(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "खुबसूरत लम्हें")
परंपराओं का निर्वहन करती है नारी
लंबी उम्र का विश्वास दिलाता है नारी
अपना शहर छोड़ कर तुम्हारे घर को रोशन करती है नारी
चिर सनातन धर्म का अखंड अखंड कीर्तन करती है नारी
सोलह सिंगार करके नारी चलनी से दीदार करती है नारी
निर्जला व्रत रखकर पति का ख्याल रखती है नारी
पति-पत्नी के बंधन की परंपरा में
आनंद के गीत गाती है नारी
खुद को भुलाकर खुद को भुलाकर
ससुराल को स्वर्ग बनाती है नारी
पीहर के रिश्तों में नया उपवास रखती है नारी
सामाजिक दायित्व का निर्वहन करती है नारी
नारी है देवतुल्य रखो तुम उसका ख्याल
खुद करवां बनकर खुद करवां बनकर
पति की यात्रा में जीवन भर संग निभाती है नारी
आधुनिकता के इस दौर में चांद में चांद का दीदार करती है नारी
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© डॉ. आनन्द कटारे ‘बुंदेली‘
सहायक आचार्य
बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय, झॉसी (उ.प्र.)
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