(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का" )
मैं प्रवेश द्वार पर पहुंचा,गार्ड ने मेरे कपड़े देखे और डपट के कहा, " यहां ' विविधता में एकता ' वाला कोई नाटक नहीं चलेगा , सबको एक ही रंग के कपड़े पहनने होंगे! और तुम्हारी क्लर्क वाली टोपी कहां है ? "
मैंने कहा " पहचान पत्र लाया हूं, क्या वो पर्याप्त नहीं ? और टोपी का कोई तुक तो हो कि पहनी जाए "
गार्ड " हमें तो ऊपर से आदेश है, तुक से क्या मतलब ,कल से पहन के आइए वरना प्रवेश नहीं दिया जाएगा"
मेरी गर्दन झुक गई,शर्म से नहीं,उसकी ज़हालत के बोझ से । मैं आगे बढ़ा,परिवेश की हवा इतनी भारी मालूम हो रही थी मानो नसों पर पांव धर कर रक्तचाप बढ़ा रही हो। मैंने कुछ ख़बरें सुन रखी थीं कि यहां कई बार टांग इतनी ज़ोर से धर दी जाती है, कि रक्त की चाल ही बंद हो जाए,परंतु मुझे इसका कोई उल्लेखनीय अनुभव नहीं था। ख़ैर ,
मैं आगे बढ़ा । यकायक मुझे मेरे सामने से सुनीति और प्रयोजन जाते हुए दिखाई दिए । मैं चिल्लाया " ओय!" जब अभी अभी मन खिन्न हुआ हो,तब कोई खिन्नता बांटने वाला मिल जाए तो ऐसा लगता है जैसे धूप में फुहार आ गई हो।उन्होंने भी मुझे देखा और पास आकर मेरी ख़ैर ओ ख़बर ली।
सुनीति ने पूछा," तुमने मैनेजर द्वारा दिया गया काम मुकम्मल किया? मैंने तो नहीं किया,"
मैंने कहा, " ओह! वो! मैं भी नहीं कर पाया,अब क्या होगा !"
प्रयोजन ने हंसते हुए युक्ति सुझाई " घबराने की क्या बात है,पहले कहीं बैठकर काम ख़त्म कर लेते हैं,फिर मैनेजर से मिल कर उसे काम सौंप देंगे "
सुनीति, " अरे बैठने की जगह ही कहां है, पूरी कंपनी में अधिकारी खुद बैठ जाएं यही बहुत है, वे यहां ऐसे रहते हैं जैसे १२ वीं के छात्र हॉस्टल में रहते हैं,एक कमरे में ४ । हम क्लर्क लोग तो भले तस्वीर की तरह दीवार से चिपक जाएं,तब भी कोई आकर टोक ही देगा " ए, भीड़ क्यों है इधर .." और यहां सफाई कर्मचारी हैं ही कहां, कि बैठने के लिए कोई स्वच्छ स्थान मिल सके । जितने सफाई कर्मचारी हैं,सारे तो अधिकारियों के पी. ए बन चुके,किसी कागज़ पर दस्तख़त कराने हों तो पहले चपरासियों को अफसर समझना पड़ता है।असली चपरासी तो हम क्लर्क हैं,जब खाली हों,घांस छीलने के काम में लगा दिए जाते हैं।"
हम ऑफिस पहुंचे और हमने एक सुदूर,सुरक्षित, मटमैले स्थान को चुन लिया।वो स्थान हमारी फूंक से अपना बदन साफ़ होने की राह देख रहा था। हमने उसकी इच्छा पूरी की और वहीं बैठ गए।
प्रयोजन ने कहा " ये स्थान सुरक्षित है,यहां कोई नहीं टोकेगा" मैंने भी मस्ती में कह डाला।
" बमबारी कभी भी हो सकती है" और हम सबने एक औपचारिक हँसी हंस दी। यह कोई मौलिक और हंसी को उद्दीप्त करने वाला कथन था भी नहीं जिससे हंसी की मोटर स्टार्ट हो जाए।
सुनीति ने चुटकुलों का सिलसिला बढ़ाते हुए कहा "और यहां कोई टोकने आयेगा भी तो यह नहीं पूछेगा कि मिट्टी में क्यों बैठे हो, वह केवल यही कहेगा कि तुम लोग बैठे क्यों हो! हा हा हा " सुनीति हंसने लगी।
प्रयोजन -" कोई मूर्ख ये न पूछ ले कि तुम लोग हो क्यों ! "
मैंने कहा " नहीं नहीं ,वो पूछेंगे - क्या तुम ,लोग हो?
