(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")
जय-जयकार हो मातृ-भाषा की,
जो माँ भारती के हर प्रांत में रची बसी है।
जिसके ऑंगन में खेला बचपन,
मातृभूमि की महक बसी है।
विदेश से आई अंग्रेजी, मेहमान है हमारी।
इसको भी अपनाना है।
माँ भारती का गहना बनाकर ही रखना है।
इसका सम्मान भी हमें करना है।
इसको भी साथ लेकर ही चलना है।
लेकिन हिंदी के क्या कहने।(2)
राज-भाषा का गौरव इसने पाया है,
माँ भारती ने बना बिंदी भाल पर अपने इसे सजाया है।
इसकी आभा से खनक उठे माँ के कंगन और चमक उठै हैं गहने।
हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)
गीता, रामायण, महाभारत, वेद पुराणों की भाषा संस्कृत की लिपि देवनागिरी से जन्मी हिंदी है।
स्वतंत्र भारत के प्रजा तंत्र और संविधान की भाषा हिंदी है।
हिंदी भाषा के क्या कहने(2)
इसके साहित्य में अनंत विधाओ की भरमार है,
मुहावरे, लोकोक्ति, रस, छंद अलंकार है।
सुनने में कर्ण मधुर, जो कहते हैं वही हम लिखते हैं।
संग इसके जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं।
हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)
योग, आयुर्वेद, ज्योतिष, अर्थशास्त्र की भाषा हिंदी है।
हिंदी भाषा साहित्य, वाणिज्य ही नहीं,
तकनीकी क्षेत्र में भी विजय पाई है।
तभी तो चंद्रयान को चंद्रमा पर और आदित्य को सूर्य की ओर भेज पाई है।
हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)
हिंदी ने तो भारत माँ के गौरव में चार चाँद लगाए हैं,
इसीलिए तो सारे देश भी इसकी चमक को अपनाए हैं।
अब तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी का हक बनता है।
इसीलिए तो 14 सितंबर को हम भारत में हिंदी दिवस मनाते हैं
और 10 जनवरी को विश्व में हिंदी दिवस मनाया जाता है।
हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)
हिंदी मानव मन को जोडने वाली कड़ी है,
जो विश्व भर में अडिग होकर खड़ी है,
अडिग होकर खड़ी है।
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© डॉ. रमादेवी
एस. ए .हिंदी
जी पी एच एस
खैरताबाद, हैदराबाद।
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