भारतीय साहित्य विविध स्वर
अच्छाई और बुराई का फल
एक गाँव में रघुनाथ नामक एक आदमी रहता था । वह परिश्रमी था और किसी भी काम के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहता था । वह अपना काम स्वयं कर लेता था । वह बहुत ही अच्छा आदमी था ।
उसकी थोड़ी जमीन थी । वह दिन रात अपने खेत में काम करता था । फिर भी अपनी पत्नी और दोनों बच्चों के लिए खाने के लिए रोटी भी नहीं जुटा पाता था । उसकी एक छोटी - सी झोपड़ी थी । बारिश के समय वर्षा की बूँदें बाहर के साथ-साथ अंदर भी टपकने लगती थीं।
एक दिन सुबह वह अपने खेत में काम करने जा रहा था । रास्ते में जब वह एक छोटे मंदिर के सामने से गुजर रहा था तो उसे कुछ लोगों की बातें सुनाई दीं । कुछ चोर उस राज्य के राजा के खजाने में घुसकर उस रात को चोरी करने की योजना के बारे में बात कर रहे थे । रघुनाथ उनकी सारी बातें सुनकर सीधा राजा के पास गया और सारी बातें राजा को बताया । राजा तुरंत सैनिकों को भेजकर उन चोरों को कैद करवाया । राजा ने रघुनाथ को अच्छा ईनाम भी दिया । जब चोरों को यह बात मालूम हुआ कि रघुनाथ ही उन्हें पकड़वाया है , वे आग बबूला हो गये थे। रघुनाथ को सबक सिखाना चाहते थे ।
कुछ दिन बीत गए । एक दिन रघुनाथ अपने खेत में काम करने जा रहा था । रास्ते में उसे ठोकर लगी और वह गिर गया पीछे मुड़कर देखा तो बहुत सारे सोने के सिक्के तितर-बितर होकर गिरे पड़े हुए दिखाई दिये। ठोकर लगने के कारण जमीन में दबे हुए घड़े में से सोने के सिक्के बाहर उछलकर आ गये और तितर-बितर होकर गिर पड़ें । रघुनाथ उन्हें लेना नहीं चाहता था क्योंकि वह पराया माल है । वह सोच रहा था कि पराये माल को मैं कैसे लूँ। भगवान मुझे परिश्रम का फल दें या इनाम के रूप में मुझे दिलाये तो मैं ले सकता था । इस तरह का धन लेना तो ठीक नहीं होगा । इस तरह सोचकर वह बिना सोने के सिक्कों को लिये वहाँ से आगे निकल गया ।
जब वह गाँव वापस आ रहा था , तो वे चोर जो भेष बदलकर घूम रहे थे , रघुनाथ को देख लिये । वे रघुनाथ को रोककर कहे कि तुम्हारे पास जो कुछ भी है हमारे हवाले कर दो । नहीं तो तुम्हें जान से मार देंगे । रघुनाथ ने कहा मेरे पास तो कुछ भी नहीं है लेकिन जिस रास्ते से मैं आ रहा था वहाँ रास्ते में सोने के सिक्के बिखरे हुए गिर पड़े थे । रघुनाथ ने सारी बात बताई । उसने यह भी बताया कि मुझ पर आक्रमण करने से आपको क्या मिलेगा ? वहाँ रास्ते में सोने के सिक्के पड़े हुए हैं । जाकर ले लीजिए रघुनाथ की बातों पर विश्वास तो नहीं हो रहा था लेकिन सोने के सिक्कों की लालच में चोरों ने वहाँ जाकर देखा तो उन्हें उस घड़े में छोटे - छोटे साँप और बिच्छू दिखाई दिये । वे बहुत गुस्से में आ गये और रघुनाथ को सबक सिखाना चाहा ।
चोरों ने उन सारे छोटे - छोटे साँपों को और बिच्छुओं को इकट्ठा कर उसी घड़े में डाल कर ले आये । रात होने तक इंतजार किये । आधी रात के समय चोरों ने रघुनाथ की झोपड़ी पर चढ़े और उसमें एक छेद किये । उन साँपों और बिच्छुओं को उस छेद में से रघुनाथ जहाँ पर सो रहा था वहाँ रघुनाथ पर डालें । लेकिन वे साँप और बिच्छू जब रघुनाथ पर आकर गिरे तो सोने के सिक्के बन गये ।
रघुनाथ जाग उठा और सोने के सिक्कों को देखकर बहुत खुश हो गया । वह सोच रहा था लोगों का कहना सही है कि भगवान जब भी देता है , छप्पर फाड़ कर देता है ।
इधर रात में पहरा देते हुए राजा के सैनिक रघुनाथ की झोपड़ी पर से उतरते हुए चोरों को देख लिये और उन्हें गिरफ्तार कर राजा के सामने पेश किये । राजा ने उन्हें फिर जेल में डालने की सजा सुनाई ।
नीति :
अच्छे लोगों के साथ हमेशा अच्छा और बुरे लोगों के साथ हमेशा बुरा ही होता है ।
अवुसुला श्रीनिवासा चारी ‘ शिक्षा रत्न ’
तुनिकी गाँव , कौड़ीपल्ली मण्डल ,
मेदक जिला , तेलंगाना राज्य - 502316.
दूरभाष : 8801600139 , 8328191672 .

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