(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "चंचलता अक्षरों की")

बिकती नहीं जिंदगी,परचून की दुकान में
बसता है बचपन, मीठी सी मुस्कान में l
कहाँ गया वो बचपन , जहाँ बसती थी मासूमियत
हम न समझ पा रहे बचपन की अहमियत l
मोबाइल की चपेट में, दीमक लगता ये बचपन
चारों ओर न जाने क्यों है ,अब सूनापन l
न जाने क्यों है,सूने वो आम की बगिया
न जाने क्यों है,सूने वो खिलखिलाती गलियाँ l
सूने हैं अब ,वो खेल के मैदान
लगते हैं अब ,वो वीरान l
खाने लगे ,अब वो बर्गर पिज्जा
भूलने लगे वो अब,रोटी की हिज्जा l
मन में क्रोध और भावुकता
भूल गए अब,वो सहनशीलता l
हर कार्य की शीघ्रता
पर मन में भरा है कटुता l
बाइक ,कार की सवारी
मानो जैसे हो जाए ,उनका ओहदा भारी l
कैसा है ,
ये नया दौर,नया जनरेशन
जहाँ फटे पुराने कपड़े आज के फैशन l
जाने क्यूँ लगता अब,
खोता जा रहा ये बचपन l
कहाँ चला गया वो , अब उनका भोलापन l
बचा लीजिये उन्हे ,मोबाइल की बयार से
समझाइये तो उन्हें , जरा प्यार से l
क्योंकि,
बसता है ये बचपन उनकी मीठी मुस्कान में............
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© हर्षलता गजबल्ला
उत्तर बस्तर कांकेर(छ.ग.)
भारत
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