(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "प्रहरी अक्षरों का")
धर्म और अधर्म का संग्राम है महाभारत,
मन के भीतर चलता हर नाम है महाभारत।
जो स्वयं श्री कृष्ण के प्रवाह को दर्शाती है महाभारत
जो गीता के सार में पूरा जीवन पूरा सृष्टि की रचना को उतार देती है महाभारत,
श्री कृष्ण की हर वाणी हर शब्दों का सार है यह महाभारत,
अधर्म पर धर्म की विजय पताका लहराती है महाभारत
“क्या केवल विध्वंस और षड्यंत्र की गाथा है महाभारत,
या धर्म और सत्य का गहरा आयाम है महाभारत।”
“शंखनाद के शोर में भी अडिग खड़े रहना सिखाती है महाभारत,
धैर्य, साहस और विवेक से सही निर्णय लेना सिखाती है महाभारत।”
लोभ और सत्ता की जब सीमा लांघी जाती,
न्याय की पुकार का आयाम है महाभारत।
जब धरती ने ओढ़ी शौर्य की अग्निमयी आभा है, महाभारत।
रक्तरंजित धरती पर जगा प्रलय का संवाद है, महाभारत।
जब कर्मभूमि में भय जकड़ ले हर निर्णय,
वहीं निष्काम कर्म का क्रांतिकारक विज्ञान है, महाभारत।
न रिश्तों का अंधा मोह, न सत्ता का मद-अभिमान,
सिर्फ़ सत्य की अडिग पहचान है, महाभारत।
हर हृदय में सुलगता जो अनंत युद्ध,
उसका नग्न, निर्मम प्रमाण है, महाभारत।
जहाँ रिश्ते भी धर्म के तराज़ू में नंगे तौले जाएँ,
वहीं न्याय का निर्मम विधान है, महाभारत।
जब सत्ता के नशे में विवेक ही मर जाए शासकों का,
वहीं विनाश का अटल ऐलान है, महाभारत।
धर्म के पथ पर चाहे अंगार ही क्यों न बिछे हों,
उन्हीं जलती राहों का अमर सम्मान है, महाभारत।
जहाँ हर अंतर्मन अपने ही प्रश्नों से घायल हो,
वहीं सत्य का कठोर प्रमाण है, महाभारत।
जब समय भी अन्याय के आगे झुकता सा लगे,
वहीं कर्मों का अचूक हिसाब है, महाभारत।
जहाँ सत्य अकेला खड़ा हो लाखों के विरुद्ध,
वहीं अडिग रहना ही असली बलिदान है, महाभारत।
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© अंकुश कुमार अग्रवाल
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