बीच
चलने
लगा
तो
लोगों
ने
सलाह
दी
कि
सुरक्षा
का
विशेष
प्रबंध
करके
चलू।
बात
मैं
कुछ
समझा
नहीं।
अपने
भाई
बंदों
के
बीच
जाकर
तो
आदमी
वैसे
ही
सुरक्षित
रहता
है।"
मंत्री
महोदय
इस
बात
की
और
भी
संकेत
करते
हैं
कि
बिसेसर
ने
आत्महत्या
की
है।
मंत्री
जी
के
शब्दों
में
जितने
भी
संकेत
मिले
हैं,
उस
घटना
के,
सब
यहाँ
बता
रहे
हैं
कि
बिससेर
ने
आत्महत्या
की
है।
4
एस.पी. सक्सेना दो दिनों तक बयान लेते रहे। उनके सामने यह बात स्पष्ट रूप से आ जाती है कि यह आत्महत्या का नहीं हत्या का मामला है। इस हत्या में मुख्य मंत्री दा साहब के कृपा पात्र जोरावर सिंह का हाथ है। दा साहब बयान वाली पूरी फाइल मंगा लेते हैं और सिन्हा, डी.आई.जी कहते हैं: पुलिस वालों में जैसी अंतर्दृष्टि व्यवहार कुशलता और व्यक्तित्व का ओज होना चाहिए, वैसा कुछ नहीं, फिर सक्सेना की पी.आर. (कॉन्फीडेनिशयल रिपोर्ट) को देखकर, जरा सोचकर बोले इसे भी देखा है मैंने, ये मेरी धारणा की पुष्टि करती है इसकी रिपोर्टस जब-जब महत्त्वपूर्ण काम सौंपा गया, परिणाम असंतोषजनक हो रहा। इसलिए ये प्रमोशन के हर मौके पर तबादला करके इधर-उधर भेज दिया गया है।'5 डी.आई.जी. सिन्हा ने जो रिपोर्ट तैयार की थी उस पर मुख्यमंत्री महोदय कहते हैं: "तुम्हारी रिपोर्ट भी देखी है, बड़े मेहनत से तैयार की गयी लगती है। 5 दा साहब वहां से सक्सेना का तबादला करवा देते हैं और सिन्हा का प्रमोशन हो जाता है।
'महाभोज' शीर्षक इस सच्चाई को व्यंजित करने में और भी सार्थक बन गया। है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश का राजनीतिक परिवेश व्यक्तिगत स्वार्थ, दल बदल, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, अत्याचार आदि के कारण अत्यंत विषाक्त हो गया है। ऐसे दूषित परिवेश की विडंबना यह है कि जनता उपेक्षित एवं पीड़ित है। हर कहीं उसके
अधिकारों
का
हनन
हो
रहा
है।
उसके
अचेत,
आशाहीन,
प्राणहीन
शव
पर
अवसरवादी
नेता
गिद्ध
बनकर
टूट
पड़ते
हैं।
महाभोज
का
रहस्य
राजनीतिक
नेताओं
के
भ्रष्ट
और
बदलते
रूपों
का
मर्म
है।
समय
के
साथ-साथ पूंजीपतियों की शोषण शैली और रणनीति में परिवर्तन आता गया। तद्नुरूप वर्ग संघर्ष के रूप और शैली में अंतर आना भी स्वाभाविक हो गया। राजनीतिक हिंदी उपन्यासों में शोषकों और शोषितों की दो-दो पीड़ियाँ-नयी और •पुरानी बिलकुल आमने-सामने खड़ी हैं। दोनों अपनी-अपनी जीने के लिए सचेष्ट हैं और इन दोनों दलों के एक-एक प्रतिनिधि होना आवश्यक है और इसका उदाहरण हमें अब्दुल बिस्मिला के झीनी-झीनी