(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *के पद्मजा* कृत साझा संकलन "कम्पन शब्दों का*" )
हे अबला नारी
जरा झुकी नज़रों को उठा कर देख।
पलभर अपने लिए जी कर देख।
अपने सपनों को सँजो कर देख।
ज़ालिम दुनिया क्या कहेंगी?
इस सोच में जीना क्या जीना...?
तूने, हर ज़िलद को हँसते- हँसते सहना सीखा।
मंद-मंद अपने आस्तित्व को खोना सीखा।
दूसरो के अश्रु को पोंछना सीखा।
ममता के मोह में, अपने कर्त्तव्य के आड़ में
अपने हर अरमानों का गला घोंटना सीखा।
दूसरों के खुशी को, अपना खुशी कहना सीखा।
चुप्पी साधकर, अपने अश्रु को छिपाना सीखा।
ज़ालिम दुनिया क्या कहेगी ?
इसी सोच में घुट-घुट कर क्या जीना ?
उठ अभी देर नहीं,
तोड़ दे बंधिष की जंजीर, बदल दे अपनी तकदीर
ला जीवन में उमंग, भर दे अपने सपनो में रंग
हाय अबला नारी यही तेरी कहानी
आँचल में दूध, आँखों में पानी
बस, इस कथन को बदल कर देख
पल भर अपने लिए जी कर देख
ज़ालिम दुनिया क्या कहेगी ?
इसी सोच में घुट-घुट कर क्या जीना ?
💐💐💐💐💐💐
© विद्या बालाजी
988402 5520
--------------------------------------------
------------------------------------------------------------------------------
GEETA PRAKASHAN
Please call us 62818 22363

.jpeg)
No comments:
Post a Comment