(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)
सुमन बहुत परेशान थी, कई दिन से अमित उस पर बेटा पैदा करने का दबाव बना रहा था। वो जानती थी ये किसी के हाथ में तो है नहीं लेकिन अमित कुछ समझने को तैयार नहीं था। सुमन की सास ने उसकी परेशानी भांप कर उसका कारण पूछा तो सुमन ने सब सच सच बता दिया। इसपर वो बोलीं, "अरे, हमारे लिए तो लड़का लड़की सब एक बराबर हैं। हमने भी तो लड़की का जन्म लिया है, हमें तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता"। सुमन खुश हो गई कि कम से कम उसकी सास तो दकियानूसी नहीं है। अब कोई तो उसका पक्ष लेगा। तभी वो आगे बोलीं, " वैसे मैं दो तीन लोगों को जानती हूं जो शर्तिया लड़का होने का दावा करते हैं। सबसे पहले कल तुझे एक बाबा जी के पास ले चलूंगी"।
अपनी सास के दोगले चरित्र को देख सुमन का मुंह खुला का खुला रह गया। वो सोचने लगी जहां सारी दुनिया ये जान गई है कि बेटा या बेटी होना पुरुष और महिला के एक्स या वाई गुणसूत्र पर निर्भर है वहां ऐसी पुरातनपंथी सोच कि ना एक्स ना वाई सीधे बाबा जी की दवाई। जब एक स्त्री ही दूसरी स्त्री को शर्तिया बेटा होने के टोटके बता रही हो फिर पुरुषों से क्या शिकायत करना।
गीतिका सक्सेना
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