एक ठहाका गूंजा और हम लोग अपने काम में लग गए।
बेगारी पूरी हुई, तो ज़रा चहलकदमी की सूझी,एक कमरे में मैनेजर दिखाई पड़ गए। वे किसी अध्यापक की तरह खड़े हो कर कुछ समझा रहे थे और सामने बैठे कर्मचारी उस विद्यार्थी की तरह सुन रहे थे,जिसे पता हो कि सामने खड़ा शिक्षक अनर्गल बक रहा है।
मैंने ध्यान से सुना, वे कह रहे थे, " सुबह असेंबली में पहुंचकर कंपनी की स्तुति करना अनिवार्य है। कल छुट्टी है ,फैक्ट्री बंद रहेगी ,परंतु आना अनिवार्य है नहीं तो हाज़िरी पर असर पड़ेगा । किसी भी सेमिनार में भीड़ बढ़ाना आवश्यक है, इससे कंपनी का नाम होता है, भीड़ बढ़ाने के लिए आप अपने मित्रों को आमंत्रित कर सकते हैं"
कुछ कर्मचारी यूं सुन रहे थे,जैसे वे लाखों बार सुन और देख चुके हैं ये सब,और कुछ ऐसे आशावादी विद्यार्थियों की तरह सुन रहे थे, जो किसी काम की बात के सुनाई देने के इंतजार में रहते हैं । उनकी दृष्टि मैनेजर को इस भ्रम में डाल रही थी कि वह एक उत्तम वक्ता है और लोग उसे सुनना पसंद करते हैं। मैं मैनेजर के बाहर आने का इंतजार कर रहा था। तभी मैंने देखा ,एक इंस्पेक्शन टीम का मेंबर, एक क्लर्क और उसके साथ खड़ी एक महिला ,की तस्वीर खींच रहा है। मैं ज़रा पास गया।
मेंबर -" यह तस्वीर हेडक्वार्टर भेजी जाएगी। तुमने जुर्म किया है।"
व्यक्ति " कौन सा ?
मेंबर " विपरीत लिंग से नहीं बात करने का नियम तोड़ना ।
व्यक्ति - "प्रोजेक्ट के संबंध में बातचीत हो रही थी। सरेआम संभोग तो कर नहीं रहा था। और वैसे भी,इस नियम का कोई तुक है? "
मेंबर- " तमीज से बात करो, मैं तुम्हारा सर गद्धू चंद हूं । बचना चाहते हो तो सीधे हेडक्वार्टर जाओ,बहस न करो। और ए लड़की तू भी नियम तोड़ रही थी,चलो भागो यहां से दोनों।"
मुझे बाद में पता चला था कि उस लड़के की बात कहीं नहीं सुनी गई। सबने ' इसकी टोपी उसके सर' वाली नीति अपनाई और वह व्यक्ति दिवाली की चकरी की तरह घूम घूम कर बुझ गया।
इस प्रसंग के बाद मैं वापस मुड़ा।थोड़ी दूर चलकर मुझे मैनेजर सामने दिखाई पड़े। मैंने कहा " नमस्ते " । उन्होंने "कैसे हो? " में जवाब दिया। फिर ऑफिस में बुलाया और कुर्सी पर बैठते ही बोले " मेरा वह काम तुमने कर दिया होगा ! उसे टेबल पर रख दो। और सुनो! अगले सप्ताह तक प्रोजेक्ट - पी ,जमा कर देना ।"
मैंने कहा " सर ,मैं उसको एक अच्छी शक्ल देना चाहता हूं,जिससे नये आयाम खुल सकें।नई जानकारी इकट्ठी हो और यह जन साधारण के काम आ सके,नहीं तो इतना समय देने का लाभ ही क्या!इसके लिए मुझे ,और स्टडी करनी होगी..."
