(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)

हे धरा! तेरी पीड़ा की, एक-एक बूंद चुरा लूं मैं।
ऋण तेरा अनंत है मुझ पर, बूंद-बूंद चुका दूं मैं।।
युगों से है साक्ष्य तू, अनभिज्ञता कैसे दर्शा दूं मैं,
काल का परिवर्तन तुझसे ही, कैसे झुठला दूं मैं।।
रूप तेरा है अतिसुंदर, टीका काला लगा दूं मैं,
श्रृंगार से तू अतिमोहिनी, भ्रम दृष्टि का हटा दूं मैं।।
तूने देखी कुर्बानी वीरों की, निज प्राण लुटा दूं मैं।
अंतस की अभिलाषा है, वतन पे मर दिखा दूं मैं।।
भटक गया है आज मनु, राह आसान बता दूं मैं,
पुष्पों-सा बिछ जाऊं पथ पे, शूलों को हटा दूं मैं।।
ईर्ष्या-द्वेष में फंसा मनु, प्रेम का मार्ग दिखा दूं मैं।
सेवा ही अमृत है धरा का, विश्व को ये जता दूं मैं।।
चहुंओर फैला अंधेरा, ज्ञान का दीपक जला दूं मैं।
मानवता के पथ पर चल, अमानवता मिटा दूं मैं।।
हे धरा! तेरी पीड़ा की, एक-एक बूंद चुरा लूं मैं।
ऋण तेरा अनंत है मुझ पर, बूंद-बूंद चुका दूं मैं।।
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पी यादव 'ओज'
साहित्यकार
चौकीपाड़ा, झारसुगुड़ा।(ओडिशा)
99375 10641
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