(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "चंचलता अक्षरों की" साझा संकलन से)
आओ अतीत मे चलें सभी,
मन मे विचार ये आया है,
अवतार यहाँ पर सभी हुए,
इस धरा धाम को भाया है ।
करते प्रणाम भारत माँ को,
भारत मे विश्व समाया है,
भारत नाम पड़ा कैसे,
मन ने यह द्वंद मचाया है ।
निश्चय समुद्र मंथन जैसा घट अमृत सा निकला होगा,
तीन भरत के कारण इसका भारत नाम पड़ा होगा ।
प्रथम भरत दुष्यन्त सिंह के दांतो से गिनती सीखी थी,
देख पराक्रम बालक का नौजवानो पर क्या बीती थी ।
इसी दृश्य ने वीर भूमि भारत का परचम फैलाया बुद्ध-कन्हैया,
राम- सबैया से हम सबको मिलवाया ।
दि्वतीय भरत दशरथ नंदन ज्ञानी के मन आया होगा,
स्नेह भृात का भारत मे मानस का पाठ पढाया होगा ।
जड़ भरत भागवत के महान ये तर्क वितर्क उठे होंगे,
कुछ भी हो तीनो भरत नाम भारत ने पहचाने होंगे ।
अब तुम्हें बताना शेष नहीं,
भारत का मिलन अवशेष नहीं,
यह है विचार की श्रखंला,
मन मे फिर पुनः अशेष नहीं ।
शत बार प्रणाम है भारत को अभिनंदन है और बन्दन है,
विश्व गुरु भारत बनने मे, मेरा भाल तिलक पर चन्दन है ।
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© श्रीमित्र त्रिपाठी (स.अ.)
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वि.ख. पनवाड़ी,
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