(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *संजय कुमार पांडे * कृत साझा संकलन "अक्षराभिषेक साहित्य का " )
बिदाई
मां, ओ मां, मेरी प्यारी मां
तोतली ज़ुबान से इक दिन बचपन में पूछा था तुझसे
"तेली छादी कब हुई थी मां "
कब तू दुल्हन बनी बता ना
मां प्यार से सिर सहलाते बोली
"अरे मेरी लाडो जब तू इस संसार मैं नहीं आई थी"
तब मैं इस घर मैं दुल्हन बन आई थी
जब बड़ी हुई तो यही सुना
बेटी होती है पराया धन
उसे बसाना है दूसरा घर
जब मैं हुई किशोरी मां ने कहा
बेटी तू है धन पराया तुझे घर है दूसरा बसाना
तूने अपना साकार किया सपना अपने हाथों से मुझे दुल्हन बनाया
पर आज आज मां मां.....
क्यूं तू फिर दुल्हन बनी है
तेरा तो घर यही है
क्यूं तू लाल चुनरी मैं सजी
हाथो मैं मेंहदी लगी
पावों मैं महावर और
चूड़ियों से कलाई सजी है
माथे पर बिंदिया की चमक
मां मां मां....
बता ना क्यूं तू दुल्हन बन यूं
चुप........
फूलों से डोली तेरी सजी
चार कहार साथ है
लम्बी बारात, बाजे,रंगगुलाल है
तू तो फिर आज डोली चढ़ी है
सदा सजल नेत्रों से तू बिदा मुझे करती थी
मां, मां.... क्यूं क्यूं क्यूं इस तरह बिदा हो रही है
मेरी छोटी सी चोट पर जो कराह उठती थी
क्यूं आज मेरे पुकारने पर नहीं बोल रही है
मां तो बेटी का संसार होती है
क्यूं, क्यूं, क्यूं मां आज मुझे छोड़ चली है...
जा मां, ओ मेरी प्यारी मां
लो मेरा अंतिम प्रणाम
स्वीकार करो
अपने अखंड सुहाग से मिलो
ये तेरी बेटी तुझे अंतिम बिदा करती है
जा मां, ओ मेरी प्यारी मां
मां मां मां...............
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© श्रीमती कल्पिता चौरसिया
95117 67446
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