Wednesday, September 30

सुनते हो तो सुनो - अनसूया आर (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "स्नेह - अपनी लेखनी से")

 (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "स्नेह - अपनी लेखनी से")





     सुनते हो तो सुनो
💐............................................💐


बड़ों की बातें ध्यान से सुनो,

धर्मग्रंथों को पहचानो,

अच्छे मार्ग पर सदा चलो,

जीवन सुखमय बनाओ।


भँवरे जैसे बनो,

फूलों का रस पी लो,

फूलों की सुंदरता सँजोकर,

प्रेम से जीवन जी लो।


सुख-शांति से रहो सदा,

चैन की नींद सोओ,

सबसे मिलकर प्रेम से रहो,

अच्छी आदतें बोओ।


माता-पिता की बात मानो,

बड़ों का आदर करो,

सबका भला करते हुए,

हर दिल में प्रेम भरो।


गणपति ने माता-पिता की परिक्रमा कर

अग्रगण्य स्थान पाया,

राम ने पिता की आज्ञा मानकर

आदर्श पुत्र कहलाया।

ध्रुव ने अटल भक्ति से

ध्रुवतारा पद पाया।


जीवन बहुत अनमोल है,

इसे व्यर्थ मत गँवाओ,

हर पल अच्छे कर्मों में लगाओ,

अपने जीवन को सँवारो।


सुनते हो तो सुनो,

नहीं तो अपना मार्ग चुनो।

पर याद रखो, जैसी आदत होगी,

वैसा ही सुख तुम पाओ।


गटर में सोने वाले को

गटर ही सुख देता है,

राख में सोने वाले को

राख ही भाती है।


नाली के कीड़े को नाली भाए,

गोबर के कीड़े को गोबर,

कीचड़ में भैंस को सुख मिले,

उसे वहीं लगता सुंदर।


कुत्ते के आगे खीर रखो,

वह भी “कीड़े-कीड़े” कहता है,

जिसे जैसी आदत पड़ जाती है,

वही उसे अच्छा लगता है।


इसलिए अच्छे विचार चुनो,

अच्छी संगति अपनाओ,

माता-पिता का मान रखो,

प्रेम-शांति से जीवन बिताओ।


सुनते हो तो सुनो,

सुनते हो तो सुनो—

जीवन को सुंदर बनाना है तो

अच्छे मार्ग पर चलो!

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💐💐💐💐💐💐

© अनसूया आर

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अनसूया आकाश चव्हाण

JL in हिंदी, 

Jaya shankar - bhupalapally

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Saturday, September 5

भाषा सहगामी हिंदी - डॉ. रमादेवी (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")

 (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")




    भाषा सहगामी हिंदी
💐............................................💐


जय-जयकार हो मातृ-भाषा की, 

जो माँ भारती के हर प्रांत में रची बसी है।

जिसके ऑंगन में खेला बचपन, 

मातृभूमि की महक बसी है।

विदेश से आई अंग्रेजी, मेहमान है हमारी। 

इसको भी अपनाना है। 

माँ  भारती का गहना बनाकर ही रखना है।

इसका सम्मान भी हमें करना है।

इसको भी साथ लेकर ही चलना है।

लेकिन हिंदी के क्या कहने।(2)


राज-भाषा का गौरव इसने पाया है, 

माँ भारती ने बना बिंदी भाल पर अपने इसे सजाया है।

इसकी आभा से खनक उठे माँ के कंगन और चमक उठै हैं गहने।

हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)


गीता, रामायण, महाभारत, वेद पुराणों की भाषा संस्कृत की लिपि देवनागिरी से जन्मी हिंदी है।

स्वतंत्र भारत के प्रजा तंत्र और संविधान की भाषा हिंदी है।

हिंदी भाषा के क्या कहने(2)


इसके साहित्य में अनंत विधाओ की भरमार है, 

मुहावरे, लोकोक्ति, रस, छंद अलंकार है।

सुनने में कर्ण मधुर, जो कहते हैं वही हम लिखते हैं।

संग इसके जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं।

हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)


