(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "चंचलता अक्षरों की" )
(दोहे)
नवरात्रे में ध्यान कर, माता के नौ रूप।
जाप ध्यान सिद्धि लहो , पड़े न फिर भव कूप।।
शैलसुता वृषवाहिनी,गिरिजा मूलाधार।
आदिशक्ति अपराजिता,सृष्टि का आधार।।
ब्रम्हचारिणी साधिका, हुआ अपर्णा नाम।
तपश्विनी सौम्या उमा, पूरण करती काम।।
चंद्रघंटिका मात दे, दिन तृतीय में त्राण।
दसों भुजाओं से करे, भक्तों का कल्याण।।
कूष्माण्डा चौथे दिवस ,अष्टभुजी है रूप।
केहरि वाहन राजती, पूज आरती धूप।।
स्कन्दमात पीताम्बरी ,अञ्चल स्कन्द विराज।
जगजननी पंचम दिवस, सुफल करे सब काज।।
कात्यायिनी षष्टम दिन, ममतामयी मनाउँ।
कमल हस्त वरदायिनी, चरणन शीश नवाउँ।।
कालरात्रि सप्तम दिवस, सुमिरत हो दुख दूर।
ग्रह-बाधा हर ले सभी, शुभकारी सुखपूर।।
गौरी माँ वृषवाहिनी,अष्टम धवला वेष।
शांत सौम्य शंकर प्रिया, पूज क्लेश हो शेष ।।
सिद्धिदात्री सिद्धि प्रदा,खोले दसवाँ द्वार।
मनोकामना पूर्ण हों, हो आनंद अपार।।
माँ तेरे नौ रूप को ,नमन अनंतों बार ।
क्षमा करो अपराध सब,कर दो भव से पार ।।
💐💐💐💐💐💐
© सुश्री गीता उपाध्याय 'मंजरी'
रायगढ़ छत्तीसगढ़
88390 10438
----------------------------------------------------------
------------------------------------------------------------------------------
GEETA PRAKASHAN
Please call us 62818 22363

.jpeg)
No comments:
Post a Comment