(Mein Kavita ...)
हर कोई जा रहा शिवाला है
उगते हुए सूर्य की रौशनी से !
दुनियाँ में फैल रहा उजाला है !!
फूल खिलने लगें बगिया में !
पंछी उठ ढूंढ रहा निवाला है !!
भंवरे फूलों पर मंडराने लगें !
सोंच रहे वो रस का प्याला है !!
पत्तों पर पड़ी ओस की बूंदे !
शिव ने कमंडल से उछाला है !!
धरती पर गंगा की बहती धारा !
भोले ने ही जटा से निकाला है !!
विपदा में भक्तों के घिरने पर !
तूने ही गिरते को संभाला है !!
जिसने भी बनाई दूरी तुझसे !
उसका तो निकला दिवाला है !!
पापी के पाप को नाश करने !
उसकी तूने कुंडली खंगाला है !!
तांडव से तेरे कांपा सब दुष्ट !
जब भी तुमको वो उबाला है !!
चाहत में तेरे दूध की नदियाँ !
भक्तों ने ही तुम पर उड़ाला है !!
चहू ओर अलग सा कतुहल है !
हर कोई जा रहा शिवाला है !!
हर हर भोले बम बम भोले !
ये बोल बड़ा ही निराला है !!
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