(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "चंचलता अक्षरों की" साझा संकलन से)
नील गगन के नीचे है, अपनी धरती माता।
इससे बढ़कर नहीं कोई, जग में रिश्ता नाता।
भारत भू कहते हैं इसको, इसकी छाया में हम पलते।
इसके अन्न जल पीकर ही, नित्य हंसते बढ़ते।
पूरब र्में है नागा साकी,पश्चिम विंध्य सतपुड़ा।
दक्षिण केरल पायल इसकी, उत्तर हिमालय जुड़ा।
यहां बही है गंगा यमुना, सतलज सिंधु की धारा।
जिसके चरणों में खेला करते, भारत के दुलारा।
यहां बने हैं मंदिर मस्जिद, गिरजाघर गुरुद्वारा ।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, भारत मां को है प्यारा ।
नील गगन के नीचे है, अपनी धरती माता।
इससे बढ़कर नहीं कोई, जग में रिश्ता नाता।
आओ भाई बहनों हमें, मां की रक्षा करनी है।
इसकी रक्षा खातिर ही अपनी खून बहानी है।
सत्य अहिंसा की खेती करते, बोते शांति की ढाल।
रणभूमि में राणा बनते भारत के हर लाल ।
रामकृष्ण की कर्मभूमि, जहां गूंजती गीता की वाणी।
मानव में मानवता भरती, यहां की हर प्राणी ।
नील गगन के नीचे है, अपनी धरती माता।
इससे बढ़कर नहीं कोई, जग में रिश्ता नाता।
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© चन्द्रहास सेन शिक्षक
ग्राम व पोस्ट कोसरंगी, थाना खरोरा
जिला रायपुर छत्तीसगढ़
पिन 493225
9752468692
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