(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन "अक्षराभिषेक साहित्य का " )
होटल की लॉबी से निकलते हुए पोर्च में खड़ी टैक्सी में जिसको बैठते देखा था, सहसा यक़ीन नहीं हुआ । इन्दु यहाँ, मुंबई में ? आज सालों बाद उसे देखा था और आज भी दिल में कुछ कसक गया था। ढेरों सवाल एक साथ मन में हलचल मचा गए! क्यों आई है इन्दु यहाँ ? कहाँ है आजकल, क्या कर रही है, शादी की या........
मन उद्विग्न हो उठा। मेरी टैक्सी आ गई थी और मैं सेमिनार के लिए निकल पड़ा। दिन भर की गहमागहमी के बीच इन्दु के ख़याल ने पल भर को भी पीछा नहीं छोड़ा। शाम को बहुत जल्दी लौट आया, और आकर होटल की लॉबी में बैठ गया। सतर्क नज़रों से आने जाने वालों को देखता हुआ, शायद इंदु दिख जाए। इंतज़ार व्यर्थ नहीं गया था, एक डेढ़ घंटे बाद इंदु आती दिखी थी, साथ दो चार लोग और। कुछ पल खोया सा उसे देखता रह गया। आज भी पहले की सी ऊर्जा और ख़ुशमिज़ाजी से भरपूर ! हाँ, दुबला पतला बदन जरूर कुछ भर गया है और पहनावे में एक सलीक़ा आ गया है। इससे पहले कि फिर नज़रों से ओझल हो जाये, मैं बढ़ गया था उसकी ओर, और धड़कते दिल को क़ाबू में रखने की कोशिश करते हुए एक औपचारिक सा हैलो बोला था। इन्दु अचम्भित रह गई थी, अचानक मुझे यूँ सामने देखकर! उसके थोड़ा सँभलते ही कितने ही सवाल पूछ डाले थे मैंने।
वो अपने शहर में ही है, अपना ngo चलाती है, साथ ही डिग्री कॉलेज में लेक्चररशिप, बताया उसने। यहाँ एक अधिवेशन में हिस्सा लेने आई थी।साथ के लोग मुझे उसका पुराना परिचित समझ विदा लेकर चले गये थे।कहीं बैठकर बात करना चाहता था, तसल्ली से।इंदु ने वादा कर लिया था अगली शाम मिलने का।अब मुझे बेसब्री से इंतज़ार था कल का।
रात बडी देर तक नींद आँखों से कोसों दूर थी, मन था कि बीती बातों को किसी चलचित्र सा दोहरा रहा था। आज भी याद है जब इन्दु को पहली बार देखा था।मैं कॉलेज से लौट रहा था कि देखा, बाइक सवार दो लड़कों में पीछे वाले ने राह चलती लड़की का दुपट्टा खींचा और हँसते, फ़िकरे कसते हुए लड़के आगे बढ़ गए। जिसका दुपट्टा खींचा गया था वह तो सकते में आ गई, पर उसके साथ वाली लड़की ललकारते हुए लड़कों के पीछे दौड़ी। हुआ कुछ नहीं था, लड़के बाइक दौड़ाते हुए निकल गए थे, पर उस लड़की का तमतमाया चेहरा,उसका आक्रोश, उसका ललकारने का जज़्बा दिल पर छाप छोड़ गया था। यह थी इन्दु !