बीनी चदरिया' में हाजी अमीरूला तथा सेठ गजाधर प्रसाद आदि के रूप में मिल जाता है। मतीन, रउफ, बशीर इत्यादि वर्ग संघर्ष की आकांक्षा को जन्म देने वाली पुरानी पीढ़ी के हैं। इन शोषितों का संघर्ष दबा-ढका, छिपा-छिपाया है। थक-हार कर उन्हीं शोषक, सेठों के पास लौट जाने की उनकी मजबूरी है। किंतु नयी पीढ़ी के लोग शोषण और जुल्म को रत्ती भर भी कार करने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने विरोध और संघर्ष का खुल्लम-खुल्ला ऐलान कर दिया है। इस नयी पीढ़ी का प्रतीक पात्र इकबाल है, जो शरफद्दीन एम.एल.ए. और सेठ कामता प्रसाद, एस.पी. जैसे शोषकों को नये वर्ग के समक्ष कठिन चुनौतियां पेश कर देता है। यदि इन नये शोषकों ने शोषण तंत्र का राजनीतिकरण करके उसे मजबूत बनाना चाहा तो शोषितों ने भी जनतांत्रिक मूल्यों और साधनों को अपना कारगर हथियार बनाया है।
मतीन
निम्न
मध्यमवर्गीय
समाज
का
जाना-पहचाना चेहरा है। उसने होश संभाला बानी' पर बिनता रहा है। अपना करघा और अपनी मेहनत होते हुए भी उसकी अपनी इतनी हैसियत नहीं हुई कि वह अपना कतान रेशम खरीद सके और स्वतंत्र बिनकर बनकर कोठी वालों से अपनी गर्दन छुड़ा सके। यह हालत अकेले मतीन की ही नहीं है अपितु यही नियति उसके पूरे समुदाय की है। अपनी नियति के साक्षात्कार की उसमें गहन पीड़ा है। अतः उससे मुक्ति की उसमें बेहद बेचैन छटपटाहट है। पर इस स्थिति से वह अकेले ही नहीं उबरना चाहता अपितु अपने पूरे समाज का उद्धार करना चाहता है। "बुनकरों की सहकारी समितियां संगठित होनी आवश्यक थीं। अतः लोग चाहते थे कि सोसाइटी बननी चाहिए, गिरफ्तारों का गढ़ टूटना चाहिए जैसे भी हो, दिमाग में बस यही एक बात घूम रही है। यद्यपि उनके मन में तरह-तरह की शंकाएं हैं: "पता नहीं सोसाइटी बन पायेगी या नहीं, बन भी गयी तो ऋण मिलेगा या नहीं और यदि ऋण मिल भी गया तो क्या वे इसेचुका पायेंगे।सोसाइटी के लिए 'शेयर कैपिटल' इकट्ठा हो गयी मतीन का मन आश्वस्त हो जाता है। उसे लगता है कि अब सोसाइटी बन ही जायेगी। अब शीघ्र ही उनकी यातना के दिन लद जायेंगे। पर बैंक पहुंचते ही पहले झिड़की, अपमान, जिल्लत और रिश्वत की मांग होती है। फिर टाल-मटोल और अंत में बैंक मैनेजर की फटकार मिलती है। बड़ी कठिनाई से मतीन और रउफ को बैंक मैनेजर के बताने पर समझ में यह बात आती है कि फ्रॉड करना बड़ी गलत बात है। इससे पहले भी उन लोगों ने सोसाइटी बनाने की मांग की थी। उस पर उन्हीं लोगों के हस्ताक्षर हैं, जिनके हस्ताक्षरयुक्त आवेदन पत्र मतीन लाया था।
डॉ.