योग, आयुर्वेद, ज्योतिष, अर्थशास्त्र की भाषा हिंदी है।

हिंदी भाषा साहित्य, वाणिज्य ही नहीं, 

तकनीकी क्षेत्र में भी विजय पाई है।

तभी तो चंद्रयान को चंद्रमा पर और आदित्य को सूर्य की ओर भेज पाई  है।

हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)


हिंदी ने तो भारत माँ के गौरव में चार चाँद लगाए हैं, 

इसीलिए तो सारे देश भी इसकी चमक को अपनाए हैं।

अब तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी का हक बनता है।

इसीलिए तो 14 सितंबर को हम भारत में हिंदी दिवस मनाते हैं

और 10 जनवरी को विश्व में हिंदी दिवस मनाया जाता है।

हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)


हिंदी मानव मन को जोडने वाली कड़ी है,

जो विश्व भर में अडिग होकर खड़ी है,

अडिग होकर खड़ी है।


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💐💐💐💐💐💐

© डॉ. रमादेवी

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एस. ए .हिंदी

जी पी एच एस

खैरताबाद, हैदराबाद।

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Wednesday, September 2

जीवन की सार्थकता - Botla Sirisha (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")

 (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")




    जीवन की सार्थकता
💐............................................💐


बढ़ते जाओ-बढ़ते जाओ,

आगे -आगे बढ़ते जाओ।

 बढ़ना है तो लड़ते जाओ,

बचपन से ही सब कुछ सहते जाओ।


करते जाओ- करते जाओ,

 सदा कोशिश करते जाओ।

हार न मानो तुम,आगे ही बढ़ते जाओ,

अपने सपनों को सच करते जाओ।


हार-जीत में थोड़ा-सा अंतर,

 मन में लता परिवर्तन बेहतर।

कुछ काम नया तुम करके दिखाओ,

सफलता का जीवन फल पाओ।


माता - पिता को भार न बनो तुम,

इस दुनिया को ही आधार बनो तुम।

निराधार ही खड़े हो जाओ,

सबको तुम ही आधार बन पाओ।


जीते जाओ - जीते जाओ, 

जीवन पथ में जीते जाओ।

मानव जीवन मिला है,सार्थक बनाओ,

इस दुनिया में अपना पहचान बनाओ।

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💐💐💐💐💐💐

© Botla Sirisha

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Government High school

Alamuru

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Wednesday, August 26

हिंदी है हमारा गौरव - सय्यदा खुशी अली (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "भाव कलश", डॉ अपर्णा चतुर्वेदी के संपादन में)

  (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology  "भाव कलश", डॉ अपर्णा चतुर्वेदी के संपादन में)




