Saturday, May 17

मिथिला का लोक कला : अरिपनकला - डॉ पुरुषोत्तम रंजन (गीता प्रकाशन Bookswala द्वारा प्रकाशित साझा संकलन से)

 (गीता प्रकाशन Bookswala द्वारा प्रकाशित साझा संकलन से)





मिथिला का लोक कला: अरिपनकला

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 बिहार की लोक संस्कृति प्राचीन काल से ही अपनी सामाजिक,सांस्कृतिक, लोक कला  विरासत को संजोता रहा है। यहाँ भिन्न भिन्न प्रकार के लोक कलाओं का उद्भव एवं विकास  हुआ है। जिनमे लोकनृत्य ( जट-जटिन,झिझिया,लौंन्डानाच) लोकगायन में विभिन्न पर्व गीत,संस्कार गीत एवं श्रमगीत (चैता, होली,छठगीत,विवाहगीत, मुंडन गीत, देवीगीत, जंतसार,रोपनी गीत ,बिरहा, चित्रकला में भित्ति चित्र,कोहवर एवं जमीन पर अरिपन (अइपन या अल्पना ) कला प्रमुख हैं।  अरिपन न केवल एक सुंदर कला रूप है, बल्कि यह मिथिला की सांस्कृतिक विरासत का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अरिपन कला, जिसे अल्पना के नाम से भी जाना जाता है, बिहार और नेपाल के मिथिला क्षेत्र की एक पारंपरिक लोक कला है। यह कला महिलाओं द्वारा विशेष अवसरों जैसे त्योहारों, पूजा और विवाह समारोहों के दौरान घरों के आंगन और दीवारों पर बनाई जाती है।

 अरिपन एक प्रकार की लोक चित्रकला है जो बिहार के मिथिला क्षेत्र में प्रचलित है। यह कला आमतौर पर त्योहारों और शुभ अवसरों पर घरों के आंगन और दीवारों पर बनाई जाती है।

निर्माण सामग्री:

अरिपन बनाने के लिए,कच्चा चावल (अरवा चावल)  को पानी में भिगोकर पीसा जाता है और फिर उसमें थोड़ा पानी मिलाकर एक गाढ़ा घोल तैयार किया जाता है। इस घोल को "पिठार" कहा जाता है। महिलाएं अपनी उंगलियों से गाय के गोबर या चिकनी मिट्टी से लीपी गई भूमि पर अरिपन बनाती हैं।

अरिपन के कई प्रकार हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:

 * तुसारी अरिपन: मकर संक्रांति और फाल्गुन संक्रांति के दौरान यह अरिपन तुसारी पूजा के शुभ अवसर पर बनाया जाता है, जो होता है। अच्छे वर की कामना के लिए युवा और अविवाहित मैथिली लड़कियां तुसारी पूजा करती हैं और तुसारी अरिपन बनाती हैं। इसमें मंदिर, चंद्रमा, सूर्य और नवग्रह बनाए जाते हैं और दिशाओं को भी दर्शाया जाता है।

 * सांझ अरिपन: संध्या पहर की देवी संझा देवी (शाम की देवी)  की अराधना के लिए सांझ अरिपन  बनाया जाता है।

 * गोवर्धन अरिपन: कार्तिक मास में दीपावली के बाद अगले दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर बनाया जाता है। गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की याद में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि  गोवर्धन अरिपन बनाने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।

  यह  सामाजिक एकता और सद्भाव का प्रतीक है, क्योंकि इसे अक्सर समुदाय की महिलाओं द्वारा मिलकर बनाया जाता है। यह  एक सुंदर और जटिल कला है जिसमें विभिन्न प्रकार के पैटर्न और रूपांकनों का उपयोग किया जाता है। गोवर्धन अरिपन में अक्सर गोवर्धन पर्वत, गायों, भगवान कृष्ण और अन्य धार्मिक प्रतीकों के चित्र बनाए जाते हैं यह कला घर के आँगन में बनाई जाती है।

 * कोहबर अरिपन: कोहबर कला महिलाओं की रचनात्मकता और कलात्मक कौशल को दर्शाती है। मुख्य रूप से विवाह के अवसर पर बनाई जाती है। कोहबर कला एक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है यह कला विवाह के अवसर को और भी खास बनाती है और नवविवाहित जोड़े के लिए शुभ मानी जाती है। इस कला में बने चित्र देवी-देवताओं और शुभ प्रतीकों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो नवविवाहित जोड़े के जीवन में सुख और समृद्धि लाने में मदद करते हैं