अब्दुल
बिस्मिल्लाह
ने
इस
उपन्यास
के
कथानक
के
रूप
में
जनता
संस्कार
के
शासन
काल
की
एक
वास्तविक
घटना
को
आधार
बनाया
है।
इस
समय
बनारस
के
बुनकरों
की
बिना
साड़ियों
के
मेहनतानों
से
तरह-तरह की नाजायज कटौतियां शुरू हो गयी हैं। सेठों और रइसों ने कुछ ऐसी टैक्टिसे ईजाद कर दी थीं कि उनकी बुनी दोशरहित साड़ियों में तरह-तरह के ऐब निकालकर वास्तविक से बहुत कम मूल्य उन्हें देते। इस तरह अपनी मेहनत और बेहतरी कला को बेचने वाले इन बुनकरों को बदले में क्या मिलता है। सिर्फ एक लुंगी, भैंस का गोस्त और नंग घडंग जाहिल बच्चे टी.बी. की बीमारी से छटपटाती हुई औरतें। दूसरी ओर उन्हीं के परिश्रम से देश प्रतिवर्ष पचीस-तीस करोड़ कमाता रहा। सेठों और रइसों की कोठियां ऊंची बनती गयीं और इनकी जिंदगियां सीलन भरी कोठरियों में सड़ती रहीं। इसी शोषण और अन्याय के खिलाफ बनारस के बुनकरों ने हड़ताल कर दी थी।
समाज
के
इन
शोषितों
के
बीच
से
एक
नयी
शक्ति
उत्पन्न
हुई
जिसने
संकल्प
लिया
कि
वे
दुनिया
का
नियम
बदल
डालेंगे।
उन्होंने
यह
भली-भांति जान लिया कि जो बेईमान हैं, वे ही ईमानदार बने हुए हैं। जो चोर हैं, वही शरीफ़ माने जाते हैं। सरमायेदारों का सरमाया दिन व दिन बढ़ता जा रहा है और वे निरंतर तेजी के साथ तबाही और बरबादी की और लुढ़कते चले जा रहे हैं। आखिर इसका क्या कारण है। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने उनके सामाजिक, आर्थिक पुनर्वास के लिए बहुतेरी योजनाएं बनायीं। सहकारी समितियों तथा अन्य संगठनों के माध्यम से आर्थिक सहायता और ऋण आदि देकर उनको ऊपर उठाने सूदखोरों, पूंजीपतियों की गिरफ्त से मुक्त करने का सपना देखा गया। इस काम के लिए देश का अपार धन बरबाद किया गया।
यह
क्रम
आज
भी
जारी
है।
किंतु
इसका
लाभ
किसे
मिला।
क्या
मजदूरों,
श्रमजीवियों,
दस्तकारों,
बिनकरों
या
सर्वहाराओं
को
इससे
कोई
राहत
मिली?
देश
की
स्थिति
गवाह
है
कि
इसके
फायदे,
सरकारी
ऋणों
और
धनों
को
सेठों,
नेताओं,
दलालों
और
बिचौलियों
ने
बीच
में
ही
हड़प
लिया।
एक
ओर
ऐसे
लोगों
ने
फर्जी
सोसाइटियां
और
संस्थाएं
बनाकर
सरकारी
धन
और
जनता
की
कमायी
को
लूटा
और
दूसरी
और
उन्होंने
उलटकर
गरीबों
शोषितों
पर
यह
इलजाम
भी
लगाया
कि
से
बड़े
ठाट
की
जिंदगी
जी
रहे
हैं।
ये
बहुत
बड़े
घमंडी
और
टेकी
होते
हैं।
इनके
शोषण
की
बात
बिलकुल
गलत
है
बल्कि
समाज
सेवा
में
लगे,
उनके
उद्धार
और
सहायता
में
निरत
लोगों
का
ये
ही
शोषण
करने
लगे
हैं।
ये
मालिकों
के
नहीं
मालिक
इनके
कर्जदार
होते
हैं।
उलटे
इलजाम
लगाने
की
उनकी
बहुत
सोची
समझी
हुई
यह
चाल
है
ताकि
वे
आसानी
से
उनके
पक्ष
में
उठती
न्याय
की
आवाज
को
दफना
सकें।
इस
प्रकार
की
धोखाधड़ी,
बेईमानी,
फ्रॉड
और
प्रपंच
में
जब
पूंजीपतियों,
नेताओं
की
मदद,
पूरा
शासन
तंत्र
ही
कर
रहा
है।
जब
इन
योजनाओं
को
कार्यान्वित
करने
वाले
सरकारी
अधिकारी
हो
ऐसे
भ्रष्टाचारों
में
लिप्त
हैं
तब
देश
की
खुशहाली
के
सपने
का
क्या
होगा?
गरीबों,
कमजोरों
और
सर्वहाराओं
के
उद्धार
की
कल्पना
का
क्या
होगा?
तब
किस
प्रकार
सामाजिक,
आर्थिक
विषमता
मिटेगी,
किस
प्रकार
वर्ग
भेद
समाप्त
होगा
और
किस
तरह
वर्ग
संघर्ष
कम
हो
सकेगा?
