(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "साहित्य सौरभ")
अब एक क्षण भी बेकार न जाने देंगे,
मुस्कुराकर हर दिन बिताएँगे।
रिटायरमेंट में खाली बैठने का मजा ही कुछ और है।
बीते साल कभी लौटकर न आएँगे,
छूटे सहकर्मी भी वापस न मिल पाएँगे।
रिटायरमेंट में यादों के संग मुस्कुराने का मजा ही कुछ और है।
ना सुबह जल्दी उठने की झंझट,
ना रात को नींद की मजबूरी।
मीठा संगीत सुनेंगे आराम से,
रिटायरमेंट में चैन से सोने का मजा ही कुछ और है।
तन को स्वस्थ रखने को योग ज़रूरी,
मन को हँसाने को हँसी ज़रूरी।
अब आराम फरमाने का अधिकार है,
रिटायरमेंट में तन-मन सँवारने का मजा ही कुछ और है।
कभी सिक लीव लेकर अपनों संग रहे,
कभी छुट्टी को तरसते ही रहे।
अब मुक्ति है, अब छूट है,
रिटायरमेंट में जीवन जीने का मजा ही कुछ और है।
कभी शराफ़त, कभी ट्रांसफर का डर,
मन की बातें रह गईं अंदर ही अंदर।
अब लिखेंगे, अब कहेंगे,
रिटायरमेंट में मन खोलने का मजा ही कुछ और है।
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© ज्ञान रंजन
मेल एक्सप्रेस ट्रेन मैनेजर, तिरुपति
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