 * दुर्गा पूजा अरिपन: यह अरिपन दुर्गा पूजा के अवसर पर बनाया जाता है और इसमें देवी दुर्गा और उनके विभिन्न रूपों के चित्र बनाए जाते हैं।

 * अष्टदल अरिपन: यह अरिपन एक शास्त्रीय यंत्र है, जिसमें आठ पंखुड़ियाँ होती हैं। इसे विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में बनाया जाता है।अष्टदल अरिपन मिथिला की एक पारंपरिक कला है, जिसमें आठ पंखुड़ियों वाले कमल के फूल का चित्रण किया जाता है। यह अक्सर धार्मिक और सांस्कृतिक अवसरों पर बनाया जाता है और इसे शुभ माना जाता है ।तथा मिथिला की संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता है। अष्टदल अरिपन अपनी सुंदरता और जटिल डिजाइन के लिए जाना जाता है।

 * षट्दल अरिपन: यह अरिपन भी एक शास्त्रीय यंत्र है जिसमें छह पंखुड़ियाँ होती हैं। इसे भी विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में बनाया जाता है।

अरिपन का महत्त्व

सांस्कृतिक महत्व:

    अरिपन मिथिला संस्कृति की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी महिलाओं द्वारा हस्तांतरित होती रही है, जो सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने में मदद करती है। अरिपन विभिन्न धार्मिक और सामाजिक अवसरों पर बनाया जाता है, जो इन अवसरों के महत्व को बढ़ाता है।

    यह कला सामाजिक एकता और सद्भाव का प्रतीक है, क्योंकि इसे अक्सर समुदाय की महिलाओं द्वारा मिलकर बनाया जाता है।

  धार्मिक महत्व:

    अरिपन को शुभ और मंगलकारी माना जाता है। इसे घरों और पूजा स्थलों पर बनाया जाता है ताकि देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हो सके।अरिपन में विभिन्न धार्मिक प्रतीकों का उपयोग किया जाता है, जो आध्यात्मिक महत्व रखते हैं।

  कलात्मक महत्व:

    अरिपन एक सुंदर और जटिल कला है जिसमें विभिन्न प्रकार के पैटर्न और रूपांकनों का उपयोग किया जाता है। यह महिलाओं की रचनात्मकता और कलात्मक कौशल को प्रदर्शित करता है। अरिपन कला स्थानीय देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, दीप, स्वास्तिक इत्यादि को दर्शाती है, जो आज भी समाज में प्रचलित है।

 सामाजिक महत्व: यह कला महिलाओं को एक साथ लाती है और उन्हें सामाजिक रूप से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है। अरिपन महिलाओं को अपनी रचनात्मकता और कलात्मक कौशल को व्यक्त करने का एक मंच प्रदान करता है।

 

 

अरिपन कला के कलाकार

अरिपन कला के कुछ प्रमुख कलाकार इस प्रकार हैं:

 * महासुंदरी देवी: मधुबनी जिला की रांटी गाँव की रहने वाली एवं  सन 2011में पद्म पुरस्कार से सम्मानित महासुंदरी देवी मिथिला चित्रकला की एक प्रसिद्ध कलाकार थीं। उन्होंने अरिपन कला को भी बढ़ावा दिया और कई महिलाओं को इस कला को सिखाया।

 * चानो देवी: चानो देवी  मिथिला चित्रकला की एक जानी-मानी कलाकार हैं। इनका जन्म मधुबनी के जयनगर के निकट रमना गाँव में हुआ था उन्होंने अरिपन कला में भी अपना योगदान दिया है और इस कला को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है।

 * रामलाल कोन और दुलारी देवी: इन कलाकारों ने महासुंदरी देवी से अरिपन कला सीखी और आज वे खुद भी इस कला को सिखा रहे हैं।

इनके अतिरिक्त, कई अन्य महिलाएं भी हैं जो अरिपन कला में माहिर हैं और इस कला को जीवित रखने में अपना योगदान दे रही हैं।

उक्त तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान समय में मिथिला की अरिपन  कला न  केवल बिहार बल्कि राज्य एवं राष्ट्र की परिधि को पारकर वैश्विक स्तर पर अपनी अनूठी छटा बिखेर रही है। इस कला के उपासक राज्य, राष्टीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त कर रहे है।  युवा पीढ़ी को चाहिए कि  इस कलारूप को विरासत के रूप सम्हाल कर रखे।  

             

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© डॉ पुरुषोत्तम रंजन

(व्याख्याता)

डायट नरार-मधुबनी

सम्प्रति प्रतिनियुक्त डायट बसहा-सुपौल

9934420960

Purushottamranjan@gmail.com  

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