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Friday, August 2
मॉं - इंदु बारौठ (चारण) (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "चंचलता अक्षरों की" )
(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "चंचलता अक्षरों की" )
मॉं
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मॉं नहीं होती कभी रिटायर,
ना लेती कभी कोई छुट्टी ।
सबके बाद वह सोती,
और सबसे पहले है उठती ।
ना करती कभी कोई बहस ,
ना देती कोई सफ़ाई ।
बस सबको ,दिन भर सुनती रहती ।
अपना इसका ना कोई सपना होता ,
ना होती कोई चाहत।
कभी बच्चों के तो कभी अपनों के,
सपनों को ही अपना ये बताती ।
घर की हर पीड़ा को चुटकी में हर लेती ,
पर खुद की पीड़ा कैसी भी हो
बस हसँ कर सह जाती ।
निपटा हर काम घर के अपने ,
आफिस भी ये जाती ।
ऑफिस से घर आकर ख़ुशी ख़ुशी फिर से कामों में लग जाती।
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