दूसरी बार उसे देखा था एक डिबेट में। देखते ही पहचान गया था वह आत्मविश्वास से लबरेज़ चेहरा, वह दृढ़ और प्रभावशाली आवाज़। उस दिन रोक नहीं सका था डिबेट के बाद उसे बधाई देने से, तभी जाना था उसका नाम, इन्दु ! दिखने में साधारण, मंझोला क़द, पर चेहरा आत्मविश्वास से दीप्त और हँसी बेहद मनमोहक। इस जान-पहचान में ही महसूस हुआ था कुछ पुरानी दोस्ती का सा इत्मिनान, कुछ सुकून, एक अलग सी ख़ुशी, जो पहले कभी किसी के साथ महसूस नहीं की थी।
यह ऐसा आकर्षण नहीं था जो किसी लड़की को देखकर महसूस होता है बल्कि ऐसा लगाव और अपनापन सा था जो अपने किसी बहुत क़रीबी इन्सान के साथ महसूस होता है।बहुत जल्द हम गहरे दोस्त बन गए थे। अक्सर मिलते और दुनिया जहान की बातें करते ,उसके साथ वक्त कब गुज़र जाता, पता ही नहीं चलता ।मज़े की बात यह कि हमारे मत बहुत सारी चीज़ों पर अलग होते,पर फिर भी हमारी बातों का सिलसिला अंतहीन था।
इन्दु बहुत अलग थी अौर लड़कियों से।सादगी से परिपूर्ण व्यक्तित्व,बेहद ज़हीन, संवेदनशील और खरी।कई बार अपनी साफ़गोई के चलते मुसीबत मोल ले बैठती, पर ग़लत बात पर चुप न रह पाती।मैं उसे समझाता कि थोड़ा व्यवहारिक होना ज़रूरी है और बहुत सारी बातों को नज़रअंदाज़ कर देना ही उचित होता है, पर कहीं न कहीं मैं उसकी इसी सच्चाई का क़ायल था।
विचारों में उसके जितनी स्पष्टता और प्रखरता थी, पहनावे में उतनी ही लापरवाही। ऐसा लगता था, कि जो हाथ पड़ गया वो पहनकर कॉलेज चली आती है। जींस के साथ ढीला ढाला ख़राब फिटिंग का कुर्ता या बेढंगा सा टॉप, या कभी चूड़ीदार के साथ अजीब प्रिंट का कुर्ता, न रंगों का सही संयोजन न डिज़ायन की कोई चॉइस, और मैचिंग सैंडिल, इयर रिंग्स, मेकअप वग़ैरह का तो सवाल ही नहीं। मैं कभी इस पर थोड़ा मज़ाक़ भी बनाता उसका, पर वो कभी इन बातों को गंभीरता से न लेती। और गंभीरता से कभी मैंने भी नहीं लिया। मेरे दिल को उजालों से भर देने को उसकी मुस्कुराहट ही काफ़ी थी।
प्यार ने कब दबे पाँव दस्तक दी थी, कब दिल इस ख़ूबसूरत एहसास से भर उठा था, पता ही नहीं चला।प्यार के तयशुदा मानकों से अलग हमारा प्यार,आपसी समझ और क़द्र की पुख़्ता बुनियाद पर विकसित हुआ था। इसे हम दिल की गहराइयों से महसूस कर सकते थे, जिसे कभी जुबां पर लाने की जरूरत नहीं महसूस हुई थी।
देखते-देखते दो तीन साल कब गुज़र गए, पता ही नहीं चला था, और मैं इंजीनियरिंग के फ़ाइनल ईयर में आ गया था।एग्जाम्स के साथ ही कैम्पस सिलेक्शन में ही प्लेसमेंट की पूरी उम्मीद थी मुझे। सोच लिया था कि प्लेसमेंट मिलते ही इन्दु के सामने शादी का प्रस्ताव रख दूँगा। सही मौक़ा देख एक दिन माँ को बताया था इन्दु के बारे में, और वादा कर लिया था जल्द ही उसे माँ से मिलाने का। और फिर वह दिन, जब उसे घर ले जाना था माँ से मिलवाने, मैं उसे लेने पहुँचा था।जब उसे देखा तो इतने सालों में पहली बार निराशा हुई थी उसे देखकर,आज भी वही रोज़ का रफ़ एंड टफ लुक! आज तो मैंने ये उम्मीद नहीं की थी। पहली बार माँ के पास ले जा रहा था, साड़ी न सही एक ढंग का सूट ही पहन लेती, एक बिंदी ही लगा लेती। मैंने उसे कभी टोका नहीं था उसके पहनावे की तरफ़ लापरवाह रवैये से, पर आज का दिन तो ख़ास था। माँ क्या सोचेंगीं?
