(गीता प्रकाशन Bookswala द्वारा प्रकाशित साझा संकलन से)
जो सारे सृष्टि का रहस्य जानता है वही है शिव,
जो सारे संसार को अपनी तीसरी आंख से चलाता है वही है शिव,
जिस के आज्ञा के बिना चींट का चाल भी नहीं चलता है वही है शिव,
सारे सृष्टि का विधाता वही है शिव, हे आंजनेया।
देवताओं को अमृत के लिए स्वयं विष को कंठ लिया है वही है शिव,
अपनी पत्नी के लिए अपने शरीर में आधा भाग त्याग दिया है वही है शिव,
सारी सृष्टि के विधाता अपने सिर पर गंगा को चढ़ा लिया है वही है शिव,
सब कुछ त्याग देकर निस्वार्थ जो रहता है वही है शिव हे आंजनेया।
सारे सृष्टि का संपत्ति का अधिकारी वही है शिव,
संसार में भीख मांगने वाला आदि भिक्षु ही है शिव,
मानव का जन्म से मृत्यु के बाद भी साथ देने वाला ही शिव,
सारे सृष्टि का निस्वार्थ साथी शिव ही है, हे आंजनेया।
ओंकार उच्चारण का चिह्न ही है शिव,
ढमरु शब्द का ध्वनि ही है शिव,
सृष्टि का रहस्य रूप लिंगाकार ही है शिव,
सारे सृष्टि के कण कण में वही है शिव, हे आंजनेया।
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© बि अंजनेय नायक
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