(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन "अक्षराभिषेक साहित्य का " )
उसका होना जैसे कभी
होना था ही नहीं
बस एक आभास भर था
मंदिर की घंटी जैसा
उसका अस्तित्व दूर दूर तक
जाने कितनों के जीवन में
सुकून पहुॅंचाता है
मस्जिद की अजान-सा
उसका व्यवहार
न जाने कितनो के हृदय को
आत्मिक-सुख से भर जाता है
सागर जैसा उसका व्यक्तित्व
जानें कितनी चंचल नदियों को
अपने आकर्षण में बाॅंधकर
समर्पण करवाता है
देवता-सा उसका बाहरी आवरण
इतना सशक्त है कि
उसके अंदर का राक्षस
सबके समक्ष अदृश्य है
परिचित हूॅं उसके रहस्यों से
सक्षम हूॅं देव रूप खंडित कर
उसकी अनदेखी असुरता
दुनिया के प्रत्यक्ष लाने की
मगर.......
कुछ कमजोर लम्हें मेरे
कैद हैं उसके इर्द-गिर्द
इसीलिए अबला बन
नतमस्तक होती रही हूॅं
बहुरंगी मुखौटे के समक्ष बार-बार
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© वीणा अब्राहम सिंह
73512 70915
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