भारतीय साहित्य विविध स्वर
जलगांव जिले के नगरदेवला नामक गांव से यह सत्य कहानी मां भारती के सच्चे सपूत उमराव सिंह चंदेल की है। इनके पिता का नाम बिसन सिंह चंदेल एवं माता का नाम सूरजाबाई था। इस महान देशभक्त का जन्म पांच मार्च सन् उन्नीस सौ चौदह को औरंगाबाद जिले के किन्हीं नामक गांव में हुआ था। इनकी माताजी धार्मिक एवं उदार विचारों वाली महिला थी। उनके पिताजी एक साधारण किसान थे।
उमराव शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है,महान या श्रेष्ठ। इसमें कोई दो राय नहीं कि वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उनमें देशप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वे एक सच्चे देशप्रेमी थे। उनका बचपन बहुत ही विषम परिस्थितियों में बीता। दो वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता का देहांत हो गया । और सात वर्ष की उम्र में उनकी माता स्वर्ग सिधार गई। इस तरह उनका बचपन अकेलापन का शिकार हो गया । विद्या अध्ययन में उमराव जी की बहुत रूचि थी।
सत्य कथा –
किन्हीं गांव में पढ़ने की व्यवस्था नहीं थी। अतः उमराव जी को एक रिश्तेदार के घर नगरदेवला आकर रहना पड़ा । पढ़ाई के लिए वे उस रिश्तेदार के घर बर्तन, कपड़े धोने काम करते। जो भी रूखा – सूखा मिलता खाते। उनके जीवन का उद्देश्य किसी भी कीमत पर शिक्षा हासिल करना था। उनका मानना था कि शिक्षित व्यक्ति समाज में सकारात्मक एवं प्रगतिशील परिवर्तन कर सकता है। शिक्षा को वे समाज में ज्ञान की क्रांति लाने का सशक्त माध्यम मानते थे। शिक्षा के लिए वे हर तकनीक उठाने को, त्याग करने को तैयार थे। किसी तरह उन्होंने कक्षा सातवीं तक विद्यालय से औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। अब उन्हें देश सेवा में सच्चा सुख नज़र आने लगा। उन्हें अपने शिक्षकों का भी भरपूर स्नेह मिला। मां सरस्वती से आशीर्वाद के लिए उन्होंने भौतिक सुखों का भी त्याग किया। उनकी माता के लिए यह समय हृदय विदारक था। जब इतने छोटे बालक को अपने से दूर करना पड़े। यह घटना ऐसी सत्य कथा है जो हमें सीख देती हैं कि ज्ञान पाने के लिए सभी सुखों को त्याग देना चाहिए।
प्रेरक प्रसंग—
उमराव जी का जीवन बचपन से ही त्याग का प्रेरणा स्रोत हैं। अशोक चक्र का यह स्तंभ उनके जीवन में पूर्णता से दृष्टिगोचर होता है। इसी कड़ी में उनके जीवन की एक घटना उल्लेखनीय हैं। माता-पिता की मृत्यु के बाद वे मामा , मौसी के घर रहने चले गए। उन्होंन उमराव जी को अपनी संतान की तरह पाला एवं संस्कार भी दिए। युवा होने के बाद उनके नाम पर कुछ पुश्तैनी ज़मीन आईं। पर माता- पिता के जाने का दुःख उन्हें अंदर तक दुःखी कर रहा था। वे अपने मामा, मौसी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने कुछ ज़मीन उन दोनों के नाम कर दी। ये था उनका एहसान कम करने का एक तरीका। उन्होंने ज़मीन से मोह नहीं रखा । वे धनवान नहीं बनना चाहते थे। वे जीवनयापन के केवल पर्याप्त साधन चाहते थे। उन्हें धन-दौलत का कोई मोह नहीं था। उन्होंने महाराष्ट्र में ही दस्तापूर नामक गांव में विद्यालय के लिए भी ज़मीन दान दी। जिससे देश की निरक्षरता में कमी आए।
उनका जीवन प्रेरणादायक हैं। एक उत्कृष्ट समाज सुधारक के रूप में भी उनका नाम अग्रणीय है। उनके इन्हीं भागीरथ प्रयासों में एक था , भाषा सुधारक का कार्य। वे गांव में बोली के साथ ही शुद्ध हिंदी भाषा को जनसाधारण की संपर्क भाषा में के रूप में देखना चाहते थे। वे हिंदी की अनिवार्यता को समझते थे। वे हिंदी को वो सम्मान दिलवाना चाहते थे,जिसकी वह हकदार हैं।
वे चाहते थे कि नगरदेवलावासी उत्तम साहित्य पढ़कर अपना बौद्धिक विकास करें। और उनकी सोच में परिवर्तन हो। वे आधुनिक विचारों को आत्मसात कर सकें। उन्हें स्वयं भी पढ़ने का बहुत शौक था। वे जब भी दैनिक कार्यक्रम के अलावा समय पाते क़िताबें पढ़ते।