उपन्यासकारों
ने
लोकतंत्र
के
नाम
पर
खेले
जा
रहे
एक
और
बेशर्म
नाटक
का
रहस्य
खोला
है।
हालांकि
वे
यह
कोई
रहस्य
की
बात
नहीं
है
अपितु
वर्तमान
का
कड़वा
यथार्थ
है।
एक
ओर
सत्ताधारी
वर्ग
अपनी
सत्ता
बनाये
रखने
के
लिए,
दूसरी
और
पूंजीपति
वर्ग
शोषण
पर
पर्दा
डालने
के
लिए
सत्ता
और
राजनीति
पर
हावी
होने
की
कोशिश
कर
रहे
हैं।
उनका
एकमात्र
उद्देश्य
है
किसी
तरह
स्वयं
या
अपने
पिवाओं
को
विधान
मंडलों
या
संसदों
में
भेजना।
इसके
लिए
उन्होंने
जनतांत्रिक
चुनावों
को
खूनी
चुनावों
में
तथा
दंगों
और
फसादों
की
राजनीति
में
बदल
लिया
है
।।
भोली
भाली
जनता
समझती
है
कि
यह
दंगा
सांप्रदायिक
और
धार्मिक
विद्वेष
की
उपज
है
पर
इसके
पीछे
की
वास्तविकता
बड़ी
घिनौनी
है।
शोहदे
शरफुद्दीन
और
गरीबों
के
गिरहकट
कामता
प्रसाद
का
विधायक
सांसद
बन
जाना
इस
यथार्थ
को
प्रकट
करता
है।
इसके
साथ-साथ ऐसे भ्रष्ट विधायक एवं सांसदों ने अपने साथ एक ऐसी संस्कृति विकसित कर ली है, जिसमें नवचारणों, नवविदूषकों, लफ्फाजों, लफंगों और शोहदों-भर की इज्जत है। इनका काम सरकारी कोष का खुला दुरुपयोग करना, अपनी तिजोरी भरना, जनता का चौतरफा शोषण करना- कभी स्कूल के नाम पर, कभी अस्पतालों, कभी यतीमखानों के नाम पर कभी मंदिर मस्जिद और धर्म के नाम पर कभी अपने प्रतिद्वंद्वियों को नीचा दिखाना एवं अपने पिछलग्गुओं का हित साधन करना भर है। जनता के रहनुमाओं का ऐसा चरित्र बहुत ही शोचनीय स्थिति का संकेत देता है।
निष्कर्ष
कहा
जाता
है
कि
दुनिया
में
शासन
पद्धति
डेमोक्रसी
बनाम
जनतंत्र
ही
सर्वश्रेष्ठ
है,
परंतु
व्यवहार
में
देखा
गया
है
कि
जनतांत्रिक
पद्धति
सर्वाधिक
खर्चीली
और
अव्यवस्था
का
कारण
होती
है।
जर्मनी
के
हिटलर
ने
भी
एक
बार
व्यंग्य
में
कहा
था
कि
"डेमोक्रेसी
में
बुद्धिमान
व्यक्ति
के
जनोपयोगी
सुझाव
भी
सामने
वाले
सदस्य
अपनी
बहुमति
के
नाम-नामंजूर कर सकते हैं।" चूंकि बात हिटलर ने कही थी जिसने कि द्वितीय विश्व युद्ध में नराधर्मी हिंसक कृत्य किये थे, इसलिए गलत आदमी के द्वारा कही हुई सही बात भी लोगों के जेहन में नहीं बैठ पायी थी। परंतु आज भी उसे तथ्य के रूप में देखा जा सकता है।
देखा
जाये
तो
भारत
में
ही
लोकतंत्र
के
नाम
पर
कितना
प्रत्यक्ष
व
परोक्ष
खर्च
हो
रहा
है,
पहले
तो
उम्मीदवारों
का
अपना
खर्च
बेशुमार
होता
है,
साथ
ही
चुनाव
व्यवस्था
में
सरकारी
खर्च
भी
बहुत
बड़ी
मात्रा
में
हुआ
करता
है।
इसके
बाद
चुनी
हुई
लोकसभा
में
जहां
करीब
800 सदस्य
हैं,
जिन
पर
प्रति
मिनिट
लाखों
का
खर्च
होता
है,
वे
सदस्य
अधिकांश
तो
कार्यवाही
में
हिस्सा
ही
नहीं
लेते
या
फिर
उधम
उत्पात
या
बर्हिगमन
में
लगे
रहते
हैं,
