Wednesday, January 12

आजादी का अमृत गान - डॉ. टी. अरुण कुमारी (स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य)

 स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य



आजादी का अमृत गान 

  

गंगा की पवित्रता, उधो माधव की मित्रता ।  

यज्ञ दान की पात्रता, वीर शूरों की कर्मण्यता । 

पर उपकार परहित साधने, राजा बने सन्यासी । 

सुख का मंत्र सिखाने जग को, दिया त्याग यशस्वी । 

अंश मात्र हैं पशु-पक्षी भी भगवान के यहाँ । 

पेड़ पौधे तो होते निज संतान जहाँ । 

यह गीता सार है, मधुर भक्ति का पुकार है । 

ज्ञान सरिता का धार है, विश्व का आधार है । 

मुक्तिधाम है, क्षमा शील है, जगद्गुरु है भारत मेरा । 

अतुल्य है औ ’ अमृत मूर्ति, नतमस्तक है जग सारा । 

अनपढ़ के मुँह से निकलती रामायण का पाठ यहाँ । 

निरक्षर के हाथ लिखे धर्म सूत्र व्याख्यान यहाँ । 

प्रेममयी नारी की शक्ति, बुद्धि, करुणा, रूप, विवेक ।  

जीवन सार, प्रगति के द्वार, मिले प्रीत वरदान अनेक । 

साधारण जनता से उभरे लोकनायक । 

सेवा का मंत्र जापते प्रगति के उन्नायक । 

आसमान की ऊँचाई से टकराती आशा ले युवा ।  

विश्व कल्याण की योजना में योगदान देता हुआ ।  

लगी कतार देवलोक में अवतार ले आने यहाँ । 

मानवीयता पाठ  सीखने मिलते उत्तम स्रोत जहाँ । 

लो आजादी का अमृत गान ... । 

गूँजे विश्व के चारों कोन ।



डॉ. टी. अरुण कुमारी

हिन्दी सहायक आचार्या,

शासकीय महाविद्यालय,

पालोंचा, जिला भद्राद्रि कोत्तागुडेम, तेलंगाना

arunakumari.tata@gmail.com

9440973384


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स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
Editor
Prasadarao Jami

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