Saturday, March 23

होली... होली... होली - अमिता "मिता" (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *वंदना प्रीतम* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का" )

   (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *वंदना प्रीतम*  कृत साझा संकलन   "स्वराभिषेक विचारों का"  )  






   होली... होली... होली
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(1)


होली का आया है त्यौहार......रंगों की रंगीली फुहार

सतरंगी रंगों में भीगा... हर रूप ..आज है एकाकार


जाँति-पाँति और ऊँच-नीच, कुल-रंग और धन के वो भेद

होली के रंगों में घुलमिल..खिल उठते.... मानवता होकर


हर मन-मुटाव मिट जाता है..होली में मिलो गले लग कर

शत्रु... शत्रुता भुलाता है.... होली में मित्र ...हो जाता है


रंगों का धनक चमकता है.... हर हृदय को..... हर्षाता है

हर वर्ष.... उमंगें उत्सव की... सदभाव परस्पर ..आता है


कच्चे रंग की... पक्की होली..... मन सतरंगी हो जाता है

ये फागुन का मौसम..देखो..तन-मन...सब भीगा जाता है


(2)


थी मेरे बचपन की होली.. कितनी सुन्दर.. कितनी भोली

वो मस्त रंग और राग कहाँ, वो बीते दिन अब आज कहाँ


वो रंग,अबीरगुलाल कहाँ वो भंग के संग की..चाल कहाँ

होली की टोली आज कहाँ! बचपन में थी वो बात कहाँ


अब रंग-रंगीली सी होली..... सपनों जैसी... बात हो गई

टेसू के फूलों की सुगन्ध भी... बाबूजी के साथ... खो गई


अम्माँ... हफ्तों से जुटी हुई.. भर रहीं कनस्तर. गुझिया से

कुरकुरी कुरकुरी. दालमोठ.. ख़स्तों.. ख़ुरमोंऔर मठरी से


थक जातीं अम्माँ दिन भर, बच्चों के नये वस्त्र सिल कर

 शिकन न चेहरे पर दिखती, होली के सुन्दर अवसर पर


अतिथि-स्वागत में बाबूजी, घर-बार भुला देते जैसे

हँसते हम बच्चे चुपके से,  जब बाबूजी..आतुर दिखते


मौसी  मामा, बुआ चाचा, सबकी जमघट सी मच जाती

आँगन में हैं सब.. सराबोर... उलझे रंगों में ...सभी ओर


सुन्दर सी भाभी को रंगने..... सब टूट पड़े.... देवर-ननदें

जीजा-साली की मची धूम... छूटे न कोई...... किसी तौर


बहनों के हाथों से गुलाल.... लड़ कर ले भागे भाई आज

रोने लगती.... नन्हीं गुड़िया... भाई को होता है ...मलाल


रिश्तों -सम्बन्धों की टोली... बन्धन के रंग ही... रंग लाते

प्रियतम-प्रियसी भी रूठें तो....रंग होली के ही... मनवाते


(3)


हम बच्चों की टोली देखो, निकली अब गली-मोहल्लों में

दो टोली मिली, हुड़दंग मचा.... होली रे होली.... होली रे


मच गई सड़क पर भाग-दौड़...बचने वालों को कहा चोर

आलू के ठप्पों से लिखा.. उल्लू... गदहा.. पढ़ लोट-पोट


हर द्वार पे स्वागत  टोली का.. ये गोप - गोपियों की टोली

घर घर में मिश्री-माखन खा....होली की देते.... धूम मचा


ढोलक पर ऐसी पड़ी थाप, सब ओर नाच उट्ठा है फा़ग

ब्रज की होली के छिड़े राग़, सब राधे-कृष्ण हो गए आज


ढपली मुरली तबला मृदंग, जा कर ले आओ.. सभी साज़

मन की तालों पर थिरक गया, होली पर रीझा हृदय आज


(4)


दो जोड़ी... खोई सी आँखें...बचतीं हैं.. सबकी आँखों से

होंठों से करतीं हैं स्वागत....रंगों से बचा -बचा... आँचल


कोई एकाकी मन लेता चुपके से..... आँखें पोंछ - पोंछ

वो दीन सुदामा सा दिखता, खो गया है कृष्ण कहीं जिसका


कितने सुदामा...  राधा, मीरा, विरहा का सच जीते  जाते

होली के रंग में भंग न हो, अपनों में खुशियाँ..... बरसाते


खुशियाँ बाँटे...जो होली में, अपने एकाकी मन को भूल

ऐसे हृदय   ! अब आज कहाँ..बीती होली सी बात कहाँ


न लाल गुलाल...न ही अबीर... न खेला तन कोई भी रंग

आँसू के रंगों में घुलता....इस फ़ागुन में भी .....कोई जन


(5)


कुछ होली से करते नफ़रत.,देखा गुलाल.. चढ़ गई नाक

बैठे हैं मन में लिए ऐंठ., .रंग उन्हें कोई न छुए...आज


घर में छुप...झाँकें कोई नयन, खेले होली वो मन ही मन

ये कैसी आँख-मिचौली है...भीतर है तन.... बाहर है मन


चाहत है....कोई जबरन ही, गालों पर रंग जाए ...गुलाब

न छूटे....ऐसा रंग -रंगे....... मिल जाए जीवन का शबा़ब


होली के रंगों का धोख़ा... प्रियतम ने प्रियसी को देखा

न उतरे नशा कभी जिसका... सोलह बंसत की वो होली


अब नयन झरोखे.... हुए बन्द.... चेहरे पर आए  कई रंग

झट छिड़का चुटकी भर अब़ीर होली के रंग से करी ओट


(6)


दोपहर ढले.....लौटे घर सब, बैठी बुआ.... उबटन लेकर

बारीबारी से पकड़धकड़, मलतीं हैं कस कस कर उबटन


अम्माँ से नये वस्त्र लेकर..... बारी से दौड़े .....स्नानागार

संध्या का समय अति सुन्दर... सबने पहनें हैं...नये वस्त्र


होली का हुल्लड़ शान्त हुआ, मन में उल्लास खुशी भरकर

हर भेदभाव को भूलभाल... मानव- मानव हो मिले आज


संध्या - सिन्दूरी होली की, करती स्वागत है नया आज

स्नेहिल निर्मल मन मिलते हैं, बदला समाज का रूप आज


हिन्दू सिक्ख ईसाई मुस्लिम लग गए गले ये वो शुभ दिन

जो ...रंग दे सबको एक रंग..... हर ईद रहे ऐसा ही दिन


(7)


रंगों का जो है रूप आज..... होली को कितना है मलाल

त्यौहार की ग़रिमा दूर बात... गिरता है कीचड़ में समाज


निर्लज्ज नयन.. दूषित है मन..... होली ये कैसी हुई नग्न

चोरी करते सब रूप रंग, लुटने को व्याकुल.... दिखे ढ़ंग


निज को ऊँचा कहने वाले..... कितना नीचे गिर जाते हैं

मिलते हैं गले उन्हीं से जो..... कुछ उनके काम बनाते हैं


रंग कूटनीति का ग़हरा है.... हर वर्ग.... सोच कर खेला है

कैसे सीधा हो उल्लू अब ..... किन रंगों में..... खेलें होली


अब क्या उत्सव.कैसी होली, न स्वागत करता कोई आज

बन्द द्वार हृदय के कर बैठा, प्रगति की कोशिश में समाज


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© अमिता "मिता"

93904 16665

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