(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")
निराकार हे प्रभु तुम्हें, पाषाणों में ढाल दिया,
दे आकार सलीके से, शिल्पी ने ये काम किया,
इसी रूप में सेवा है, सृष्टि की ये मेवा है।
सेवा ही सद्कर्म जगत में, सेवा से सद्भाव,
पार लगेगी इसी कृत्य से जीवन रूपी नाव।
परम भाव और मनोयोग से करते जो जन सेवा,
निर्विकार निर्लिप्त कामना पूरी करते देवा ।
मन में अपने धारण करलो श्रद्धा और विश्वास,
निश्छल तन मन में ही रहता प्रभु प्रभुत्व का वास,
छोड़ न देना ईश्वर भक्ति जीवन की यह सांस।
कृष्ण कहो या राम जपो करो आव्हान शंकर,
सभी दुःखों की एक दवा है प्रभु स्मरण मंतर।
अनायास ही जो गलती हो स्वीकारो सेवी,
पालनकर्ता क्षमा करेंगे नैया जो है खैनी।
दुराचार को दूर भगाओ सम्हलो अब हे नेक,
प्रकृति को परिभाषित कर लो विनती है बस एक।
विचलन अन्दर भरा हुआ है, शुद्ध करो हर काम,
जितनी इच्छा भरी हुई है पूर्ण करेंगे राम।
अनजाने आगास तुम्हारे हर इच्छा अवशेष,
विघ्न विनाषक दूर करेंगे नाम जपो ज्यों गणेश।
----------------------------------------------------------
एनड्रायड मोबाईल हो, घूमने को बाईक हो ,
घर वाले बस कभी न टोकें ऐसी मेरी लाईफ हो,
लड़कियों से बात की पूरी पूरी छूट हो,
शाम को ठण्डी बीयर के 10-12 फिर घूॅट हों
ब्रॉडेड हो कपड़े, दो चार लफड़े
जूता मोटा भारी हो, बाइक पे तीन सवारी हो।
पेंट कमर से नीचे जिसकी हड्डी पर रखवारी हो,
खाने में तन्दूरी हो , रोटी मुर्गा प्यूरी हो,
मॉ-बाप और भाई बहन से बनी रहे कुछ दूरी हो,
जीवन ऐसे जीते है जैसे कोई मजबूरी हो,
खान पान का होश नहीं , भगत जैसा जोश नहीं ,
पैदल चलना है दुष्वार रहते हरदम बाइक सवार?
सुबह नाश्ता पाश्ता छाती पकड़ के खाँसता,
स्कूल कॉलेज जाने से कभी कभी ही वास्ता
दिनभर टी.वी रात में नैट, फेस बुक पर रहते सैट
ईयर फोन का कान में ढेंठा, ऐसे लगा के रखते हैं।
जैसे घन में लकड़ी बेंटा।
हरकतें हो सैफ सी, प्रेमिका हो कैफ सी,
मेकडोनाल्डस और डोमिनोज़ का पिज्जा बर्गर भोजन हो,
कोल्ड ड्रिंक के साथ में फिंगर चिप्स का योजन हो
सिनसियरटी का नाम नही , घर का कोई काम नही ।
गाड़ी भले चलाते है पर स्टेपनी और बोनट दूसरों से खुलवाते हैं।
बॉडी हो सलमान सी , जिम जाना है शान भी
छोंतरे हों बड़े डबल जिसमें बॉधे पोनी टेल
कान में कुण्डल गले में माला, टूरिस्टों को करते फेल
ऑर्कुट का नशा चढ़ा , ब्लूटूथ है कान में पड़ा।
घर में गुमसुम रहते हैं जैसे हो कोई सोच
किसी समय भी किसी गर्ल को कर सकें प्रपोज
-ज्यादातर तो यही बन रही आज की युवा सोच।
----------------------------------------------------------
हे पार्थ ले रोगी काया,
बिना बुलाये तू क्यों आया,
श्रेणी बन मेहमान की,
हो कटार बिन म्याँन की,
देशी भेष विदेशी छाया,
यह अपनत्व हमें नहीं भाया ।।
विष पीकर हमने अपनाया ।।
आत्म संतोषी हैं हम जीव,
करते काम सभी निर्भीक
डर तुम्हारा साल रहा,
दस दिनां से पाल रहा,
तुम्हें नहीं है कोई लाज
बच्चों को देते आवाज,
आप हुये निर्लज्ज महोदय,
कब आयेगा तुम्हें सरोदय,
पाया हमने एक सदस्य
बिगड़ गया सब घर परिदृश्य ।
सुबह नास्ता शाम को चाय,
मिलते ही करते हो बाय,
टूट पडो तुम खाने पर
वापस घर पे आने पर,
तुमको नहीं तुम्हारी चिंता,
कैसे रहने दोगे जिंदा,
दस दिनों से रहा हॅूँ झेल,
घर बन गया है तिहाड़ जेल,
दो कमरों का प्यारा घर,
सांसें भरता है दिन भर,
हर बातों में दखल तुम्हारा,
लगता नहीं है बिल्कुल प्यारा,
मेरी पत्नी मेरा सुख,
तुमको भला जी क्या है दुःख,
तुमसे है बस ये विनती,
कब जाओगे हे ‘‘अतिथि‘‘ ।
© अतुल चतुर्वेदी
------------------------------------------------------------------------------
GEETA PRAKASHAN
Please call us 62818 22363

.jpeg)
No comments:
Post a Comment