अपेक्षा और निराशा......यह पहली दस्तक थी, हम दोनों के बीच इन दोनों लफ़्ज़ों और उनके मायनों की।
इन्दु अब असहज हो उठी थी। सच, मैंने तो सोचा ही नहीं था इस तरह, तुम्हीं पहले से कह देते थोड़ा बन सँवर के आने के लिये।
ख़ैर, हम घर पहुँचे थे और जितनी देर हम वहाँ रहे , मैं माँ के हाव-भाव और बातों से यही भाँपने की कोशिश करता रहा था कि मां इन्दु को लेकर क्या राय बनाएँगीं। समझ गया था कि माँ ढूँढती रही थीं सामने बैठी लड़की में अपनी बहू, अपनी गृहस्थी सौंपने लायक कुशल गृहिणी और वो निराश हुई थीं। बाद में जब पूछा था कि उन्हें कैसी लगी इन्दु, तो एक ठंडी साँस भरकर उन्होंने कहा था कि ठीक है। अगर मुझे पसंद है तो उन्हें भी पसंद है।
काश ! माँ ने असहमति जताई होती, कहा होता कि वो निराश हुई हैं तो थोड़ी तसल्ली हो जाती मुझे।पर उनकी मूक सहमति ने इन्दु की तरफ़ से मन में पहली बार एक खिन्नता पैदा की थी। मुझे बैंगलोर में प्लेसमेंट मिल गई थी और मैं चला गया था। जब भी घर आता, इन्दु के साथ मिलकर शादी की तारीख़ तय करना चाहता, पर हर बार कुछ वक्त और कहकर बात आगे के लिए मुल्तवी होती जाती। इन्दु ने स्नातकोत्तर के बाद पी एच डी में ख़ुद को एनरोल करा लिया था, धीरे धीरे उसकी व्यस्तताएँ बढ़ती जा रही थीं। रिसर्च के काम के साथ साथ उसकी बढ़ती हुई सामाजिक व्यस्तताएँ शादी को स्थगित करती जाती थीं। धीरे धीरे लगने लगा था जैसे हमारी प्राथमिकताएँ बदल गई हैं।और दो साल निकल गए थे,मुझसे छोटी रितिका की भी जॉब लग गई थी, और उसके जाने के बाद माँ अकेली पड़ गई थीं। जब-तब शादी के लिए टोक देतीं। मैं कहता कि आप मेरे साथ बैंगलोर चलकर रहो पर माँ कहती कि वहाँ जाकर भी तो अकेली सी ही रहूँगी,तुम दिन भर काम में व्यस्त रहोगे। हाँ, बहू आ जाए तो मन लगा रहेगा। मैं भी अब अधीर हो उठा था और ठान लिया था कि इस बार इन्दु के साथ शादी की बात तय करके ही लौटूँगा।
पर इस बार जब लौटा तो इन्दु व्यस्त थी एक एसिड अटैक विक्टिम की तीमारदारी में। तमाम एन जी ओ के चक्कर काटना, छात्रों से चंदा इकट्ठा करना, अस्पताल और पुलिस थाने के बीच चक्कर लगाते रहना।
थका-हारा सा मैं बोला था- इन्दु, आख़िर कब तक ? सारी दुनिया की पड़ी है तुम्हें, अपने बारे में कब सोचोगी, हमारे बारे में कब सोचोगी ?
मैं क्या करूँ तरूण, मुझसे अनदेखी नहीं की जाती। उस लड़की को अच्छी तरह जानती हूँ मैं, कैसे उसकी मदद से पीछे हट जाऊँ ? तुम चलकर एक बार देखो उसे, तुम भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पाओगे।
इसीलिये तो इन्दु, इसीलिये तो कहता हूँ कि मत देखो अपने चारों ओर। दुनिया में बहुत कुछ ग़लत है,क्या क्या सही करने निकलोगी?