जहां
स्वार्थ
आया
वहां
दलबदल
से
भी
परहेज
नहीं
करेंगे।
यही
हाल
राज्यों
की
विधान
सभाओं
का
है,
अब
तो
बात
नगर
पालिकाओं
और
पंचायतों
तक
पहुंच
चुकी
है।
यहां
उलटा
हुआ
है
बात
नीचे
से
ऊपर
नहीं
अपितु
ऊपर
से
नीचे
पहुंची
है।
हर
सदस्य
को
मंत्री
स्तर
का
दर्जा
देना
ही
पड़ता
है।
वरना
दलबदल
कर
सरकार
गिरा
देंगे।
इसमें
अगर
मंत्रियों,
मुख्य
मंत्रियों
या
जिन्हें
मंत्री
स्तर
प्राप्त
है
वे
अध्यक्षों
के
खर्चे
सिवाय
मुख्यमंत्री,
प्रधानमंत्री,
राज्यपाल,
राष्ट्रपति,
उपराष्ट्रपति
आदि
के
शाही
रहन-सहन, यात्रा सुरक्षा आदि ताम-झाम को जोड़ा जाये तो इस गरीब देश की जनता, जो कि पहले ही विदेशी कर्ज में डूबी हुई है जिसका रोम-रोम कर्जवार हैं, देश में हर नया पैदा होने वाला नागरिक 5 हजार रुपयों का कर्ज लेकर पैदा हो रहा है तो उस डेमोक्रेसी की तुलना किसी अच्छी शासन पद्धति से कैसे की जा सकेगी?
अब
रही
बात
कि
डेमोक्रेसी
बनाम
जनतंत्र
कितना
सही
और
जनहितकारी
है?
पहली
बात
तो
जनता
को
अपनी
हर
मांग
के
लिए
हर
जरूरत
के
लिए
आंदोलन
करना
पड़ता
है।
कभी-कभी गलत टैक्सों के विरोध में तो कभी अनावश्यक कीमत, वृद्धि या महंगाई को लेकर या कभी रेल, बस की सुविधा को लेकर बहुत बार तो बात जुलूसों व हड़तालों तक सीमित रहती है तो बहुत बार लाठी, गोली और जानमाल की हत्या तक की कीमत जनता को चुकानी पड़ती है। अब तो हालत यह है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से मिलना तक मुश्किल होता है। इतनी बड़ी सुरक्षा होती है कि मंत्रालय या सरकारी कार्यालयों में जनता का दाखिला होना कठिन हो जाता है, तब संबंधी नेता मंत्री से मिलने की क्या बात हो? और मिल लेने पर भी • जायज बात का मंजूर होना कौन-सा संभव है? केवल अर्जियां देते जाओ आश्वासन लेते जाओ। मंत्री कभी मंजूर करता है तो नौकरशाही रोक देती है। इसमें जनता और जनतंत्र तो कहीं आता ही नहीं हैं। उन चुने हुए प्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार बेईमानी अक्षमता के लिए भी जनता को आंदोलन व लाठी-गोली खानी पड़ती है। बिहार का चारा घोटाला प्रत्यक्ष प्रमाण है।
दूसरी
बात,
इस
देश
में
जो
जनतंत्र
आया
है,
वहां
सरकारी
या
गैर
सरकारी
महकमों
में
जहां
भी
जनता
का
वास्ता
होता
है,
उसे
कदम-कदम पर अपमान तिरस्कार सहना होता है। उसमें भी आगे हर बात के लिए अर्जी के साथ रिश्वत देनी पड़ती है, चाहे वह बात राशन की हो या रेल टिकट की। अस्पताल के इलाज सेलेकर स्कूल-कॉलेज के दाखिले और नौकरी व बदली तक के कार्यों में रिश्वत ली जाती है। इन सबके बावजूद भी काम नहीं होता है तो क्या उसे कहेंगे दुनिया का बेहतरीन जनतंत्र ?
