Monday, August 1

हर कोई जा रहा शिवाला है - गौरव कर्ण (Mein Kavita ...)

 (Mein Kavita ...)



हर कोई जा रहा शिवाला है 

उगते हुए सूर्य की रौशनी से !
     दुनियाँ में फैल रहा उजाला है !!
फूल खिलने लगें बगिया में !
     पंछी उठ ढूंढ रहा निवाला है !!
भंवरे फूलों पर मंडराने लगें !
     सोंच रहे वो रस का प्याला है !!
पत्तों पर पड़ी ओस की बूंदे !
     शिव ने कमंडल से उछाला है !!
धरती पर गंगा की बहती धारा !
     भोले ने ही जटा से निकाला है !!
विपदा में भक्तों के घिरने पर !
     तूने ही गिरते को संभाला है !!
जिसने भी बनाई दूरी तुझसे !
     उसका तो निकला दिवाला है !!
पापी के पाप को नाश करने !
     उसकी तूने कुंडली खंगाला है !!
तांडव से तेरे कांपा सब दुष्ट !
     जब भी तुमको वो उबाला है !!
चाहत में तेरे दूध की नदियाँ !
     भक्तों ने ही तुम पर उड़ाला है !!
चहू ओर अलग सा कतुहल है !
     हर कोई जा रहा शिवाला है !!
हर हर भोले बम बम भोले !
     ये बोल बड़ा ही निराला है !!



✍️ स्वरचित : 

गौरव कर्ण 

(गुरुग्राम, हरियाणा)

 98991 04533

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