(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन *स्वराभिषेक विचारों का* )
भीड़ में चलते हुए तनहा रही है ज़िन्दगी,
क्या बताएं कब कहाँ,क्या क्या रही है ज़िन्दगी,
जाने कितनी मुश्किलों से,रु-ब-होते रहे,
थक गए हैं अब क़दम,घबरा रही है ज़िन्दगी,
एक मिटटी का दिया तूफ़ान से लड़ता रहा,
बेख़बर था क़ह्र से टकरा रही है जिन्दगी,
ये कभी ख़्वाहिश न थी के भीड़ मेरे साथ हो,
क्यूँ भला माज़ी को फिर दोहरा रही है ज़िन्दगी,
दो क़दम आगे चले और एड़ियां कटने लगीं,
इसके मानी,ज़िन्दगी को खा रही है ज़िन्दगी,
भीड़ से तो बच गए अब क़ब्र ऑ तन्हाई है,
ज़िंदगी को बे-वफ़ा ठहरा रही है ज़िन्दगी...
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ज़मीं भी चाहिए मुझको,मकां भी चाहिए यारब,
बहुत खुशियों से वाबस्ता,जहां भी चाहिए यारब।
जहाँ ग़मगीन होकर कोई भी रोता न हो हरगिज़,
मुझे पुरजोश दुनियां का समां भी चाहिए यारब।
जहाँ मजनूँ की दुनियां हो,जहाँ लैला के किस्से हों,
कि तेरे दर की वो रौनक यहां भी चाहिए यारब ।
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© उर्मिला माधव
98737 72808
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