(हिंदी हूँ मैं...)
अर्पण समर्पण ही है आसान ,
वशर्ते पा वह कद्र ही।
यदि भाव अच्छा है पनप हृदय,
तो समझ सब ठीक ही।
कद्रदान यत्किंचित मिलते जगत
जिनमे कद्र रसूख ही।
ढूढत जगत सद तुम पाय वह,
समर्पण का तत्भाव ही।।
हीत मीत तब ही मिले,
जब अर्पण रखी भाव।
गावत गीत ढोल बजे,
हृदय पाय सुख सार।।
इहि जग विविध रूप मन जाना।
पाय सुजन यत्किंचित मन भाना।
श्रेयस भान हृदय मन आवा।
जब लखी उसे निर्द्वन्द पावा।।
स्वारथ छाडी परहित देखा।
सुफल ही वह अर्पण मन रेखा।।
लखत लखावत सुजन,
तद खेल संग भाव खेल।
मिलत ही जाती तब,
समर्पण का ही तद भाव।।


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