मुझे नहीं पता तरूण,कुछ सोचकर नहीं करती हूँ ये सब।
सच कहो इन्दु, तुम शादी करना भी चाहती हो मुझसे? बार बार टालने का क्या मतलब है?
मैं तुम्हारा साथ चाहती हूँ तरूण, अपनी पूरी ज़िन्दगी तुम्हारे साथ ही गुज़ारना चाहती हूँ पर .....
पर क्या ? बोलो न इंदु, पर क्या...
सच कहूँ तो यह एक अघोषित सा फ़ैसला है कि शादी करके मैं तुम्हारे साथ बैंगलोर चली जाऊँ और अपना पूरा ध्यान अपनी गृहस्थी बनाने में लगाऊँ ।
हाँ तो, इसमें ग़लत क्या है? शादी का मतलब यही तो होता है ...
हाँ, यही होता है....पर मैं ख़ुद को उस ज़िन्दगी के लिये अभी तैयार नहीं पाती।अपना सब कुछ यूँ छोड़कर जाने की हिम्मत अभी नहीं होती मुझमें, शायद कुछ समय बाद तैयार कर सकूँ।
और कितना समय ? समय ही तो बीत रहा है इन्दु, और मैं बस इंतज़ार कर रहा हूँ । अब थक गया हूँ तुम्हारी राह देखते-देखते! तुम्हारे साथ जीवन शुरू करना चाहता हूँ, बस ।
इन्दु की आँखें डबडबा आई थीं। मेरी ओर कातर नज़रों से देखती हुई बोली थी- मैं भी तो वही चाहती हूँ न तरूण, पर जितने काम हाथ में हैं उन्हें किसी मुक़ाम तक पहुँचाने के बाद, अपने जीवन की दिशा ढूँढने के बाद.....
नहीं इन्दु, तुम ऐसा कुछ नहीं चाहतीं। शादी तुम्हारी प्राथमिकता में है ही नहीं।
समझने की कोशिश करो, शादी की शर्त यह है कि मैं अपना सब कुछ छोड़ दूँ और ख़ुद को गृहस्थी के लिए समर्पित कर दूँ । अगर यही शर्त तुम्हारे लिये हो कि मैं कहूँ नौकरी छोडकर यहीं आ जाओ मेरे पास, साथ मिलकर ज़िंदगी चलाने के लिए कुछ कर लेंगे, तब तुम क्या यूँ ही तैयार हो जाओगे शादी के लिये?
यह कैसी बात हुई भला? लगी लगाई जॉब छोड़कर आ जाऊँ एक अनिश्चित भविष्य के लिये, तुम्हारे साथ दर-दर भटकने के लिए? आख़िर किस तरह सोचती हो तुम ?
फिर जितनी बातें हुई थीं, उनका कोई नतीजा नहीं निकलना था।
मैं मुड़ आया था वहाँ से इन्दु को पीछे छोड़, उसकी भीगी आँखों में तैरते सवालों को पीछे छोड़ .......
जिस तरह बिना कहे एक दूसरे की ज़िन्दगी में आ गए थे हम दोनों, उसी तरह बिना कुछ कहे एक दूसरे की ज़िन्दगी से ओझल हो गए थे....
फिर मैं उससे नहीं मिला था।
माँ के शादी का सवाल फिर उठाने पर एक दिन कह दिया था कि वे लड़की देख लें, और जहाँ ठीक समझें शादी तय कर दें।
माँ की आँखों में उभरता सवाल ......और इन्दु ?
