Tuesday, March 3

मासूमियत का संघर्ष - रजत सहगल (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")

  (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")



मासूमियत का संघर्ष
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    सीमा कि यह कहानी बेहद मार्मिक और दिल को छू जानॆ वाली है। यह कहानी हमें सिखाती है की मुसीबतें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो हौसला और मेहनत हमें हर मुश्किल को आसान बना देती है। यह कहानी एक छोटी सी बच्ची की है जो दिल्ली के चांदनी चौक में गुब्बारे बेचने के लिए सुबह से शाम तक घूमती रहती है। फटे हुए कपड़े और नंगे पैर होने के बावजूद उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान रहती थी। जब भी कोई गाड़ी लाल बत्ती पर रूकती, वह अपनी नन्ही सी आवाज मे कहती साहब एक गुब्बारा ले लो बहुत प्यारा है।

    चांदनी चौक का वह व्यस्त चौराहा जो आज बारिश की बूंदो से धुंधला गया था। शाम ढल रही थी और लोग अपने घरों की ऒर भाग रहे थे। कुछ लोग बारिश के थमने का इंतजार कर रहे थे। एक दिन एक अमीर आदमी अपनी आलीशान कर में वहां रुका। उसे  पानी से सरोबार 10-12 साल की सीमा दिखाई दी। उसके पुराने घिसे हुए कपड़ों से पानी टपक रहा था।

    उसने देखा की सीमा फटे हुए कपड़ों में भी कितनी खिलखिला रही थी जबकि वह खुद अपनी करोड़ो की संपत्ति के बाद भी तनाव मे रहता था। उसने सीमा को बुलाया और पूछा बेटी तुम इतना खुश कैसे रहती हो? तुम्हारे पास तो ठीक से कपड़े भी नहीं है। सीमा ने जवाब दिया साहब जब मैं इन रंग-बिरंगे गुब्बारो ही उड़ते हुए देखती हूं तो मुझे लगता है कि मैं भी इनके साथ आसमान छू रही हूं। वह आदमी सीमा की बात सुनकर दंग रह गया |उसने सीमा के सारे गुब्बारे खरीद लिए और उसे ढेर सारी मिठाइयां भी दी । सीमा आज बहुत खुश थी पर वह अमीर आदमी उससे भी ज्यादा खुश था क्योंकि आज उसने एक छोटी सी बच्ची  से जीवन का सबसे बड़ा सबक सीखा था - उस दिन  सीमा जब घर पहुंची, तो उसके हाथ खाली नहीं थे गुब्बारो के बदले मिली मिठाइयां और अपनी बीमार मां के लिए दवाइयां खरीदी।

    अगले दिन वह फिर उसी चौराहे पर खड़ी थी, लेकिन आज उसके पास गुब्बारे नहीं थे वह बस वहां खड़ी होकर उसे अमीर आदमी का इंतजार कर रही थी । जब वही आलीशान कार फिर से सिग्नल पर रुकी तो सीमा दौड़कर खिड़की के पास गई । उसने अपनी मुट्ठी खोली और उसमें से एक छोटा सा पत्थर निकाला जिस पर उसने रंगीन पेन से एक मुस्कान (Emoji) बनाई थी उसने वह पत्थर उसे आदमी को देते हुए कहा साहब कल आपने मेरे सारे गुब्बारे खरीदे थे इसलिए आज मेरी तरफ से आपके लिए तोहफा लाई हूं जब भीआप उदास हो इसे देख लेन।

    वह आदमी भावुक हो गया और उसने महसूस किया की सीमा सिर्फ गुब्बारे नहीं बल्कि खुशियां बांट रही थी उसने फैसला किया कि वह सीमा की पढ़ाई का खर्च उठाएगी कुछ सालों बाद वही नई सीमा अब हाथ में गुब्बारे नहीं बल्कि किताबें लेकर स्कूल जाने लगी उसने साबित कर दिया कि अगर मन मे उम्मीद और मेहनत हो तो किस्मत के गुब्बारे भी ऊंची उड़ान भर सकते हैं।

    समय बीतता गया और सीमा की मेहनत रंग लाई वह अमीर आदमी जिसका नाम मिस्टर खन्ना था अब सीमा के लिए उसके सपनों के फरिश्ते बन चुके थे। सीमा मैं स्कूल में टॉप किया और अपनी मां का इलाज करवा कर उन्हें पूरी तरह से ठीक कर दिया

    अब सीमा बड़ी हो चुकी थी उसने एक एनजीओ शुरू किया जिसका नाम रखा उड़ान वह खुद अब महंगी गाड़ियों में घूमती थी परंतु उसका दिल आज भी उसी चौराहे पर अटका था। एक दिन सीमा ने उसी चौराहे पर देखा कि एक छोटा लड़का उदास बैठा है उसके पास भी कुछ गुब्बारे थे जो बिक नहीं रहे थे सीमा कार से उतरी और उसी बच्चे के पास गई और उसके सारे गुब्बारे खरीद लिए जब उसे बच्चे के चेहरे पर वही पुरानी वाली मुस्कान आई तो सीमा की आंखों मैं अंशु आ गए उसने उस बच्चे को गले लगाया और मिस्टर खन्ना की बात याद आई कि यह गुब्बारे सिर्फ हवा से नहीं बल्कि उम्मीदो से भरे हैं सीमा ने ने केवल अपनी जिंदगी बदली बल्कि आज वह हजारों गुब्बारे वाले बच्चों के जीवन में रंग भर रही थी।

    कहानी का यह मोड़ सिखाता है की सफलता वही है जो दूसरों के काम आए।

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© रजत सहगल

सिरसा (हरियाणा)
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