(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *शब्दाभिषेक शिव का* साझा संकलन से)
मैं जो सब का दिल रखता हूं ,
कोई मुझे भी तो समझे,
मैं भी तो एक दिल रखता हूं ।
मैं भी इंसान हूं ,अपना दिमाग रखता हूं ।
झूठ सच कि ज्यादा परख तो नहीं मुझे
पर थोड़ी बहुत पहचान तो रखता हूं
करता तो बहुत कुछ हूं ,पर निर्णय कुछ निकलता ही नहीं,
बावजूद इसके ,बावजूद इसके चेहरे पर अपने हंसी मुकम्मल रखता हूं ।
कचोटता तो बहुत कुछ है मुझे भी
शायद इसी वजह से मैं लोगों को नहीं अखरता हूं ।
झील सी आंखें हैं मेरी ,
इनमें समुंद्र सा सैलाब रखता हूं ।
आहत ना हो कोई मुझसे ,
इसलिए अपने आप को संयम में रखने का भरपूर प्रयास भी करता हूं
जिंदा दिली से जीने के लिए मैं कभी भी
बयां दर्द ए अल्फाज नहीं करता हूं ।
मैं जो सबका दिल रखता हूं,
कोई मुझे भी तो समझे ,मैं भी तो एक दिल रखता हूं।
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आरती पाल
(Monti Pal)
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