मेरी अगली सांस के ,शब्दों में परिवर्तित होने से पहले ही मैनेजर सरकचंद भैंसू ने मुझे टोका। " नो!,नहीं!,इतना समय नहीं है। मैं जमा करवा दूंगा ,तुम बस कागज़ काले कर लाना। ताकि तुम भी जल्दी फ़ारिग हो जाओ और मेरी भी पदोन्नति हो।"
मैं शांत रहा । मैंने बिना कुछ कहे,शारीरिक मुद्रा से ही जाने की अनुमति मांगी और चला गया।
सुनीति और प्रयोजन कमरे के बाहर ही मिल गए। उनके लिए यह अनुभव नया नहीं था । सुनीति -" यहां ऐसा ही होता है, इन लोगों की जुबां से निकले जूठे शब्द,अपने पवित्र हृदय पर मत लगाया करो। जैसा जब तक चले, चलने दो। कीचड़ के पुतले से लड़ने पर,हाथ मैले होने का डर रहता है।"
प्रयोजन - " और इस कंपनी के बारे में बात ही मत करो, नसें फटने लगती हैं।"
मैंने दोनों को चलने के लिए कहा। काम पूरा हो चुका था। उन्होंने मजबूरी जताई कि उन्हें सीनियर मैनेजर का इंतजार करना होगा,वह आकर कोई चार्ट देने वाला है, जिसकी फोटो कॉपी करवाकर दोनो को मिलकर उसमें कंपनी संबंधित कुछ सूचनाएं भरनी हैं। यह माथा फोड़ काम एक के बस का था भी नहीं। मैंने कहा ,"क्या मैं भी करवा लूं? "
प्रयोजन - अरे नहीं यार,अपना वक्त बर्बाद मत करो,तुम चले जाओ,हमें कहा गया है सो हम ही रुकेंगे। सुनीति और मैं मिलकर काम निपटा देंगे।"
मैंने कहा " चलो ठीक है"
और दोनों से हाथ मिलाकर चल दिया।
मैं डरते डरते प्रवेश द्वार के बाहर निकला। थोड़ी दूर जाते ही मुझे अपने बटुए से अपना पहचान पत्र निकाल कर देखने का मन हुआ।
मैंने निकाला और देखा, वह पुराना वाला था, समय की दृष्टि से पुराना नहीं,स्मृति की दृष्टि से पुराना। उस की स्मृतियां धुंधला चुकी थीं। उस पहचान पत्र में नया पद कहीं नहीं लिखा था।उसमे उसी पहचान का उल्लेख था जिसकी हैसियत से मैं इस कंपनी में आया था।
उसमें लिखा था,
प्रितवज्र गौतम,
शोध छात्र,
हिन्दी विभाग
और पहचान पत्र के सबसे ऊपर यूनिवर्सिटी का नाम था,वही नाम जो प्रवेश द्वार के बाहर एक बोर्ड पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था।
मैंने पीछे मुड़ के देखा
" गधा कंपनी यूनिवर्सिटी "
मैंने तुरंत अपनी गर्दन घुमाई। मुझे डर था कि कहीं पीछे मुड़ने पर कोई मेरा पहचानपत्र न छीन ले। और उसके लिए मुझे ऐसा संघर्ष करना पड़े जैसा मुवक्किल को अदालत के चक्कर काटने में करना पड़ता है। मैं तेज़ चलने लगा और अपने किराए के कमरे को जाने वाले रास्ते पर मुड़ गया।
वही कमरा जहां एक कागज़ का गट्ठा मेरा इंतजार कर रहा था। वही गट्ठा जो विद्यार्थियों की सृजनात्मकता छीन लेता है। और शिक्षण संस्थान के नाम पर फैक्ट्री चलाने वालों की पदोन्नति करता है। वही गट्ठा जो शोधार्थियों को क्लर्क और प्रोफेसर को लालची मैनेजर बनाता है।
विकास गौतम
99385 14872
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