जीवन
के
अंतिम
दिनों
में
महात्मा
गांधी
ने
अपनी
एक
प्रार्थना
सभा
में
दिल्ली
में
कहा
था
कि
शासन
पद्धति
कोई
भी
हो
अगर
उसका
शासक
वर्ग
सही,
भला,
दयालु
और
ईमानदार
होगा
तो
ही
आगे
अच्छाई
आ
सकेगी
बाकी
परिवर्तन,
प्रगति
या
क्रांति
के
नाम
कोई
भी
शासन
व्यवस्था,
उतनी
ही
जुल्मी
होगी
जितनी
की
बदलाव
के
पूर्व
की
थी।
राजाशाही
के
लिए
भी
उनका
अभिमत
था
कि
राजाशाही
बुरी
नहीं,
बुरा
उसका
निर्भय
रूप
से
उपयोग
करने
वाले
पर
है।
उदाहरण
के
लिए
भगवान्
राम
भी
तो
राजा
थे
उनकी
राजशाही
को
रामराज्य
कहकर
आज
भी
हजारों
साल
बाद
लोग
आदर्श
और
अनुकरणीय
मानते
हैं।
उनके
बाद
भी
सम्राट
अशोक,
विक्रमादित्य,
हर्षवर्धन
से
लेकर
अकबर,
जहांगीर
तक
के
शासन
को
जनता
ने
अच्छा
या
सुखद
माना
है।
आज
की
स्थिति
से
तो
अंग्रेजों
का
शोषण
युक्त
शासन
भी
बढ़िया
था।
राजाओं
और
जागीरदारों
का
शासन
भी
अच्छा
था,
बल्कि
उन्होंने
अपने
प्रभाव
से
उन्हें
अच्छा
कहलवा
दिया।
इतना
अत्याचार,
इतनी
परेशानी
और
टैक्स
आदि
का
इतना
शोषण
नहीं
था।
गांधी
जी
की
वह
बात
हर
मामले
में
सही
उतरी,
हमारे
देश
में
जहां
जनतंत्र
के
नाम
बेईमानी,
कामचोरी,
रिश्वतखोरी,
हवाला
कमीशन,
ऐय्याशी
आदि
का
बोलबाला
चला
तो
दूसरी
ओर
क्रांति
के
नाम
जहां-तहां साम्यवादी शासन व्यवस्था हुई वहां भी यही दुर्दशा कायम हुई। तीसरी ओर जहां शासक अच्छा होगा वहीं शासन अच्छा चलेगा फिर चाहे किसी भी शासन पद्धति का शासन क्यों न हो? इसके भी अनेक उदाहरण दक्षिण कोरिया, मलेशिया, सिंगापुर आदि में मिल जायेंगे। अव्यवस्था, बेईमानी और रिश्वत के लिए बहुत बार बोगस दलीलें दी जाती हैं कि आदमी की आय निर्धारित मापदंडों से कम होगी तो वह बेईमान बनेगा ही, बात सही नहीं है, आदमी जो स्वाभावगत बेईमान होगा उसकी आय अगर करोड़ों में होगी तब भी बेईमानी नहीं छोड़ेगा और जिसे ईमानदार रहना है गरीबी और अभावों में भी ईमानदार बना रहेगा। चाणक्य का उदाहरण बहुत दूर का नहीं है। औरंगजेब अपने हाथ से टोपियां बनाकर गुजारा चलाया करता था। इसलिए घूम फिर कर बात आदमी के चरित्र पर ही पहुंचेगी वही अच्छी व्यवस्था ईमानदार व्यवस्था के
लिए
जिम्मेदार
व
कारण
रूप
होगा।
हमारे
देश
की
डेमोक्रेसी
जहां
शासन
व्यवस्था
या
सुविधा
आदि
को
लेकर
खर्चीली
महंगी
व
अकार्यक्षय
रही
वहीं
उसकी
चुनावी
पद्धति
भी
बहुत
खर्चीली
और
बेईमानी
का
कारण
बनी
है।
सरकारी
दफ्तरों
में
नौकरशाही
काम
की
बजाय
विलंब
अधिक
करती
है
तो
न्यायपालिकाएं
भी
बजाय
न्याय
के
विलंब
पीढ़ी-दर पीढ़ी का चला रही है। प्रश्न जन प्रतिनिधियों मंत्रियों आदि का है तो वे भी बेमतलबके दौरे, विदेशी यात्राएं फजूल के उद्घाटन आदि में लगे रहते हैं जिसे लेकर फाइलें अनिर्णय की स्थिति में बनी रहती हैं। ऊपर से सारे निर्णय उन्हीं के हस्तगत केंद्रित होने से विलंब और रिश्वत दोनों का कारण बनते हैं। एक तो उनकी बौद्धिक अक्षमता है दूसरी निजी बेईमानी, तीसरी अनुभव होनता इन तीनों कारणों को लेकर जो कानूनी व व्यवस्थापिका के सुधार होने चाहिए वे नहीं हुए। ये बेचारे तो केवल पद पाना, सत्ता भोगना और स्वर्गवासी होना ही जनतंत्र समझते हैं। दूसरी बात हमारे यहां चुनाव का खर्च तीन कारणों से बढ़ा है।