समाज में हो रहे किसी भी प्रकार के भेदभाव से उन्हें घृणा थी। अपने खेतों में काम करने वाले मजदूरों के साथ भी वे समानता का व्यवहार करते थे। त्योहारों पर मजदूरों को खाना, कपड़ा देना एवं उनके परिवार का ध्यान रखना वे अपना नैतिक कर्तव्य मानते थे। वे सादा जीवन उच्च विचार के प्रबलपोषक एवं समर्थक थे। सफेद धोती कुर्ता पहनते एवं सिर पर गांधी टोपी पहनते।
उनके के लिए धर्म, परिवार से ऊपर देशहित था। अनुशासन तो उन्हें अतिप्रिय था।
वे अपने विद्यार्थियों को व्यायाम शाला में कठोर अनुशासन में रखते। उनके द्वारा अनेक स्थानों पर व्यायाम शालाओं की स्थापना की गई। वे स्वयं भी कुश्ती, भाला फेंक, निशानेबाजी में अत्यंत निपूर्ण थे। सुबह शाम सैर करना,कसरत करना उनकी दिनचर्या में शामिल था। उनके शिष्य उन्हें अपनी संतान की तरह प्रिय थे।
एक सच्चे देशभक्त के रूप में अब वे गुलाम भारत की स्थिति से दुखी थे। अंग्रेज़ों के बढ़ते अत्याचारों से वे भारत को स्वतंत्र कराने का सपना अपनी आंखों में संजोने लगें। अंग्रेज़ों के प्रति उनके मन में घृणा उत्पन्न होने लगी । भारत को एकजुट करने के लिए वे अनेक स्थानों की यात्रा करने लगे जिससे लोगों के मन में देशभक्ति की भावना उत्पन्न कर सकें। वे भारत में स्वशासन चाहते थे। इस कार्य में युवा पीढ़ी के योगदान महत्वपूर्ण मानते थे।
उमराव जी ने व्यायामशाला एवं सेवादल की स्थापना की। ये संगठन उनके द्वारा पचोरा,जामनेर, औरंगाबाद, अकोला आदि स्थानों पर स्थापित किए गए। इन संगठनों को बनाने का उद्देश्य नवीन पीढ़ी को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशक्त करना था।
जाति व्यवस्था से समाज में हो रहे भेदभाव से उमराव जी का हृदय द्रवित हो गया था। वे इस भेदभाव के कड़े विरोधी थे। उनका मानना था कि समाज को जाति के आधार पर बांटना ग़लत है। उनके दोनों पुत्रों का भी अंतर्जातीय विवाह हुआ था। उन्होंने अपनी इन गुणवंती बहुओं को सहर्ष घर की लक्ष्मी के रूप में स्वीकार किया था। इससे साबित होता है,कि वे उदार एवं नवीन विचारों के पोषक थे। उनका मानना था कि जातिगत भेदभाव समाज को वैसे ही खोखला करता है, जैसे लकड़ी को दीमक। उन्होंने इस बुराई को समाप्त करने के लिए अनेक कार्य किए।
अंग्रेजी हुकूमत हमारे देश के लघु एवं कुटीर उद्योगों को भी लगातार नष्ट कर रही थी। इन उद्योगों को बचाने के लिए उमराव जी ने प्रयास किए। वे सोचते थे कि अगर अंग्रेज़ों का विरोध नहीं किया गया , तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता को नष्ट कर देंगे।
भारत एवं भारतीयता उनके मन – मस्तिष्क में समाई थी। अंग्रेज भारतीयों से उनकी मौलिकता छीन रहे थे। भारतीयों के मूल अधिकारों का हनन हो रहा था। जो उमराव का अंग्रेजी हुकूमत के लिए गुस्सा बढ़ा रहा था। अंग्रेज़ों के आधुनिक हथियारों के सामने भारत के परंपरागत हथियार कमजोर पड़ने लगे थे। उमरावजी भारतीयों में शब्दों से जोश भरा करते थे। देश की आजादी के लिए उमराव जी ने सुख, सुविधा, खाना- पीना आदि का भी त्याग किया। वे त्याग की सच्ची मूर्ति थे।
देशभक्ति का अलख जगाने में उन्होंने कोई कमी नहीं छोड़ी। उमरावजी की कोशिशों और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के प्रयासों का ही परिणाम है, कि आज हम खुली आजाद हवा में सांस ले रहे हैं।
उमरावजी की निशानेबाजी भी अचूक थीं, उन्होंने दिल्ली में सन् १९५२ में राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाजी प्रतियोगिता में न केवल भाग लिया, बल्कि उसे जीता भी। वे इसमें प्रथम स्थान पाकर प्रथम विजेता रहे। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें पुरस्कार स्वरूप एक पिस्तौल प्रदान की एवं राष्ट्रीय स्तर का अनुज्ञापत्र भी प्रदान किया। और कमांडिंग ऑफिसर की नौकरी होमगार्ड में मिली।
आज़ादी के इस दिवाने को महाराष्ट्र सरकार की ओर से स्वतंत्रता सेनानी का न केवल सम्मान दिया साथ ही उन्हें पेंशन भी दी । इस नगरदेवला के सपूत की यह कहानी शब्दों में व्यक्त करना अपने आप में गर्व की बात है। इस सपूत के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
सुलभा संजयसिंह राजपूत
मकान नं ३०, सोमेश्वर सोसाइटी -२
भेस्तान, सुरत
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