पर मैं चुप रह गया था। माँ को भी शायद इत्मिनान हुआ होगा कि अब वे अपनी पसन्द की बहू ला सकेंगीं।
और बहुत जल्द निहारिका आ गई थी जीवन में । सुन्दर, सुघड़, मिलनसार बिलकुल माँ की अपेक्षाओं के अनुरूप।माँ की व्यवस्थित गृहस्थी निखर आई थी निहारिका के कुशल हाथों के स्पर्श से, और घर खिल उठा था। माँ और रितिका बेहद ख़ुश थे उसे पाकर।
और मैं जैसे अपना पूरा वजूद एक शून्य में घिरा हुआ पा रहा था।
निहारिका थी, जैसे खिलती बहारों का मौसम अपने पूरे शबाब पर हो, और मेरे मन पर सिर्फ पतझड़ छाया था। एक गहरी उदासी कई पर्तों में जमकर बैठ गई थी मन पे, जो किसी ऊष्मा से न पिघलती थी।
शादी के शुरूआती दिन, निहारिका के हँसने मुस्कुराने, चहकने के दिन....और मेरे उसके साथ उसकी उमंग में न बह पाने के दिन.....
अंतरंग क्षणों में भी मेरी अन्यमयस्कता न जाती।पति पत्नी का रिश्ता तय परिभाषाओं के तहत क़ायम हो गया था, पर इस प्रत्यक्ष रेखा के परे निहारिका की मेरे क़रीब आने की कोशिशें मुझे असहज कर जातीं। वह आई थी कोरे काग़ज़ सा दिल लेकर, जिस पर पूरे समर्पण के साथ उसने मेरा नाम लिख लिया था, पर मेरा दिल वो किताब था जिसके हर पन्ने पर इन्दु का नाम लिखा था। उसे पीछे बेशक छोड़ आया था, पर दिल से कहाँ निकाल सका था।
निहारिका धीरे-धीरे भाँप गई थी मेरी अन्यमयस्कता को, क्योंकि अब वो पहली सी चपलता न दिखती उसमें। सुंदर चेहरा कुछ मलिन सा प्रतीत होता, काम सब अब भी करती पूरी मुस्तैदी से पर उसमें उत्साह न दिखता।
मन ग्लानि से भर उठता, ख़ुद पर खीझ होती। यही तो चाहा था, घर गृहस्थी को समर्पित पत्नी, तो अब क्यूँ ख़ुश नहीं हूँ, क्यूँ निहारिका को ख़ुश नहीं रख पा रहा हूँ।
दूसरी तरह सोचता तो इन्दु के प्रति भी ख़ुद को अपराधी पाता। नहीं थी वह पारम्परिक साँचे में फ़िट होने वाली लड़की, नहीं बन सकती थी सिर्फ गृहस्थी को समर्पित पत्नी तो क्या सही था उसे छोड़ देना? क्या मैं नहीं चल सकता था उसके साथ, उसकी राह ?
जितना सोचता उतना उलझता जाता, इसलिये भरसक व्यस्त रखता ख़ुद को। दिन बस यूँ ही गुज़रते जा रहे थे,और हफ़्तों महीनों का सफ़र तय कर सालों में बदल गए थे।
एक रात निहारिका मेरे सीने पर सर रखकर आ लेटी, और एक गर्म आँसू मेरे ठंडे दिल पर पिघलते लावे सा गिरा। "आप मुझसे प्यार नहीं करते" निहारिका सुबक रही थी।
अरे, ऐसा क्यों कह रही हो? क्यों लगा तुम्हें ऐसा ? मैं असहज हो उठा था क्योंकि ऐसी परिस्थिति के लिए तैयार नहीं था।
यही सच है, आप ख़ुश नहीं हैं मेरे साथ....
क्यों लगता है तुम्हें ऐसा? क्या मैं तुम्हारा ख़्याल नहीं रखता, तुम्हें किसी चीज़ के लिये परेशान करता हूँ ?
यही तो बात है, न आप किसी चीज़ की कमी रखते हैं ,न मुझे किसी चीज़ के लिये परेशान करते हैं । एक तटस्थ और औपचारिक सा रिश्ता है आपका मेरे साथ।
निहारिका, ऐसा मत सोचो....मेरा स्वभाव ही ऐसा है...