   हिंदी है हमारा गौरव
💐........................................💐


हिंदी है हमारा गौरव,

हिंदी ही मस्तक का तिलक। 

हिंदी हमें राह दिखाती,

जब हम जाएं भटक।


कहीं भी हम जाएं,

हिंदी ही हृदय के निकट है। 

अनेक भाषाओं को क्यों ना अपनालें,

हिंदी ही हमारे सर का मुकुट है। 


हिंदी ने गुलामी की बेडियों को तोड़ा,

हिंदू मुसलमान सिख इसाई को जोड़ा। 


ना होती यह आशा, 

तो ना जगती राष्ट्रीयता हमारे मन में। 

ना रहती एकता, 

हमारे इस वतन में। 


इस मधुर भाषा के सूर्य हैं सूरदास,

तुलसी इसके चंद्र हैं।

इस सुमधुर गाथा को रचा, 

प्रेम, सुभद्रा, हरिश्चंद्र ने। 


भारत को विश्व प्रसिद्ध बनाती है, 

भारत वासियों को जीना सिखाती है। 

हिंदी की सुंदरता अतुलनीय है, 

यह भाषा हमारी मीत है। 


पूरे संसार में कुछ नहीं, 

आगे हिंदी संगीत के। 

मातृभाषा यह हमारी मां समान, 

सदा घर की याद दिलाती है। 


सुख दुख को व्यक्त करना हो, 

तो हिंदी ही ज़बान पर आती है। 

हम भले ही विभिन्न देशों को जाएं, 

हिंदी ही हमारे मन को भाती है। 


सम्मान करें हिंदी का हम, 

देश के प्रति कर्तव्य निभाएं। 

दिल में सदैव राज रहे हिंदी का, 

आप सभी को हिंदी दिवस की शुभकामनाएं। 


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💐💐💐💐💐💐

© सय्यदा खुशी अली

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एम. ए. इंग्लिश, प्रथम वर्ष 

आर्ट्स कॉलेज 

उस्मानिया विश्वविद्यालय

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हिंदी दिवस - डॉ. अपर्णा चतुर्वेदी (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "भाव कलश", डॉ अपर्णा चतुर्वेदी के संपादन में)

 (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology  "भाव कलश", डॉ अपर्णा चतुर्वेदी के संपादन में)




    हिंदी दिवस
💐............................💐


आइए हिंदी दिवस मनाएं।

हिंदी की ज्योत मन में जगाएं।।


यह भाषा नहीं, संस्कार है प्यारा।

जिसने भारत भाग्य संवारा !!


एकता का जिसने पाठ पढ़ाया!

 बहुभाषियों में मेल कराया।।


संपर्क भाषा का पात्र  निभाया !

देश को बंधन मुक्त कराया !!


भाव मूलक से प्रयोजनमूलक बनी।

भारत- रथ की प्रगति चालक बनी।।


साहित्य का सुगम उद्गगार बनी।

सबके गले का हार बनी।।


भारत मां का अभिमान बनी।

देश भक्ति की मृदु तान बनी।।


देश प्रगति को सर्वस्व बनाया। 

मां भारती की तनया बनके कर्तव्य निभाया।।


आइए हिंदी दिवस मनाएं ।

हिंदी की ज्योत मन में जगाएं।।


जय हिंदी! जय भारत!


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💐💐💐💐💐💐

© डॉ. अपर्णा चतुर्वेदी

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सहायक आचार्य

हिंदी विभाग

शासकीय डिग्री कॉलेज

हयातनगर

हैदराबाद

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Monday, August 24

विश्वजनीन हिंदी - सय्यद क़ासिम अली (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "भाव कलश", डॉ अपर्णा चतुर्वेदी के संपादन में)

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    विश्वजनीन हिंदी
💐.....................................💐


भारतवासी का अभिमान है हिंदी !

हिंदुस्तान की शान है हिंदी!!


हम करते हैं हर भाषा का सम्मान!

पर हिंदी है ईश्वर का वरदान !!


"हिंदी के बिना मैं गूँगा हूं" कहते हैं महात्मा !

क्योंकि हिंदी ही समस्त भारत की आत्मा !!


अपनी भाषा ही प्रभावशाली विरासत है !

हिंदी ही गणतंत्र, लोकतंत्र की सियासत है !!


संस्कृत की लाडली बेटी है हिंदी !

संस्कृति की आन तथा पहचान है हिंदी !!


हिंदी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति है !

हिंदी ही देश की भक्ति एवं शक्ति है!!


ग्रियर्सन कहते हैं, "बोलचाल की महाभाषा है हिंदी!" 

भारतेंदु कहते हैं, "राष्ट्रीय एकता की जनभाषा है हिंदी!!"


"हृदय की भाषा है हिंदी", कहते हैं गांधी !

इसी भाषा ने संवेदनाएं हैं एक सूत्र में बांधी!!


सरल, सुबोध एवं सशक्त भाषा है हिंदी !

सहेतुक, सशास्त्रीय तथा सुगम्य भाषा है हिंदी !


संभवतः हिंदी दिलों को जोड़ती है, तोड़ती नहीं !

असंभव है पाना ऐसी सुंदर देवनागरी भाषा और कहीं !!


धन्यवाद! जय हिंद!

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💐💐💐💐💐💐

© सय्यद क़ासिम अली

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हैदराबाद विश्वविद्यालय

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