(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "यादगार शब्दों का सफर" )
दाएं बाएं ऊपर नीचे चलती जाती है।
चट्टानों से लड़कर खुद ही राह बनाती है।
कल कल करती गीत सुनाती जाती है।
कभी न रुकती,कभी न झुकती,सागर में मिल जाती है।
जाति धर्म का बंधन तोड़।
सब जन का प्यास बुझाती है।
दर्द सहती पर कभी किसी से न कहती।
बंजर को भी उपजाऊ बनाती जाती है।
नदियां कहती हैं मुझे निर्मल रहने दो।
ना रोको मेरा रास्ता,मुझे अविरल ही बहने दो।
ना बांधो मुझे,हमें आजाद करो।
जंगल हमारे जीवन है उन्हें आबाद करो।
बूंद बूंद मिलकर वजूद बनाना सिखाती है।
राह दुर्गम ही सही हार न मानना बताती है।
आगे बढ़ना ही जीवन है बस आगे बढ़ाना बताती है।
मेरी गहराई मन में शांति का भावलाती है।
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© दयानन्द मिश्र
मोहल्ला- भरपुर
पोस्ट- चुनार
जिला-मीरजापुर
पिन- 231304
94515 66490
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