स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र साहित्य
आजादी का अमृत गान
गंगा की पवित्रता, उधो माधव की मित्रता ।
यज्ञ दान की पात्रता, वीर शूरों की कर्मण्यता ।
पर उपकार परहित साधने, राजा बने सन्यासी ।
सुख का मंत्र सिखाने जग को, दिया त्याग यशस्वी ।
अंश मात्र हैं पशु-पक्षी भी भगवान के यहाँ ।
पेड़ पौधे तो होते निज संतान जहाँ ।
यह गीता सार है, मधुर भक्ति का पुकार है ।
ज्ञान सरिता का धार है, विश्व का आधार है ।
मुक्तिधाम है, क्षमा शील है, जगद्गुरु है भारत मेरा ।
अतुल्य है औ ’ अमृत मूर्ति, नतमस्तक है जग सारा ।
अनपढ़ के मुँह से निकलती रामायण का पाठ यहाँ ।
निरक्षर के हाथ लिखे धर्म सूत्र व्याख्यान यहाँ ।
प्रेममयी नारी की शक्ति, बुद्धि, करुणा, रूप, विवेक ।
जीवन सार, प्रगति के द्वार, मिले प्रीत वरदान अनेक ।
साधारण जनता से उभरे लोकनायक ।
सेवा का मंत्र जापते प्रगति के उन्नायक ।
आसमान की ऊँचाई से टकराती आशा ले युवा ।
विश्व कल्याण की योजना में योगदान देता हुआ ।
लगी कतार देवलोक में अवतार ले आने यहाँ ।
मानवीयता पाठ सीखने मिलते उत्तम स्रोत जहाँ ।
लो आजादी का अमृत गान ... ।
गूँजे विश्व के चारों कोन ।
डॉ. टी. अरुण कुमारी
हिन्दी सहायक आचार्या,
शासकीय महाविद्यालय,
पालोंचा, जिला भद्राद्रि कोत्तागुडेम, तेलंगाना
arunakumari.tata@gmail.com
9440973384
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