नहीं, एक अनमनापन महसूस करती हूँ आपके अन्दर । आप ही बताइये, बिस्तर के अलावा कभी छूते हैं आप मुझे, कभी मेरे क़रीब आते हैं? ऑफ़िस आते जाते भी कभी आलिंगन तक नहीं....मेरी सहेलियों के पति तो कितना उनके इर्द गिर्द मँडराते हैं, एकांत के बहाने ढूँढते हैं...
ओह निहारिका, तुम बहुत भोली हो। सब लोग एक से नहीं होते, न ही सब रोमांटिक हीरो की तरह पेश आते हैं। इन सब छोटी छोटी बातों के आधार पर तुमने सोच लिया कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता ? अरे पगली, इन सब बातों को दिल से निकाल दो और ख़ुद को परेशान करना बंद करो। बहुत प्यार करता हूँ तुमसे, समझी ? चलो अब आंसू पोंछो और मुस्कुरा दो।
और उसके आंसू पोंछ मैंने उसे अपने आग़ोश में भींच लिया था। निहारिका के बालों में उँगलियाँ फिराता मैं जैसे अपने ही मन के कटघरे में खड़ा था, उसने जैसे मुझे रंगे हाथों पकड़ लिया था।
इन्दु के साथ ये छोटे छोटे स्पर्श कितने सुखद लगते थे। उसके माथे पर घिर आई लट को अपने हाथों से हटाना, गाहे-ब-गाहे उसका हाथ थाम लेना, यहाँ वहाँ सतर्कता से देख उसके होंठों या गालों पर एक छोटा सा चुंबन रख देना।अपराधबोध फिर घिर आया था, और सोई हुई निहारिका का सिर सावधानी से तकिए पर रख करवट बदल सो गया था। कितना भी ख़ुद को दोष देता रहूँ पर निहारिका के साथ चाहकर भी उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नही चल सकता था। ज़िन्दगी एक ढर्रे पर चल निकली थी, और उसे ऐसे ही चलते जाना था।
सोचते सोचते थक गया था, और अब सो जाना चाहता था। कल इन्दु से मिलूँगा तो क्या क्या बात करूँगा । आज ये भी पूछना याद नहीं रहा था कि उसने शादी की या नहीं, उसे किसी के साथ जोड़कर आज तक देखा ही नहीं। मैंने आँखें मूँद ली थीं, कल के इंतज़ार में ।
अगले दिन शाम को आ बैठे थे हम एक रेस्टोरेंट में टैरेस पर पड़ी कुर्सियों पर। कुछ ही दूर मुंबई का समन्दर साँझ की लालिमा अपने में समेटता हुआ सिन्दूरी हो उठा था। हवा ने बालों की एक लट उड़ाकर इन्दु के माथे पर बिखेर दी थी और मेरा हाथ बढ़ गया था उसे सँवारने के लिए, यकायक सजग हो बढ़ा हुआ हाथ रोक लिया था। बरसों बाद भी पुरानी आदतें कैसी स्वाभाविकता से ख़ुद को दोहरा देती हैं।
इन्दु ने एक सहज सी मुस्कुराहट के साथ पूछा था- और कैसी चल रही है ज़िन्दगी ?
सब ठीक, मैं बोला था- तुम सुनाओ।
यहाँ वहाँ की कुछ बातों के बाद वो पूछा था जो कल से पूछना चाहता था।
और शादी ......?
हाँ क़रीब एक साल होने को आया । मैं और संजय मिलकर एक एन जी ओ चलाते हैं,पिछले दो तीन सालों से ।
एक बात पूछूँ , बुरा तो नहीं मानोगी ?
नहीं.....पूछो
मेरे प्रति कोई नाराज़गी है मन में ?
नहीं, नाराज़गी क्यों होगी ?
