(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ' "अक्षराभिषेक साहित्य का " साझा संकलन से)
खैरखा बर पेरा हा कहाँ ले पुरही,
जब साल पुट लईका के गिनती हा जुडही।
रतिस एक झन टूरा अऊ एक झन टूरी,
तब तोरो घर मां दू बेरा चुरतिस खपूर्री।
कनिहा हा टूटगे इहाँ बढत महँगाई मां,
चमडी हा बेचागे बियाज के भरपाई मां।।
बुध सिरागे गिरहस्ती के गाडी कैसे चलही,
ठौकच बनही ए पैत टूरा चुनाव लडही।
संसो हाबे कते बखत मोर टूरा नेता बनही
छुछूवावत लमेठवा मन आघू पीछू घुमही।
मनखे ला बिचार के दिस दू हाथ अऊ पाँव
बने करम करके भुइयाँ मा सरग बोहाही।
फेर का जानिस बिचारा गढहैया हा,
इहाँ मनखे हा जीऐ बर मनखे ला खाही।।
काली भोंदू के ददा खईस दू गडी शक्कर,
आँखी कान मुंदागे आगिस ओला चक्कर।
डॉक्टर के किरपा से पराण ओखर छूटगे,
भाई भौजी सब्बोच के गिरहा हा टूटगे।।
हाडा लेगिस बेटा हा गंगा में बोरे बर,
बकवागे टूरा पंडा के मोलभाव ला देखके।
गोठियाबे त गोठ बनथे कतिक ला सुनावो,
नाडा भर में टूरा अईस तीरथ ले लहुटके।।
रांँव झाँव जगा जगा रोजी पानी के जुगाड़ मां,
लुटागे सिधवा मनखे परदेशिया के आड मां।
आवक ले जादा इहाँ खरचा हा जूडथे,
पेट काट के पढैहा के फीस बर पूरथे।।
गदहा असन लादे लादे लईका हा खियागे,
किताब के मरम जाने बिना परीक्षा देवागे।
हाल बीजा कोनो में नइये दूनो देदिस दगा,
मास्टर ले नाहकगे लईका फैशन में जादा।
नँदागे धोती कुरता अऊ गाँधी के खादी,
फैशन के मारे टूरी के तोपावत नइये छाती
टूरी टूरा एक्के होगे ये इक्कीसवीं राज मां,
होरा असन भुंजावत हे सब्बो साधेसाध मां
समझाय ले कोनो माने नाही रैंगथे बरपेली
झगरा में सँघेरथे बाम्हन कलार अऊ तेली।
फूट डारे बर हुँशियार हे कतको भ्रस्ट नेता,
दोंदर भरके अपने हा कहावथे धरती बेटा।
तब काकरो आँच पाँच मां झन राहो,
नई आवय काम झूठ अऊ लबारी।
साँच के रद्दा में सब चलहू ताहन,
दुनिया घुटना टेंक दिही झखमारी।।
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© डाँ. रेखराज सुमरण साहू
(जुनवानी धमतरी)
ग्राम रावनगुडा पो.पुरी
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