1. जीतने वाले को सत्ता सुविधा, ऐश्वर्य, पद, प्रचार प्रसिद्धि, इस हद तक मिलती है कि उसे लेने को लोग तत्पर रहते हैं, हर कोई जीतने की लालसा में डूबा रहता है। किसी का उद्देश्य सेवा नहीं होता इसलिए प्रचार प्रलोभन प्रसिद्धि की सीमा नहीं रहती। हर कोई दूसरे के आगे निकलना या नीचे उतरकर भी जीत हासिल करना चाहता है। चुनाव भी सही बहुमत का नहीं होता आधे नागरिक वर्ग मर्यादा को लेकर वोटर नहीं हैं। आधे से आधे के करीब वोट डालते हैं। उनके आधे बहुमत यानी दसमांश का शासन बनाते हैं। केवल एक वोट से जीतने वाला शासक या विजेता बनता उसे कैसी डेमोक्रेसी कहा जायेगा?
2. बेशुमार प्रचार खर्च तथा मतदाता को रिश्वत में वस्तु, शराब या नकद व अन्य
3. चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह के आकाश कुसुम वायदे जिसमें नौकरी देने से लेकर मुफ्त मकान, सस्ता अनाज, कपड़ा और गरीबी हटाओ तक के सब्जबाग दिखा दिये जाते हैं। उसी के साथ-साथ मतदाताओं की गैर-कानूनी हरकतें जिनमें गलत व गैर कानूनी बातों को मंजूरी देना भी शामिल होता है। फिर उन्हीं मुफ्तखोरी के गैर कानूनी झोंपड़ों के लिए नया मकान वह भी मुफ्त देने की घोषणा होती है।
इन
सब
बातों
में
इतना
अधिक
खर्च
हो
जाता
है
जिसे
वे
चुनाव
मर्यादा
में
नहीं
बता
सकते।
इसलिए
वह
भी
तीन
अन्य
तरीकों
से
पूरा
करते
हैं,
दो
नंबर
के
बेहिसाबी
रुपया
लेकर,
पार्टी
के
नाम
खर्च
या
अनुदान
से,
मित्रों
व
शुभचिंतकों
के
फर्जी
नाम
से,
काले
धन
के
उपयोग
द्वारा
सरकारी
खजाने
की
खैरात
लुटाकर
भले
ही
देश
दिवालिया
बना
रहे।
यह
सब
अब
इस
हद
तक
पहुंच
गया
है
कि
नगरपालिका
और
पंचायत
चुनावों
में
लाखों
का
खर्च
होने
लगा
है,
सहकारी
संस्थाएं,
बैंकों
और
कॉलेज
यूनियन
के
चुनाव
भी
लाखों
में
पहुंच
गये
हैं,
विधानसभा
और
संसद
की
क्या
बात
की
जाये।
वहां
तो
बात
करोड़ों
की
हो
जाती
है।
तो
इसी
का
परिणाम
है
आज
का
'हवाला
कांड'
और
सरकारी
कार्यों
में
चलने
वाली
रिश्वत
उम्मीदवार
जो
खर्च
करता
है,
उससे
कई
गुणा
अधिक
जीतने
पर
वसूलना
चाहता
है।
पहले
तो
लगा
हुआ
खर्च
फिर
अगले
चुनाव
की
व्यवस्था
तत्पश्चात्
अपनी
पीढ़ी-दर पीढ़ी
को
आजीविका
सुख-सुविधा लूटने में लग जाता है, उसके बाद फिर आगामी चुनाव के लिए नयी व्यवस्था में लग जाता है। तो अर्थ साफ है पिछले 50 वर्षों के अनुभव से हमने इस चुनाव पद्धति को इस हद तक खर्चीला बना लिया है कि अब केवल योग्यता सेवा कार्यक्रम नीति और सचाई के नाम पर कोई उम्मीदवार जीतने की कल्पना तक नहीं कर सकता। उससे भी दुःखद स्थिति यह रही कि हर कोई त्रसित होते हुए भी किसी ने इसमें सुधार करने के प्रयास नहीं किये बल्कि उसमें हिस्सेदार ही बनते जा रहे