(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "अक्षराभिषेक साहित्य का " )
हाड - माँस की नारी
“इतिहास के पन्नों को जब पलटा,
नारी के जीवन को तब मैंने देखा,
कराह उठी मन की पीड़ा,
नारी की जब देखी ऐसी रूपरेखा।।“
भारत का बंटवारा, क्यों,
दाव घिरा नारी का यौवन, क्यों,
ना भाप सका नारी की मनसा, क्यों,
पल पल रौंधा नारी का दामन, क्यों,
बटवारे ने बांट दिया,
जाति-धर्म का ठप्पा दिया,
बस नारी होने पर, नारी ने ही बलिदान दिया,
हाड-माँस की देह लिये,
नारी होने पर खुद को ही श्राप दिया।।
“इतिहास के पन्नों को जब पलटा,
नारी के जीवन को तब मैंने देखा,
कराह उठी मन की पीड़ा,
नारी की जब देखी ऐसी रूपरेखा ।।“
इस मजहब-सरहद के लोगों ने,
नारी को न कोई धर्म दिया,
अपनी मनसा की चाहत में,
उसको नया एक नाम दिया,
मजहब-सरहद दोनो बाटी,
नारी का भी बटवारा किया,
जिस मजहब - सरहद की नारी न थी,
रखैल बनाकर, रखने का ऐसा भद्दा ठप्पा दिया,
हाड-माँस की देह लिये,
नारी ने यह भी स्वीकार किया,
अपने जीवन का तिनका-तिनका,
रखैल बनाकर निछावर किया।।
“इतिहास के पन्नों को जब पलटा,
नारी के जीवन को तब मैंने देखा,
कराह उठी मन की पीड़ा,
नारी की जब देखी ऐसी रूपरेखा ।।“
समय ने अमन का सुंदर रूप लिया,
तब नारी की चाहत ने,
नारी को फिर से जन्म दिया,
नारी ने अपनों की चाहत में,
सरहदों को भी पार किया,
पर भूल गई, हाड-माँस की यह हर नारी,
वह किस व्यर्था की थी मारी बेचारी,
रखैल नाम के ठप्पे लिए,
न बना सकी, अपनों के दिलों में घोसले,
न फिर से बनी मैं, बेटी किसी की,
न बन सकी मैं पत्नी किसी की,
हाड-माँस की देह लिये,
रखैल बनी मैं पुरूषों की।।
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© सोनी कुमारी राजेश
शोधार्थी, हिंदी व्याख्याता
हैदराबाद, तेलंगाना
9703689892
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