फिर भी....
नहीं तरूण, ऐसा बिलकुल भी नहीं । हाँ , बहुत मुश्किल था तुम्हारे बिना जीना पर संभालना ही था न ख़ुद को। काम इतने पहले से ही थे करने को, फिर और व्यस्त करती गई ख़ुद को।
एक बात और ....
हाँ कहो
अतीत कभी बाधा नहीं बना तुम्हारी शादी में ?
कुछ पल ठहरकर इन्दु बोली थी, अतीत एक सच है, उतना ही जितना कि वर्तमान सच है। संजय के साथ शादी बहुत बाद में हुई, हम साथ काम करते रहे हैं काफ़ी समय तक। उनसे तुम्हारे बारे में बहुत बातें की हैं....संजय के लिये तुमसे जुड़ी सब बातें वैसी ही हैं जैसे मेरी ज़िन्दगी से जुड़ी और बातें...
ओह...यानि अतीत को पीछे छोड़ चुकी हो ....
अतीत का तो मतलब ही बीता हुआ होता है न तरूण ?
हम्म...ठीक कहती हो इन्दु। पर मैं नहीं कर सका ऐसा। तुम्हें भूल नहीं सका कभी, मेरे वर्तमान पर अतीत की छाया हमेशा बनी रही।
शायद ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि तुमने अतीत को बीतने नहीं दिया...अपनी पत्नी को बताया तुमने मेरे बारे में ?
नहीं, क्योंकि इसकी जरूरत नहीं लगी...
तुम्हें बताना चाहिये था। ख़ुद को और उसको कुछ वक्त देना चाहिये था रिश्ते में बँधने से पहले....
शायद तुम ठीक कह रही हो....क्या अब बता दूँ उसे ?
हाँ तरूण, उसे सब बता दो...उसके मन में जितने सवाल हों उनका जवाब दो, कुछ वक्त गुज़र जाने दो....बीत जाने दो गुज़रा हुआ सब...अतीत को अतीत हो जाने दो, और फिर एक नई शुरूआत करो ज़िन्दगी की....
कुछ देर चुप बैठा रह गया था इंदु की बात सुनकर.....क्या मुमकिन है अब भी एक नई शुरूआत ? वैसी ज़िन्दगी निहारिका के साथ, जैसी उसने चाही थी, जो उसका हक़ थी । हमारे बीच की ये कुछ लम्हों की चुप, सर्द हवा का ख़ामोश बहना और शाम का चुपचाप ढलना......ये ख़ामोशी भी कितनी सुखकर थी हमारे बीच की। बहुत देर बैठे रहे थे हम दोनों यूँ ही.... शाम ढल चुकी थी और रात धीमे क़दमों से उतर रही थी, मुंबई शहर की असंख्य रोशनियाँ समन्दर में झिलमिला उठी थीं। आज के बाद फिर शायद इन्दु से मैं जाने कब मिलूँगा, मिलूंगा भी या नहीं पर इस एक मुलाक़ात ने दिल की ख़लिश मिटा दी थी, उलझी गिरहें सुलझा दी थीं ।
इन्दु की फ़्लाइट दस बजे की थी और मेरी उसके एक घंटे बाद की। एयरपोर्ट के लिये हम साथ ही निकले थे। बोर्डिंग पास लेकर इन्दु सिक्योरिटी चेक के लिए लगी क़तार में आगे बढ़ गई थी। बीच-बीच में मुड़कर मुझे देख लेती। इस बार जब मुड़ी तो मैंने हाथ हिलाते हुए जैसे अपने आप को सुनाते हुए कहा था- अलविदा इन्दु ! जैसे ख़ुद को इत्मिनान दिला रहा हूँ कि मैंने सचमुच उसे अलविदा कहा है। हाँ, आज मैंने उसे अलविदा कह दिया था।
और मैं मुड़कर चल दिया।
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© डॉ आराधना भास्कर
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