हैं। यही वजह है कि जैन हवाला कांड में सभी पार्टियों की हिस्सेदारी है जबकि हिंदुस्तान में अकेला जैन नहीं है ऐसे तो सैकड़ों हजारों जैन और उनकी छुपी डायरियां मिल जायेंगी। केवल खोजने की देरी है सिवाय जो कीमतें बढ़ाने से लेकर बाकी मामलों में रिश्वत और कमीशन के किस्से छपते रहते हैं, परंतु उनकी कहीं जांच या सुनवाई नहीं होती इसलिए किस्से दबकर रह जाते हैं। जहां भी जांच हुई वहां कार्यवाही नहीं हुई, कोर्ट ने जैन डायरी को भी आधारभूत प्रमाण नहीं माना है। यह बात भी सही है कि जिस तरह किसी का नाम किसी की डायरी में होना प्रमाण नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह रिश्वत लेने और देने का भी प्रमाण नहीं हो सकता। तब आधार किसे मानेंगे? इसलिए अपराध तो मिले पर अपराधी नहीं मिले या मिले तब भी बिना कार्यवाही के छोड़ दिये गये, कारण कि सभी धोती में नंगे हैं। इसलिए यहां हर कोई अपने आपको अपराधी देखता रहा हो तो कौन किस पर कार्यवाही करेगा? इस तरह हमारे देश का चुनाव ही भ्रष्टाचार की गंगोत्री बना है बाकी आदमी की अपनी बेईमानी महत्त्वाकांक्षा भी उससे जुड़ी दूषित है।
भारत
की
डेमोक्रेसी
और
उससे
जुड़ी
चुनाव
पद्धति
जिसमें
खर्च
और
हर
कीमत
पर
चुनाव
जीतने
की
प्रवृत्ति
होती
है
वही
पद
एक
बड़ा
दूषण
है।
चुनाव
जीतने
के
लिए
जातीय
द्वेष
धर्म-द्वेष का भी आधार लिया जाने लगा है। हमारा देश पहले ही जातियों से बंटा हुआ है, ऊपर से धर्म-द्वेष के वोट अधिक होते हैं उसी जाति धर्म को ध्यान में रखकर उम्मीदवार खड़ा करने का सिलसिला अपनाता है। फलस्वरूप चुनावी प्रचार पैसों के साथ-साथ जाति व धर्म-द्वेष को लेकर चलने लगता है। 1936 के पश्चात् धर्म द्वेष को प्रचार का मुद्दा जिन्ना की मुस्लिम लीग ने बनाया था। उसी का परिणाम देश विभाजन और करोड़ों नागरिकों को शरणार्थी बनना पड़ा। इतना ही नहीं आज तक वह जहर घुला हुआ है। कश्मीर उसका नतीजा है दंगे युद्ध भी हमारे देश को झेलने पड़े हैं। द्वेष, जहर दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। चुनाव तो एक महीने में सुलट जाते हैं, परंतु वह जाति, धर्म-द्वेष का जहर कायम कर जाता है। जिसे लेकर व्यावहारिक जीवन में कदम-कदम पर धंधे, नौकरी या आस-पास व पड़ोस आदि तमाम बातों में वह द्वेष मुखरित होता रहता है, दंगों के मूल में भी वही कारण दिखायी देगा, इस तरह हमारे देश में डेमोक्रेसी बनाम जनतंत्रहोकर रह गया। इसलिए हमारे यहां चुनाव और जनतंत्र बजाय उपयोगी व सुखद रहने के दुखद व घातक बनता जा रहा है।
संदर्भ
1. मनू भंडारी, महाभोज पू.10
2. वहीं, पू.12
3. वही, पृ. 28-29/ हपृ. 76 4
4. वहीं, पु. 163
5. वही, पू. 16-1
6. झीनी-झीनी बीनों चदरिया, पु. 22 7
7. अब्दुल बिस्मिल्लाह पू. 81
डाँ. राजश्री मोरे
असि. प्रो. आर्ट्स कालेज
उस्मानिया युनिवर्सिटी,
हैदराबाद, तेलंगाना
93924 28593
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